कामवासना डॉट नेट

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हैलो दोस्तों मैं शहनाज़ हूँ। 26 साल की एक शादीशुदा औरत। गोरा रंग और खूबसूरत नाक नक्श। कोई भी एक बार मुझे देख लेता तो बस मुझे पाने के लिये तड़प उठता था। मेरा फिगर, 36-28-38, बहुत सैक्सी है। मेरा निकाह जावेद से 6 साल पहले हुआ था। जावेद एक बिज़नेसमैन है और जावेद निहायत ही हेंडसम और काफी अच्छी फितरत वाला आदमी है। वो मुझे बहुत ही मोहब्बत करता है। मगर मेरी किसमत में सिर्फ एक आदमी का मोहब्बत नहीं लिखी हुई थी। मैं आज एक बच्‍चे की माँ बनने वाली हूँ मगर जावेद उसका बाप है कि नहीं, मुझे नहीं मालूम। खून तो शायद उन्ही की फैमिली का है मगर उनके वीर्य से पैदा हुआ या नहीं, इसमें शक है। आपको ज्यादा बोर नहीं करते हुए मैं आपको पूरी कहानी सुनाती हूँ। 

 

 

कैसे एक सीधी साधी लड़की जो अपनी पढ़ाई खत्म करके किसी कंपनी में सेक्रेटरी के पद पर काम करने लगी थी, एक सैक्स मशीन में तबदील हो गयी। निकाह से पहले मैंने किसी से जिस्मानी ताल्लुकात नहीं रखे थे। मैंने अपने सैक्सी जिस्म को बड़ी मुश्किल से मर्दों की भूखी निगाहों से बचाकर रखा था। एक अकेली लड़की का और वो भी इस पद पर अपना कौमार्य सुरक्षित रख पाना अपने आप में बड़ी ही मुश्किल का काम था। लेकिन मैंने इसे मुमकीन कर दिखाया था। मैंने अपना कौमार्य अपने शौहर को ही सौंपा था। लेकिन एक बार मेरी चूत का बंद दरवाज़ा शौहर के लंड से खुल जाने के बाद तो पता नहीं कितने ही लंड धड़ाधड़ घुसते चले गये। मैं कईं मर्दों के साथ चुदाई का मज़ा ले चुकी हूँ। कईं लोगों ने तरह-तरह से मुझसे चोदा।

 

मैं एक खूबसूरत लड़की थी जो एक मीडियम क्लास फैमिली को बिलाँग करती थी। पढ़ाई खत्म होने के बाद मैंने शॉर्ट हैंड और ऑफिस सेक्रेटरी का कोर्स किया। कोर्स खत्म होने पर मैंने कईं जगह एपलायी किया। एक कंपनी सुदर्शन इंडस्ट्रीज़ से पी-ए के लिये काल आया। इंटरव्यू में सेलेक्शन हो गया। मुझे उस कंपनी के मालिक मिस्टर खुशी राम के पी-ए की पोस्ट के लिये सेलेक्ट किया गया। मैं बहुत खुश हुई। घर की हालत थोड़ी नाज़ुक थी। मेरी तनख्वाह गृहस्थी में काफी मदद करने लगी।

 

 

 

मैं काम मन लगा कर करने लगी मगर खुशी राम जी कि नियत अच्छी नहीं थी। खुशीराम जी देखने में किसी भैंसे की तरह मोटे और काले थे। उनके पूरे चेहरे पर चेचक के निशान उनकी शख्सियत को और बुरा बनाते थे। जब वो बोलते तो उनके होंठों के दोनों किनारों से लार निकलती थी। मुझे उसकी शक्ल से ही नफरत थी। मगर क्या करती, मजबूरी में उसे झेलना पड़ रहा था।

 

 

 

मैं ऑफिस में सलवार कमीज़ पहन कर जाने लगी जो उसे नागवार गुजरने लगा। लंबी आस्तीनों वाली ढीली ढाली कमीज़ से उसे मेरे जिस्म की झलक नहीं मिलती थी ना ही मेरे जिस्म के तीखे कटाव ढंग से उभरते।

 

 

 

"यहाँ तुम्हें स्कर्ट और ब्लाऊज़ पहनना होगा। ये यहाँ के पी-ए का ड्रेस कोड है।" उसने मुझे दूसरे दिन ही कहा। मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया। उसने शाम तक एक टेलर को वहीं ऑफिस में बुला कर मेरे ड्रेस का ऑर्डर दे दिया। ब्लाऊज़ का गला काफी गहरा रखवाया और स्कर्ट बस इतनी लंबी कि मेरी आधी जाँघ ही ढक पाये। उसने शाम को मुझे चार हज़ार रुपये दिये और कुछ जोड़ी ऊँची हील के सैंडल खरीदने को कहा।

 

 

 

दो दिन में तीन-चार जोड़ी ड्रेस तैयार हो कर आ गये। मुझे शुरू में कुछ दिन तक तो उस ड्रेस को पहन कर लोगों के सामने आने में बहुत शरम आती थी। मगर धीरे-धीरे मुझे लोगों की नजरों को सहने की हिम्मत जुटानी पड़ी। ड्रेस तो इतनी छोटी थी कि अगर मैं किसी कारण झुकती तो सामने वाले को मेरे ब्रा में कैद बूब्स और पीछे वाले को अपनी पैंटी के जलवे करवाती।

 

 

 

मैं घर से सलवार कमीज़ में आती और ऑफिस आकर अपना ड्रेस चेंज करके ऑफिशल स्कर्ट ब्लाऊज़ और ऊँची हील के सैंडल पहन लेती। घर के लोग या मोहल्ले वाले अगर मुझे उस ड्रेस में देख लेते तो मेरा उसी पल घर से निकलना ही बंद कर दिया जाता। लेकिन मेरे पेरेंट्स पुराने खयालों के भी नहीं थे। उन्होंने कभी मुझसे मेरी पर्सनल लाईफ के बारे में कुछ भी पूछताछ नहीं की थी।

 

एक दिन खुशी राम ने अपने केबिन में मुझे बुला कर इधर उधर की काफी बातें की और धीरे से मुझे अपनी ओर खींचा। मैं हाई हील सैंडल के कारण कुछ डिसबैलेंस हुई तो उसने मुझे अपने सीने से लगा लिया। उसने मेरे होंठों को अपने होंठों से छू लिया। उसके मुँह से अजीब तरह की बदबू आ रही थी। मैं एक दम घबरा गयी। समझ में ही नहीं आया कि ऐसे हालात का सामना किस तरह से करूँ। उसके हाथ मेरी दोनों चूचियों को ब्लाऊज़ के ऊपर से मसलने के बाद स्कर्ट के नीचे पैंटी के ऊपर फिरने लगे। मैं उससे अलग होने के लिये कसमसा रही थी। मगर उसने मुझे अपनी बाँहों में बुरी तरह से जकड़ रखा था। उसका एक हाथ एक झटके से मेरी पैंटी के अंदर घुस कर मेरी टाँगों के जोड़ तक पहुँच गया। मैंने अपनी दोनों टाँगों को सख्ती से एक दूसरे के साथ भींच दिया लेकिन तब तक तो उसकी अँगुलियाँ मेरी चूत के द्वार तक पहुँच चुकी थी। दोनों अँगुलियाँ मेरी चूत में घुसने के लिये कसमसा रही थी।

 

 

 

मैंने पूरी ताकत लगा कर एक धक्का देकर उससे अपने को अलग किया और वहाँ से भागते हुए निकल गयी। जाते जाते उसके शब्द मेरे कानों पर पड़े, "तुम्हें इस कंपनी में काम करने के लिये मेरी हर इच्छा का ध्यान रखना पड़ेगा।"

 

 

 

मैं अपनी डेस्क पर लगभग दौड़ते हुए पहुँची। मेरी सांसें तेज़-तेज़ चल रही थी। मैंने एक ग्लास ठंडा पानी पीया। बेबसी से मेरी आँखों में आँसू आ गये। नम आँखों से मैंने अपना रेसिजनेशन लेटर टाईप किया और उसे वहीं पटक कर ऑफिस से बाहर निकल गयी। फिर दोबारा कभी उस रास्ते कि ओर मैंने पाँव नहीं रखे।

 

 

 

फिर से मैंने कईं जगह एपलायी किया। आखिर एक जगह से इंटरव्यू काल आया। सेलेक्ट होने के बाद मुझे सी-ई-ओ से मिलने के लिये ले जाया गया। मुझे उन्ही के पी-ए की पोस्ट पर अपायंटमेंट मिली थी। मैं एक बार चोट खा चुकी थी इसलिये दिल बड़ी तेजी से धड़क रहा था। मैंने सोच रखा था कि अगर मैं कहीं जॉब करुँगी तो अपनी इच्छा से, किसी मजबूरी या किसी की रखैल बन कर नहीं। मैंने सकुचाते हुए उनके कमरे में नॉक किया और अंदर गयी।

 

 

 

"यू आर वेलकम टू दिस फैमिली" सामने से आवाज आयी। मैंने देखा सामने एक ५७ साल का बहुत ही खूबसूरत आदमी खड़ा था। मैं सी-ई-ओ मिस्टर ताहिर अज़ीज़ खान को देखती ही रह गयी। वो उठे और मेरे पास आकर हाथ बढ़ाया लेकिन मैं बुत की तरह खड़ी रही। ये तहज़ीब के खिलाफ था। मैं अपने बॉस का इस तरह से अपमान कर रही थी। लेकिन उन्होंने बिना कुछ कहे मुस्कुराते हुए मेरी हथेली को थाम लिया। मैं होश में आयी। मैंने तपाक से उनसे हाथ मिलाया। वो मेरे हाथ को पकड़े हुए मुझे अपने सामने की चेयर तक ले गये और चेयर को खींच कर मुझे बैठने के लिये कहा। जब तक वो घूम कर अपनी सीट पर पहुँचे, मैं तो उनकी शराफत पर मर मिटी। इतना बड़ा आदमी और इतनी नेक शख्सियत। मैं तो किसी ऐसे ही एंपलायर के पास काम करने का सपना इतने दिनों से संजोय थी।

 

 

 

खैर अगले दिन से मैं अपने काम में जुट गयी। धीरे धीरे उनकी अच्छाइयों से रूबरू होती गयी। सारे ऑफिस के स्टाफ मेंबर उन्हें दिल से चाहते थे। मैं भला उनसे अलग कैसे रहती। मैंने इस कंपनी में अपने बॉस के बारे में उनसे मिलने के पहले जो राय बनायी थी उसका उलटा ही हुआ। यहाँ पर तो मैं खुद अपने बॉस पर मार मिटी, उनके एक-एक काम को पूरे मन से पूरा करना अपना इमान मान लिया। मगर बॉस था कि घास ही नहीं डालता था। यहाँ मैं सलवार कमीज़ पहन कर ही आने लगी। मैंने अपने कमीज़ के गले बड़े करवा लिये जिससे उन्हें मेरे दूधिया रंग के बूब्स दिखें। अब मैं काफी ऊँची हील के सैंडल पहनने लगी ताकि मेरी चाल में और नज़ाकत आ जाये और मेरा फिगर और भी उभर सके। बाकी सारे ऑफिस वालों के सामने तो अपने जिस्म को चुनरी से ढके रखती थी। मगर उनके सामने जाने से पहले अपनी छातियों पर से चुनरी हटा कर उसे जान बूझ कर टेबल पर छोड़ जाती थी। मैं जान बूझ कर उनके सामने झुक कर काम करती थी जिससे मेरी ब्रा में कसे हुए बूब्स उनकी आँखों के सामने झूलते रहें। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि उनकी नजरों में भी बदलाव आने लगा है। आखिर वो कोई साधू महात्मा तो थे नहीं और मैं थी भी इतनी सुंदर कि मुझसे दूर रहना एक नामुमकिन काम था। मैं अक्सर उन्हें सताने की कोशिश करने लगी। कभी-कभी मौका देख कर अपने बूब्स उनके जिस्म से छुआ देती।

 

 

 

मैंने ऑफिस का काम इतनी काबिलियत से संभाल लिया था कि अब ताहिर अज़ीज़ खान जी ने काम की काफी जिम्मेदारियाँ मुझे सौंप दी थी। मेरे बिना वो बहुत बेबस फ़ील करते थे। इसलिये मैं कभी छुट्टी नहीं लेती थी।

 

 

 

धीरे-धीरे हम काफी ओपन हो गये। फ्री टाईम में मैं उनके केबिन में जाकर उनसे बातें करती रहती। उनकी नज़र बातें करते हुए कभी मेरे चेहरे से फ़िसल कर नीचे जाती तो मेरे निप्पल बुलेट की तरह तन कर खड़े हो जाते। मैं अपने उभारों को थोड़ा और तान लेती थी।

 

 

 

उनमें गुरूर बिल्कुल भी नहीं था। मैं रोज घर से उनके लिये कुछ ना कुछ नाश्ते में बनाकर लाती थी और हम दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करते थे। मैं यहाँ भी कुछ महीने बाद स्कर्ट ब्लाऊज़ में आने लगी और हाई-हील के सैंडल तो पहले से ही पहनने लगी थी। जिस दिन पहली बार स्कर्ट ब्लाऊज़ में आयी, मैंने उनकी आँखों में मेरे लिये एक तारीफ भरी चमक देखी।

 

 

 

मैंने बात को आगे बढ़ाने की सोच ली। कईं बार काम का बोझ ज्यादा होता तो मैं उन्हें बातों बातों में कहती, “सर अगर आप कहें तो फाईलें आपके घर ले आती हूँ, छुट्टी के दिन या ऑफिस टाईम के बाद रुक जाती हूँ।” मगर उनका जवाब दूसरों से बिल्कुल उलटा रहता।

 

 

 

वो कहते, “शहनाज़!  मैं अपनी टेंशन घर ले जाना पसंद नहीं करता और चाहता हूँ कि तुम भी छुट्टी के बाद अपनी लाईफ इंजॉय करो। अपने घर वालों के साथ या अपने बॉयफ्रेंड्स के साथ शाम इंजॉय करो। क्यों कोई है क्या?” उन्होंने मुझे छेड़ा।

 

 

 

“आप जैसा हेंडसम और शरीफ़ लड़का जिस दिन मुझे मिल जायेगा, उसे अपना बॉय फ्रेंड बना लुँगी। आप तो कभी मेरे साथ घूमने जाते नहीं हैं।” उन्होंने तुरंत बात का टॉपिक बदल दिया।

 

 

 

अब मैं अक्सर उन्हें छूने लगी। एक बार उन्होंने सिर दर्द की शिकायत की और मुझे कोई टेबलेट ले कर आने को कहा।

 

 

 

“सर, मैं सिर दबा देती हूँ। दवाई मत लीजिये,” कहकर मैं उनकी चेयर के पीछे आयी और उनके सिर को अपने हाथों में लेकर दबाने लगी। मेरी अँगुलियाँ उनके बालों में घूम रही थीं। मैं अपनी अँगुलियों से उनके सिर को दबाने लगी। कुछ ही देर में आराम मिला तो उनकी आँखें अपने आप मूँदने लगीं। मैंने उनके सिर को अपने जिस्म से सटा दिया। अपने दोनों उरोजों के बीच उनके सिर को दाब कर मैं उनके सिर को दबाने लगी। मेरे दोनों उरोज उनके सिर के भार से दब रहे थे। उन्होंने भी शायद इसे महसूस किया होगा मगर कुछ कहा नहीं। मेरे दोनों उरोज सख्त हो गये और निप्पल तन गये। मेरे गाल शरम से लाल हो गये थे।

 

 

 

“बस अब काफी आराम है,” कह कर जब उन्होंने अपना सिर मेरी छातियों से उठाया तो मुझे इतना बुरा लगा कि कुछ बयान नहीं कर सकती। मैं अपनी नज़रें जमीन पर गड़ाये उनके सामने कुर्सी पर आ बैठ गयी।

 

 

 

धीरे धीरे हम बेतकल्लुफ़ होने लगे। अभी छः महीने ही हुए थे कि एक दिन मुझे अपने केबिन में बुला कर उन्होंने एक लिफाफा दिया। उसमें से लेटर निकाल कर मैंने पढ़ा तो खुशी से भर उठी। मुझे पर्मानेंट कर दिया गया था और मेरी तनख्वाह डबल कर दी गयी थी।

 

 

 

मैंने उनको थैंक्स कहा तो वो बोल उठे, “सूखे सूखे थैंक्स से काम नहीं चलेगा बेबी, इसके लिये तो मुझे तुमसे कोई ट्रीट मिलनी चाहिये।”

 

 

 

"जरूर सर! अभी देती हूँ!" मैंने कहा।

 

 

 

“क्या?” वो चौंक गये। मैं मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी। मैं झट से उनकी गोद में बैठ गयी और उन्हें अपनी बाँहों में भरते हुए उनके लिप्स चूम लिये। वो इस अचानक हुए हमले से घबरा गये।

 

 

 

“शहनाज़ क्या कर रही हो? कंट्रोल योर सेल्फ। इस तरह जज़्बातों में मत बहो,” उन्होंने मुझे उठाते हुए कहा, “ये ठीक नहीं है। मैं एक शादीशुदा बाल बच्चेदार बूढ़ा आदमी हूँ।”

 

 

 

“क्या करूँ सर आप हो ही इतने हेंडसम कि कंट्रोल नहीं हो पाया,” और वहाँ से शरमा कर भाग गयी।

 

 

 

जब इतना होने के बाद भी उन्होंने कुछ नहीं कहा तो मैं उनसे और खुलने लगी।

 

 

 

“ताहिर जी! एक दिन मुझे घर ले चलो ना अपने,” एक दिन मैंने उन्हें बातों बातों में कहा। अब हमारा रिश्ता बॉस और पी-ए का कम और दोस्तों जैसा ज्यादा हो गया था।

 

 

 

“क्यों घर में आग लगाना चाहती हो?” उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा।

 

 

 

“कैसे?”

 

 

 

“अब तुम जैसी हसीन पी-ए को देख कर कौन भला मुझ पर शक नहीं करेगा।”

 

 

 

“चलो एक बात तो आपने मान ही ली आखिर।”

 

 

 

“क्या?” उन्होंने पूछा।

 

 

 

 “यही कि मैं हसीन हूँ और आप मेरे हुस्‍न से डरते हैं।”

 

 

 

“वो तो है ही।“

 

 

 

“मैं आपकी वाईफ से और आपके बच्चों से एक बार मिलना चाहती हूँ।”

 

 

 

“क्यों? क्या इरादा है?”

 

 

 

“हम्म्म कुछ खतरनाक भी हो सकता है।” मैं अपने निचले होंठ को दाँत से काटते हुए उठ कर उनकी गोद में बैठ गयी। मैं जब भी बोल्ड हो जाती थी तो वो घबरा उठाते थे। मुझे उन्हें इस तरह सताने में बड़ा मज़ा आता था।

 

 

 

“देखो तुम मेरे बेटे से मिलो। उसे अपना बॉय फ्रेंड बना लो। बहुत हेंडसम है वो। मेरा तो अब समय चला गया है तुम जैसी लड़कियों से फ्लर्ट करने का....” उन्होंने मुझे अपनी गोद से उठाते हुए कहा, “देखो ये ऑफिस है। कुछ तो इसकी तहज़ीब का खयाल रखा कर। मैं यहाँ तेरा बॉस हूँ। किसी ने देख लिया तो पता नहीं क्या सोचेगा कि बुड्ढे की मती मारी गयी है।“

 

 

 

इस तरह अक्सर मैं उनसे चिपकने की कोशिश करती थी मगर वो किसी मछली की तरह हर बार फ़िसल जाते थे।

 

 

 

इस घटना के बाद तो हम काफी खुल गये। मैं उनके साथ उलटे सीधे मजाक भी करने लगी। लेकिन मैं तो उनकी बनायी हुई लक्ष्मन रेखा क्रॉस करना चाहती थी। मौका मिला होली को।

 

 

 

होली के दिन हमारे ऑफिस में छुट्टी थी। लेकिन फैक्ट्री बंद नहीं रखी जाती थी, कुछ ऑफिस स्टाफ को उस दिन भी आना पड़ता था। मिस्टर ताहिर हर होली को अपने स्टाफ से सुबह-सुबह होली खेलने आते थे। मैंने भी होली को उनके साथ हुड़दंग करने के प्लैन बना लिया। उस दिन सुबह मैं ऑफिस पहुँच गयी। ऑफिस में कोई नहीं था। सब बाहर एक दूसरे को गुलाल लगा रहे थे। मैं लोगों की नज़र बचाकर ऑफिस के अंदर घुस गयी। अंदर होली खेलना अला‍ऊड नहीं था। मैं ऑफिस में अंदर से दरवाजा बंद कर के उनका इंतज़ार करने लगी। कुछ ही देर में मिस्टर ताहिर की कार अंदर आयी। वो कुर्ते पायजामे में थे। लोग उनसे गले मिलने लगे और गुलाल लगाने लगे। मैंने गुलाल निकाल कर एक प्लेट में रख लिया और बाथरूम में जाकर अपने बालों को खोल दिया। रेशमी ज़ुल्फ खुल कर पीठ पर बिखर गयी। मैंने एक पुरानी शर्ट और स्कर्ट पहन रखी थी। स्कर्ट काफी छोटी थी। मैंने शर्ट के बटन खोल कर अंदर की ब्रा उतार दी और शर्ट वापस पहन ली। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले रहने दिये जिससे मेरे आधे बूब्स झलक रहे थे। शर्ट छातियों के ऊपर से कुछ घिसी हुई थी इसलिये मेरे निप्पल और उनके चारों ओर का काला घेरा साफ़ नज़र आ रहा था। उत्तेजना और डर से मैं मार्च के मौसम में भी पसीने-पसीने हो रही थी।

 

मैं खिड़की से झाँक रही थी और उनके फ्री होने का इंतज़ार करने लगी। उन्हें क्या मालूम था मैं ऑफिस में उनका इंतज़ार कर रही हूँ। वो फ्री हो कर वापस कार की तरफ़ बढ़ रहे थे। तो मैंने उनके मोबाइल पर रिंग किया।

 

 

 

“सर, मुझसे होली नहीं खेलेंगे।”

 

 

 

“कहाँ हो तुम? शहनाज़ ... आ जाओ मैं भी तुमसे होली खेलने के लिये बेताब हूँ,” उन्होंने चारों तरफ़ देखते हुए पूछा।

 

 

 

“ऑफिस में आपका इंतज़ार कर रही हूँ!”

 

 

 

“तो बाहर आजा ना! ऑफिस गंदा हो जायेगा!”

 

 

 

“नहीं! सबके सामने मुझे शरम आयेगी। हो जाने दो गंदा। कल करीम साफ़ कर देगा,” मैंने कहा।

 

 

 

“अच्छा तो वो वाली होली खेलने का प्रोग्राम है?” उन्होंने मुस्कुराते हुए मोबाइल बंद किया और ऑफिस की तरफ़ बढ़े। मैं लॉक खोल कर दरवाजे के पीछे छुप गयी। जैसे ही वो अंदर आये मैं पीछे से उनसे लिपट गयी और अपने हाथों से गुलाल उनके चेहरे पर मल दिया। जब तक वो गुलाल झाड़ कर आँख खोलते, मैंने वापस अपनी मुठ्ठियों में गुलाल भरा और उनके कुर्ते के अंदर हाथ डाल कर उनके सीने में लगा कर उनके सीने को मसल दिया। मैं उनके दोनों सीने अपनी मुठ्ठी में भर कर किसी औरत की छातियों की तरह मसलने लगी।

 

 

 

“ए..ए.... क्या कर रही है?” वो हड़बड़ा उठे।

 

 

 

“बुरा ना मानो होली है,” कहते हुए मैंने एक मुठ्ठी गुलाल पायजामे के अंदर भी डाल दी। अंदर हाथ डालने में एक बार झिझक लगी लेकिन फिर सब कुछ सोचना बंद करके अंदर हाथ डाल कर उनके लंड को मसल दिया।

 

 

 

“ठहर बतता हूँ।”  वो जब तक संभले, तब तक मैं खिलखिलाते हुए वहाँ से भाग कर टेबल के पीछे हो गयी। उन्होंने मुझे पकड़ने के लिये टेबल के इधर उधर दौड़ लगायी। लेकिन हाई-हील पहने होने के बावजूद मैं उनसे बच गयी। लेकिन मेरा मक्सद तो पकड़े जाने का था, बचने का थोड़ी। इसलिये मैं टेबल के पीछे से निकल कर दरवाजे की तरफ़ दौड़ी। इस बार उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ कर मेरी कमीज़ के अंदर हाथ डाल दिये। मैं खिलखिला कर हँस रही थी और कसमसा रही थी। वो काफी देर तक मेरे बूब्स पर रंग लगाते रहे। मेरे निप्पलों को मसलते और खींचते रहे। मैं उनसे लिपट गयी और पहली बार उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिये। मेरे होंठ थोड़ा खुले और उनकी जीभ को अंदर जाने का रास्ता दे दिया। कईं मिनट हम इसी तरह एक दूसरे को चूमते रहे। मेरा एक हाथ सरकते हुए उनके पायजामे तक पहुँचा और फिर धीरे से पायजामे के अंदर सरक गया। मैं उनके लंड की तपिश अपने हाथों पर महसूस कर रही थी। मैंने अपने हाथ आगे बढ़ा कर उनके लंड को थाम लिया। मेरी इस हरकत से जैसे उनके पूरे जिस्म में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी। उन्होंने मुझे एक धक्का देकर अपने से अलग किया। मैं गर्मी से तप रही थी, लेकिन उन्होंने कहा, “नहीं शहनाज़! नहीं ये ठीक नहीं है।”

 

 

 

मैं सर झुका कर वहीं खड़ी रही।

 

 

 

“तुम मुझसे बहुत छोटी हो! ” उन्होंने अपने हाथों से मेरे चेहरे को उठाया, “तुम बहुत अच्छी लड़की हो और हम दोनों एक दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त हैं।”

 

 

 

मैंने धीरे से सर हिलाया। मैं अपने आपको कोस रही थी। मुझे अपनी हरकत पर बहुत शर्मिंदगी हो रही थी। मगर उन्होंने मेरी कश्मकश को समझ कर मुझे वापस अपनी बाँहों में भर लिया और मेरे गालों पर दो किस किये। इससे मैं वापस नॉर्मल हो गयी। जब तक मैं संभलती, वो जा चुके थे।

 

 

 

धीरे धीरे समय बीतता गया। लेकिन उस दिन के बाद उन्होंने मेरे और उनके बीच में एक दीवार बना दी।

 

 

 

मैं शायद वापस उन्हें सिड्यूस करने का प्लैन बनाने लगती लेकिन अचानक मेरी ज़िंदगी में एक आँधी सी आयी और सब कुछ चेंज हो गया। मेरे सपनों का सौदागर मुझे इस तरह मिल जायेगा, मैंने कभी सोचा ना था।

 

 

 

मैं एक दिन अपने काम में बिज़ी थी कि लगा कोई मेरी डेस्क के पास आकर रुका।

 

 

 

“आय वांट टू मीट मिस्टर ताहिर अज़ीज़ खान!”

 

 

 

“ऐनी अपायंटमेंट?” मैंने सिर झुकाये हुए ही पूछा|

 

 

 

“नो!”

 

 

 

“सॉरी ही इज़ बिज़ी,” मैंने टालते हुए कहा।

 

 

 

“टेल हिम, जावेद, हिज़ सन वांट्स टू मीट हिम।”

 

 

 

मैंने एक झटके से अपना सिर उठाया और उस खूबसूरत और हेंडसम आदमी को देखती रह गयी। वो भी मेरी खूबसूरती में खो गया था।

 

 

 

“ओह मॉय गॉड! क्या चीज़ हो तुम। तभी डैड आजकल इतना ऑफिस में बिज़ी रहने लगे हैं।” उन्होंने कहा, "बाय द वे, आपका नाम जान सकता हूँ? ”

 

 

 

"शहनाज़”

 

 

 

“शहनाज़ ! अब ये नाम मेरे ज़हन से कभी दूर नहीं जायेगा।”

 

 

 

मैंने शरमा कर अपनी आँखें झुका ली। वो अंदर चले गये। वापसी में उन्होंने मुझसे शाम की डेट फिक्स कर ली।

 

 

 

इसके बाद तो हम डेली मिलने लगे। हम दोनों पूरी शाम एक दूसरे की बाँहों में बिताने लगे। जावेद बहुत ओपन माइंड के आदमी थे।

 

 

 

एक दिन ताहिर जी ने मुझे अपने केबिन में बुलाया और एक लेटर मुझे दिया। “ये है तुम्हारा टर्मिनेशन लेटर। यू आर बींग सैक्ड,” उन्होंने तेज़ आवाज के साथ कहा।

 

 

 

"ल...लेकिन मेरी गलती क्या है?” मैंने रुआंसी आवाज में पूछा।

 

 

 

“तुमने मेरे बेटे को अपने जाल में फांसा है”

 

 

 

“लेकिन सर…”

 

 

 

“कोई लेकिन वेकिन नहीं” उन्होंने मुझे बुरी तरह झिड़कते हुए कहा, “नाओ गेट लोस्ट!”

 

 

 

मेरी आँखों में आँसू आ गये। मैं रोती हुई वहाँ से जाने लगी। जैसे ही मैं दरवाजे तक पहुँची, उनकी आवाज सुनायी दी।

 

 

 

“शाम को हम तुम्हारे पेरेंट्स से मिलने आ रहे हैं। जावेद जल्दी निकाह करना चाहता है।”

 

 

 

मेरे कदम ठिठक गये। मैं घूमी तो मैंने देखा कि मिस्टर ताहिर अपनी बांहें फैलाये मुस्कुरा रहे हैं। मैं आँसू पोंछ कर खिलखिला उठी। और दौड़ कर उनसे लिपट गयी।

 

 आखिर मैं ताहिर अज़ीज़ खान जी के परिवार का एक हिस्सा बनने जा रही थी। जावेद मुझे बहुत चाहता था। निकाह से पहले हम हर शाम साथ-साथ घूमते फिरते और काफी बातें करते थे। जावेद ने मुझसे मेरे बॉय फ्रेंड्स के बारे में पूछा। और उनसे मिलने से पहले की मेरी सेक्ज़ुअल लाईफ के बारे में पूछा। जब मैंने कहा कि अभी तक कुँवारी हूँ तो हंसने लगे और कहा, “क्या यार, तुम्हारी ज़िंदगी तो बहुत बोरिंग है। यहाँ ये सब नहीं चलेगा। एक दो भंवरों को तो रखना ही चाहिये। तभी तो तुम्हारी मार्केट वेल्यू का पता चलता है।” मैं उनकी बातों से हँस पड़ी।

 

 

 

निकाह से पहले ही मैं जावेद के साथ हमबिस्तर हो गयी। हम दोनों ने निकाह से पहले खूब सैक्स किया। जावेद के साथ मैं शराब भी पीने लगी और लगभग रोज ही किसी होटल में जाकर सैक्स इंजॉय करते थे। एक बार मेरे पेरेंट्स ने निकाह से पहले रात-रात भर बाहर रहने पर ऐतराज़ जताया था। लेकिन जताया भी तो किससे; मेरे होने वाले ससुर जी से जो खुद इतने रंगीन मिजाज़ थे। उन्होंने उनकी चिंताओं को भाप बना कर उड़ा दिया। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने मुझे फ्री छोड़ रखा था लेकिन मैंने कभी अपने काम से मन नहीं चुराया। अब मैं वापस सलवार कमीज़ में ऑफिस जाने लगी।

 

 

 

जावेद और उनकी फैमिली काफी खुले विचारों की थी। जावेद मुझे एक्सपोज़र के लिये जोर देते थे। वो मेरे जिस्म पर रिवीलिंग कपड़े पसंद करते थे। मेरा पूरा वार्डरोब उन्होंने चेंज करवा दिया था। उन्हें मिनी स्कर्ट और लूज़ टॉप मुझ पर पसंद थे। सिर्फ मेरे कपड़े ही नहीं बल्कि मेरे अंडरगार्मेंट्स और जूते-सैंडल तक उन्होंने अपनी पसंद के खरीदवाये। अधिकतर आदमियों की तरह उन्हें भी हाई-हील सैंडलों के लिये कामाकर्षण था।

 

 

 

वो मुझे माइक्रो स्कर्ट और लूज़ स्लीवलेस टॉप पहना कर डिस्को में ले जाते, जहाँ हम खूब फ्री होकर नाचते, शराब पीते और मस्ती करते थे। अक्सर लोफर लड़के मेरे जिस्म से अपना जिस्म रगड़ने लगते। कईं बार मेरे बूब्स मसल देते। वो तो बस मौके की तलाश में रहते थे कि कोई मुझ जैसी सैक्सी हसीना मिल जाये तो हाथ सेंक लें। मैं कईं बार नाराज़ हो जाती लेकिन जावेद मुझे चुप करा देते। कईं बार कुछ मनचले मेरे साथ डाँस करना चाहते तो जावेद खुशी-खुशी मुझे आगे कर देते। मुझ संग तो डाँस का बहाना होता। लड़के मेरे जिस्म से जोंक की तरह चिपक जाते। मेरे पूरे जिस्म को मसलने लगते। बूब्स का तो सबसे बुरा हाल कर देते। मैं अगर नाराज़गी ज़ाहिर करती तो जावेद अपनी टेबल से आँख मार कर मुझे शांत कर देते। शुरू-शुरू में तो इस तरह के खुलेपन में मैं घबरा जाती थी। मुझे बहुत बुरा लगता था लेकिन धीरे-धीरे मुझे इन सब में मज़ा आने लगा और मैं हल्के-फुल्के नशे में खुल कर इस सब में भाग लेने लगी। मैं जावेद को उत्तेजित करने के लिये कभी-कभी दूसरे किसी मर्द को सिड्यूस करने लगती। उस शाम तो जावेद में कुछ ज्यादा ही जोश आ जाता।

 

 

 

खैर हमारा निकाह जल्दी ही बड़े धूम धाम से हो गया। निकाह के बाद जब ताहिर अज़ीज़ खान जी दुआ देते हुए अपने सीने से लगा लिया तो इतने में ही मैं गीली हो गयी। तब मैंने महसूस किया कि हमारा रिश्ता आज से बदल गया है लेकिन मेरे मन में अभी एक छुपी सी चिंगारी बाकी है अपने ससुर जी के लिये, जिसे हवा लगते ही भड़क उठने की उम्मीद है।

 

 

 

मेरे ससुराल वाले बहुत अच्छे और काफी एडवांस्ड विचारों के थे। जावेद के एक बड़े भाई साहब हैं फिरोज़ और एक बड़ी बहन है समीना। दोनों का तब तक निकाह हो चुका था। मेरे नन्दोई का नाम है सलमान। सलमान बहुत रंगीन मिजाज़ इंसान थे। उनकी नजरों से ही कामुक्ता टपकती थी।

 

 

 

निकाह के बाद मैंने पाया कि सलमान मुझे कामुक नजरों से घूरते रहते हैं। नया-नया निकाह हुआ था, इसलिये किसी से शिकायत भी नहीं कर सकती थी। उनकी फैमिली इतनी एडवांस थी कि मेरी इस तरह की शिकायत को हंसी में उड़ा देते और मुझे ही उलटा उनकी तरफ़ ढकेल देते। सलमान की मेरी ससुराल में बहुत अच्छी इमेज बनी हुई थी इसलिये मेरी किसी भी शिकायत को कोई तवज्जो नहीं देता। अक्सर सलमान मुझे छू कर बात करते थे। वैसे इसमें कुछ भी गलत नहीं था। लेकिन ना जाने क्यों मुझे उस आदमी से चिढ़ होती थी। उनकी आँखें हमेशा मेरी छातियों पर रेंगते महसूस करती थी। कईं बार मुझसे सटने की भी कोशिश करते थे। कभी सबकी आँख बचा कर मेरी कमर में चिकोटी काटते तो कभी मुझे देख कर अपनी जीभ को अपने होंठों पर फेरते। मैं नजरें घूमा लेती।

 

 

 

मैंने जब समीना से थोड़ा घूमा कर कहा तो वो हँसते हुए बोली, "दे दो बेचारे को कुछ लिफ्ट! आजकल मैं तो रोज उनका पहलू गरम कर नहीं रही हूँ इसलिये खुला साँड हो रहे हैं। देखना बहुत बड़ा है उनका। और तुम तो बस अभी कच्‍ची कली से फूल बनी हो... उनका हथियार झेल पाना अभी तेरे बस का नहीं।”

 

 

 

“आपा आप भी बस.... आपको शरम नहीं आती अपने भाई की नयी दुल्हन से इस तरह बातें कर रही हो?”

 

 

 

“इसमें बुराई क्या है। हर मर्द का किसी शदीशुदा की तरफ़ खिंचाव का मतलब बस एक ही होता है कि वो उसके शहद को चखना चाहता है। इससे कोई लड़की घिस तो जाती नहीं है।” समीना आपा ने हंसी में बात को उड़ा दिया। उस दिन शाम को जब मैं और जावेद अकेले थे समीना आपा ने अपने भाई से भी मजाक में मेरी शिकायत की बात कह दी।

 

 

 

जावेद हंसने लगे, “अच्छा लगता है जीजा जी का आप से मन भर गया है इसलिये मेरी बेगम पर नजरें गड़ाये रखे हुए हैं।" मैं तो शरम से पानी पानी हो रही थी। समझ ही नहीं आ रहा था वहाँ बैठे रहना चाहिये या वहाँ से उठ कर भाग जाना चाहिये। मेरा चेहरा शरम से लाल हो गया।

 

 

 

“अभी नयी है, धीरे-धीरे इस घर की रंगत में ढल जायेगी।” फिर मुझे कहा, “शहनाज़ हमारे घर में किसी से कोई लिकाव छिपाव नहीं है। किसी तरह का कोई पर्दा नहीं। सब एक दूसरे से हर तरह का मजाक छेड़ छाड़ कर सकते हैं। तुम किसी की किसी हरकत का बुरा मत मानना।”

 

 

 

अगले दिन की ही बात है। मैं डायनिंग टेबल पर बैठी सब्ज़ी काट रही थी। सलमान और समीना आपा सोफ़े पर बैठे हुए थे। मुझे खयाल ना रहा कब मेरे एक स्तन से साड़ी का आंचल हट गया। मुझे काम निबटा कर नहाने जाना था, इसलिये ब्लाऊज़ का सिर्फ एक बटन बंद था। आधे से अधिक चूचियाँ बाहर निकली हुई थीं। मैं अपने काम में तल्लीन थी। मुझे नहीं मालूम था कि सलमान सोफ़े बैठ कर न्यूज़ पेपर की आड़ में मेरी चूचियों को निहार रहे हैं। मुझे पता तब चला जब समीना आपा ने मुझे बुलाया।

 

 

 

“शहनाज़ यहाँ सोफ़े पर आ जाओ। इतनी दूर से सलमान को तुम्हारा जिस्म ठीक से दिखायी नहीं दे रहा है। बहुत देर से कोशिश कर रहा है कि काश उसकी नजरों की गर्मी से तुम्हारे ब्लाऊज़ का इकलौता बटन पिघल जाये और ब्लाऊज़ से तुम्हारी चूचियाँ निकल जायें, लेकिन उसे कोई कामयाबी नहीं मिल रही है।”

 

 

 

मैंने झट से अपनी चूचियों को देखा तो सारी बात समझ कर मैंने आंचल सही कर दिया। मैं शरमा कर वहाँ से उठने को हुई तो समीना आपा ने आकर मुझे रोक दिया और हाथ पकड़ कर सोफ़े तक ले गयी। सलमान के पास ले जा कर उन्होंने मेरे आंचल को छातियों के ऊपर से हटा दिया।

 

 

 

“लो देख लो.. ३८ साइज़ के हैं। नापने हैं क्या?”

 

 

 

मैं उनकी हरकत से शरम से लाल हो गयी। मैंने जल्दी वापस आंचल सही किया और वहाँ से खिसक ली।

 

 

 

हनीमून में हमने मसूरी जाने का प्रोग्राम बनाया। शाम को कार से दिल्ली से निकल पड़े। हमारे साथ समीना आपा  और सलमान भी थे। ठंड के दिन थे। इसलिये शाम जल्दी हो जाती थी। सामने की सीट पर समीना आपा बैठी हुई थी। सलमान कार चला रहे थे। हम दोनों पीछे बैठे हुए थे। दो घंटे लगातार ड्राईव करने के बाद एक ढाबे पर चाय पी। अब जावेद ड्राइविंग सीट पर चला गया और सलमान पीछे की सीट पर आ गये। मैंने सामने की सीट पर जाने के लिये दरवाजा खोला तो सलमान ने मुझे रोक दिया।

 

 

 

“अरे कभी हमारे साथ भी बैठ लो.... खा तो नहीं जाऊँगा तुम्हें," सलमान ने कहा।

 

 

 

“हाँ बैठ जाओ उनके साथ.... सर्दी बहुत है बाहर। आज अभी तक गले के अंदर एक भी घूँट नहीं गयी है इसलिये ठंड से काँप रहे हैं। तुमसे सट कर बैठेंगे तो उनका जिस्म भी गरम हो जायेगा,” आपा ने हँसते हुए कहा।

 

 

 

“अच्छा? लगता है आपा अब तुम उन्हें और गरम नहीं कर रही हो,” जावेद ने समीना आपा को छेड़ते हुए कहा।

 

 

 

हम लोग बातें करते और मजाक करते चले जा रहे थे। तभी बात करते-करते सलमान ने अपना हाथ मेरी जाँघ पर रख दिया, जिसे मैंने धीरे से पकड़ कर नीचे कर दिया। ठंड बढ़ गयी थी। जावेद ने एक शाल ले लिया। समीना ने एक कंबल ले लिया था। हम दोन पीछे बैठे ठंड से काँपने लगे।

 

 

 

“सलमान देखो.... शहनाज़ का ठंड के मारे बुरा हाल हो रहा है। पीछे एक कंबल रखा है उससे तुम दोनों ढक लो,” समीना आपा ने कहा।

 

 

 

अब एक ही कंबल बाकी था जिससे सलमान ने हम दोनों को ढक दिया। एक कंबल में होने के कारण मुझे सलमान से सट कर बैठना पड़ा। पहले तो थोड़ी झिझक हुई मगर बाद में मैं उनसे एकदम सट कर बैठ गयी। सलमान का एक हाथ अब मेरी जाँघों पर घूम रहा था और साड़ी के ऊपर से मेरी जाँघों को सहला रहा था। अब उन्होंने अपने हाथ को मेरे कंधे के ऊपर रख कर मुझे अपने सीने पर खींच लिया। मैं अपने हाथों से उन्हें रोकने की हल्की सी कोशिश कर रही थी।

 

 

 

“क्या बात है, तुम दोनों चुप क्यों हो गये। कहीं तुम्हारा नन्दोई तुम्हें मसल तो नहीं रहा है? संभाल के रखना अपने उन खूबसूरत जेवरों को.... मर्द पैदाइशी भूखे होते हैं इनके।”  कह कर समीना हँस पड़ी। मैं शरमा गयी। मैंने सलमान के जिस्म से दूर होने की कोशिश की तो उन्होंने मेरी कमर को पकड़ कर और अपनी तरफ़ खींच लिया।

 

 

 

“अब तुम इतनी दूर बैठी हो तो किसी को तो तुम्हारी प्रॉक्सी देनी पड़ेगी ना और नन्दोई के साथ रिश्ता तो वैसे ही जीजा साली जैसा होता है..... आधी घर वाली.....” सलमान ने कहा।

 

 

 

“देखा.... देखा.... कैसे उछल रहे हैं। शहनाज़ अब मुझे मत कहना कि मैंने तुम्हें चेताया नहीं। देखना इनसे दूर ही रहना। इनका साइज़ बहुत बड़ा है।”  समीना ने फिर कहा।

 

 

 

“क्या आपा आप भी बस।”

 

 

 

अब जावेद अपनी बाँह वापस कंधे से उतार कर कुछ देर तक मेरी अंदरूनी जाँघों को मसलते रहे। फिर अपने हाथ को वापस ऊपर उठा कर अपनी अँगुलियाँ मेरे गालों पर फिराने लगे। मेरे पूरे जिस्म में एक झुरझुरी सी दौड़ रही थी। रोंये भी खड़े हो गये। धीरे-धीरे उनका हाथ गले पर सरक गया। मैं ऐसा दिखावा कर रही थी जैसे सब कुछ नॉर्मल है मगर अंदर उनके हाथ किसी सर्प की तरह मेरे जिस्म पर रेंग रहे थे। अचानक उन्होंने अपना हाथ नीचे किया और साड़ी ब्लाऊज़ के ऊपर से मेरे एक मम्मे को अपने हाथों से ढक लिया। उन्होंने पहले धीरे से कुछ देर तक मेरे एक मम्मे को प्रेस किया। जब देखा कि मैंने किसी तरह का विरोध नहीं किया तो उन्होंने हाथ ब्लाऊज़ के अंदर डाल कर मेरे एक मम्मे को पकड़ लिया। मैं कुछ देर तक तो सकते जैसी हालत में बैठी रही। लेकिन जैसे ही उसने मेरे उस मम्मे को दबाया तो मैं चिहुंक उठी “उईईई!!!”

 

 

 

“क्या हुआ? खटमल काट गया?” समीना आपा ने पूछा और मुझे चिढ़ाते हुए हंसने लगी। मैं शरम से मुँह भींच कर बैठी हुई थी। क्या बताती; एक नयी दुल्हन के लिये इस तरह की बातें खुले आम करना बड़ा मुश्किल होता है और खासकर तब जबकि मेरे अलावा बाकी सब इस माहौल का मज़ा ले रहे थे।

 

 

 

“कुछ नहीं! मेरे सैंडल की हील फंस गयी थी सीट के नीचे।” मैंने बात को संभालते हुए कहा।

 

 

 

अब उनके हाथ मेरे नंगे मम्मों को सहलाने लगे। उनके हाथ ब्रा के अंदर घुस कर मेरे मम्मों पर फिर रहे थे। उन्होंने मेरे निप्पल को अपनी अँगुलियों से छूते हुए मेरे कान में कहा, “बाई गॉड... बहुत सैक्सी हो। अगर तुम्हारा एक अंग ही इतना लाजवाब है तो जब पूरी नंगी होगी तो कयामत आ जायेगी। जावेद खूब रगड़ता होगा तेरी जवानी। साला बहुत किसमत वाला है। तुम्हें मैं अपनी टाँगों के बीच लिटा कर रहुँगा।”

 

 

 

उनके इस तरह खुली बात करने से मैं घबरा गयी। मैंने सामने देखा तो दोनों भाई बहन अपनी धुन में थे। मैं अपना निचला होंठ काट कर रह गयी। मैंने चुप रहना ही उचित समझा। जितनी शिकायत करती, दोनों भाई बहन मुझे और ज्यादा खींचते। उनकी हरकतों से अब मुझे भी मज़ा आने लगा। मेरी चूत गीली होने लगी। लेकिन मैं चुप चाप अपनी नजरें झुकाये बैठी रही। सब हंसी मजाक में लगे थे। दोनों को इसकी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि उनकी पीठ के ठीक पीछे किस तरह का खेल चल रहा था। मैं नयी नवेली दुल्हन कुछ तो शरम के मारे और कुछ परिवार वालों के खुले विचारों को देखते हुए चुप थी। वैसे मैं भी अब कोई दूध की धुली तो थी नहीं। ससुर जी के साथ हमबिस्तर होते-होते रह गयी थी। इसलिये मैंने मामुली विरोध और कसमसाने के अलावा कोई हरकत नहीं की।

 

 

 

उसने मुझे आगे को झुका दिया और हाथ मेरी पीठ पर ले जाकर मेरी ब्रा के स्ट्रैप खोल दिये। ब्लाऊज़ में मेरे बूब्स ढीले हो गये। अब वो आराम से ब्लाऊज़ के अंदर मेरे बूब्स को मसलने लगे। उसने मेरे ब्लाऊज़ के बटन खोल कर मेरे बूब्स बिल्कुल नंगे कर दिये। सलमान ने अपना सर कंबल के अंदर करके मेरे नंगे मम्मों को चूम लिया। उसने अपने होंठों के बीच एक-एक करके मेरे निप्पल लेकर कुछ देर चूसा। मैं डर के मारे एक दम स्तब्ध रह गयी। मैं साँस भी रोक कर बैठी हुई थी। ऐसा लग रहा था मानो मेरी साँसों से भी हमारी हरकतों का पता चल जायेगा। कुछ देर तक मेरे निप्पल चूसने के बाद उन्होंने वापस अपना सिर बाहर निकाला। अब उन्होंने अपने हाथों से मेरे हाथ को पकड़ लिया। मेरी पतली-पतली अँगुलियों को कुछ देर तक चूसते और चूमते रहे। फिर धीरे से उसे पकड़ कर पैंट के ऊपर अपने लंड पर रखा। कुछ देर तक वहीं पर दबाये रखने के बाद मैंने अपने हाथों से उनके लंड को एक बार मुठ्ठी में लेकर दबा दिया। वो तब मेरी गर्दन पर हल्के-हल्के से अपने दाँत गड़ा रहे थे। मेरे कानों की एक लौ अपने मुँह में लेकर चूसने लगे।

 

 

 

पता नहीं कब उन्होंने अपने पैंट की ज़िप खोल कर अपना लंड बाहर निकाल लिया। मुझे तो पता तब लगा जब मेरे हाथ उनके नंगे लंड को छू गये। मैं अपने हाथ को खींच रही थी मगर उनकी पकड़ से छुड़ा नहीं पा रही थी।

 

 

 

जैसे ही मेरे हाथ ने उसके लंड के चमड़े को छुआ तो पूरे जिस्म में एक सिहरन सी दौड़ गयी। उनका लंड पूरी तरह तना हुआ था। लंड तो क्या, मानो मैंने अपने हाथों में कोइ गरम सलाख पकड़ ली हो। मेरी ज़ुबान तालू से चिपक गयी और मुँह सूखने लगा। मेरे हसबैंड और ननद सामने बैठे थे और मैं नयी दुल्हन एक गैर मर्द का लंड अपने हाथों में थामे हुए थी। मैं शरम और डर से गड़ी जा रही थी। मगर मेरी ज़ुबान को तो मानो लकवा मार गया था। अगर कुछ बोलती तो पता नहीं सब क्या सोचते। मेरी चुप्पी को उसने मेरी रज़ामंदी समझा। उसने मेरे हाथ को मजबूती से अपने लंड पर थाम रखा था। मैंने धीरे-धीरे उसके लंड को अपनी मुठ्ठी में ले लिया। उसने अपने हाथ से मेरे हाथ को ऊपर नीचे करके मुझे उसके लंड को सहलाने का इशारा किया। मैं उसके लंड को सहलाने लगी। जब उन्हें यकीन हो गया तो उन्होंने मेरे हाथ को छोड़ दिया और मेरे चेहरे को पकड़ कर अपनी ओर मोड़ा। मेरे होंठों पर उनके होंठ चिपक गये। मेरे होंठों को अपनी जीभ से खुलवा कर मेरे मुँह में अपनी जीभ घुसा दी। मैं डर के मारे काँपने लगी। जल्दी ही उन्हें धक्का देकर अपने से अलग किया। उन्होंने अपने हाथों से मेरी साड़ी ऊँची करनी शुरू की। उनके हाथ मेरी नंगी जाँघों पर फिर रहे थे। मैंने अपनी टाँगों को कस कर दबा रखा था इसलिये उन्हें मेरी चूत तक पहुँचने में कामयाबी नहीं मिल रही थी। मैं उनके लंड पर जोर-जोर से हाथ चला रही थी। कुछ देर बाद उनके मुँह से हल्की हल्की “आआह ऊऊह” जैसी आवाजें निकलने लगी जो कि कार की आवाज में दब गयी थी। उनके लंड से ढेर सारा गाढ़ा-गाढ़ा वीर्य निकल कर मेरे हाथों पर फ़ैल गया। मैंने अपना हाथ बाहर निकाल लिया। वो वापस मेरे हाथ को पकड़ कर मुझे जबरदस्ती उनके वीर्य को चाट कर साफ़ करने लिये मजबूर करने लगे मगर मैंने उनकी चलने नहीं दी। मुझे इस तरह की हरकत बहुत गंदी और वाहियात लगती थी। इसलिये मैंने उनकी पकड़ से अपना हाथ खींच कर अपने रुमाल से पोंछ दिया। कुछ देर बाद मेरे हसबैंड कार रोक कर पीछे आ गये तो मैंने राहत की साँस ली।

 

 

 

हम होटल में पहुँचे। दो डबल रूम बूक कर रखे थे। उस दिन ज्यादा घूम नहीं सके। शाम को हम सब उनके कमरे में बैठ कर ही बातें करने लगे। फिर देर रात तक ड्रिंक करते हुए ताश खेलते रहे। जब हम उठने लगे तो सलमान ने हमें रोक लिया।

 

 

 

“अरे यहीं सो जाओ.... अब इस हालत में कैसे चल कर अपने रूम तक जाओगे” उन्होंने गहरी नजरों से मुझे देखते हुए कहा।

 

 

 

जावेद ने सारी बात मुझ पर छोड़ दी, “मुझे क्या है.... इससे पूछ लो।”

 

 

 

सलमान मेरी तरफ़ मुस्कुराते हुए देख कर बोले, “लाईट बंद कर देंगे तो कुछ भी नहीं दिखेगा और वैसे भी ठंड के मारे रज़ाई तो लेनी ही पड़ेगी।”

 

 

 

“और क्या… कोई किसी को परेशान नहीं करेगा। जिसे अपने पार्टनर से जितनी मरज़ी हो, खेलो,” समीना आपा ने कहा।

 

 

 

जावेद ने झिझकते हुए उनकी बात मान ली। मैं चुप ही रही। वैसे भी नशे की हालत में मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था। लाईट ऑफ करके हम चारों एक ही डबल बेड पर लेट गये। मैं और समीना आपा बीच में सोये और दोनों मर्द किनारे पर। जगह कम थी इसलिये एक दूसरे से सट कर सो रहे थे। हम चारों के कपड़े बहुत जल्दी जिस्म से हट गये। हल्की-हल्की रोशनी में मैंने देखा कि सलमान ने समीना आपा को सीधा कर के दोनों पैर अपने कंधों पर रख दिये और धक्के मारने लगे। कंबल, रज़ाई सब उनके जिस्म से हटे हुए थे। मैंने हल्की रोशनी में उनके मोटे तगड़े लंड को देखा। समीना आपा लंड घुसते समय “आआह” कर उठी। जावेद का लंड उससे छोटा था। मैं सोच रही थी समीना आपा को कैसा मज़ा आ रहा होगा। सलमान समीना आपा को धक्के मार रहा था। जावेद मुझे घोड़ी बना कर मेरे पीछे से ठोकने लगा। पूरा बिस्तर हम दोनों जोड़ों के धक्कों से बुरी तरह हिल रहा था। कुछ देर बाद सलमान लेट गया और समीना आपा को अपने ऊपर ले लिया। अब समीना आपा उन्हें चोद रही थी। मेरे बूब्स जावेद के धक्कों से बुरी तरह हिल रहे थे। थोड़ी देर में मैंने महसूस किया कि कोई हाथ मेरे हिलते हुए बूब्स को मसलने लगा है। मैं समझ गयी कि वो हाथ जावेद का नहीं बल्कि सलमान का है। सलमान मेरे निप्पल को अपनी चुटकियों में भर कर मसल रहा था। मैं दर्द से कराह उठी। जावेद खुश हो गया कि उसके धक्कों ने मेरी चींख निकाल दी। काफी देर तक यूँ ही अपनी अपनी बीवी को ठोक कर दोनों निढाल हो गये।

 

 

 

दोनों जोड़े वहीं अलग अलग कंबल और रज़ाई में घुस कर बिना कपड़ों के ही अपने-अपने पार्टनर से लिपट कर सो गये। मैं और समीना आपा बीच में सोये थे और दोनों मर्द किनारे की ओर सोये थे। आधी रात को अचानक मेरी नींद खुली। मैं ठंड के मारे टाँगों को सिकोड़ कर सोयी थी। मुझे लगा मेरे जिस्म पर कोई हाथ फिरा रहा है। मेरी रज़ाई में एक तरफ़ जावेद सोया हुआ था। दूसरी तरफ़ से कोई रज़ाई उठा कर अंदर सरक गया और मेरे नंगे जिस्म से चिपक गया। मैं समझ गयी कि ये और कोई नहीं सलमान है। उसने कैसे समीना आपा को दूसरी ओर कर के खुद मेरी तरफ़ सरक आया, ये पता नहीं चला। उसके हाथ अब मेरी गाँड पर फिर रहे थे। फिर उसके हाथ मेरे दोनों चूतड़ों के बीच की दरार से होते हुए मेरी गाँड के छेद पर कुछ पल रुके और फिर आगे बढ़ कर मेरी चूत के ऊपर ठहर गये।

 

 

 

मैं बिना हिले डुले चुपचप पड़ी थी। देखना चाहती थी कि सलमान करता क्या है। डर भी रही थी क्योंकि मेरी दूसरी तरफ़ जावेद मुझ से लिपट कर सो रहे थे। सलमान का मोटा लंड खड़ा हो चुका था और मेरे चूतड़ों पर दस्तक दे रहा था।

 

 

 

सलमान ने पीछे से मेरी चूत में अपनी एक फिर दूसरी अँगुली डाल दी। मेरी चूत गीली होने लगी थी। टाँगों को मोड़ कर लेटे रहने के कारण मेरी चूत उसके सामने बिकुल खुली हुई तैयार थी। उसने कुछ देर तक मेरी चूत में अपनी अँगुलियों को अंदर बाहर करने के बाद अपने लंड के गोल टोपे को मेरी चूत के मुहाने पर रखा। मैंने अपने जिस्म को ढीला छोड़ दिया था। मैं भी किसी पराये मर्द की हरकतों से गरम होने लगी थी। उसने अपनी कमर से मेरी चूत पर एक धक्का लगाया।

 

 

 

“आआआहहहह ,” मेरे मुँह से ना चाहते हुए भी एक आवाज निकल गयी। तभी जावेद ने एक करवट बदली।

 

 

 

मैंने घबरा कर उठने का बहाना किया और सलमान को धक्का दे कर अपने से हटाते हुए उसके कान में फुसफुसा कर कहा, “प्लीज़ नहीं जावेद जाग गया तो कयामत आ जायेगी।”

 

 

 

“ठहरो जानेमन! कोई और इंतज़ाम करते हैं,” कहकर वो उठा और एक झटके से मुझे बिस्तर से उठा कर मुझे नंगी हालत में ही सामने के सोफ़े पर ले गया। वहाँ मुझे लिटा कर मेरी टाँगों को फैलाया। वो नीचे कार्पेट पर बैठ गया। फिर उसने अपना सिर मेरी जाँघों के बीच रख कर मेरी चूत पर जीभ फिराना शुरू किया। मैंने अपनी टाँगें छत की तरफ़ उठा दीं। वो अपने हाथों से मेरी टाँगों को थामे हुए था। मैंने अपने हाथों से उसके सिर को अपनी चूत पर दाब दिया। उसकी जीभ अब मेरी चूत के अंदर घुस कर मुझे पागल करने लगी। मैं अपने बालों को खींच रही थी तो कभी अपनी अँगुलियों से अपने निप्पल को जोर जोर से मसलती। अपने जबड़े को सख्ती से मैंने भींच रखा था जिससे किसी तरह की कोई आवाज मुँह से ना निकल जाये। लेकिन फिर भी काफी कोशिशों के बाद भी हल्की दबी-दबी कराह मुँह से निकल ही जाती थी। मैंने उसके ऊपर झुकते हुए फुसफुसाते हुए कहा, “आआहहह… ये क्या कर दिया आपने! मैं पागल हो जाऊँगीऽऽऽऽ प्लीऽऽऽऽज़ और बर्दाश्त नहीं हो रहा है.... अब आआआ जाओऽऽऽऽ।”

 

 

 

लेकिन वो नहीं हटा। कुछ ही देर में मेरा जिस्म उसकी हरकतों को नहीं झेल पाया और चूत रस की एक तेज़ धार बह निकली। मैं निढाल हो कर सोफ़े पर गिर गयी। फिर मैंने उसके बाल पकड़ कर उसके सिर को जबरदस्ती से मेरी चूत से हटाया।

 

 

 

“क्या करते हो। छी-छी इसे चाटोगे क्या?” मैंने उसको अपने चूत-रस का स्वाद लेने से रोका।

 

 

 

“मेरी चूत तप रही है.... इसमें अपने हथियार से चोद कर शाँत करो।” मैंने भूखी शेरनी की तरह उसे खींच कर अपने ऊपर लिटा लिया और उसके लंड को पकड़ कर सहलाने लगी। उसे सोफ़े पर धक्का दे कर उसके लंड को अपने हाथों से पकड़ कर अपने मुँह में ले लिया। मैंने कभी किसी के लंड को मुँह में लेना तो दूर कभी होंठों से भी नहीं छुआ था। जावेद बहुत जिद करते थे कि मैं उनके लंड को मुँह में डाल कर चूसूँ लेकिन मैं हर बार उनको मना कर देती थी। मैं इसे एक गंदा काम समझती थी। लेकिन आज ना जाने क्या हुआ कि मैं इतनी गरम हो गयी और बहुत नशे में भी थी कि खुद ही सलमान के लंड को अपने हाथों से पकड़ कर कुछ देर तक किस किया। जब सलमान ने मुझे उनके लंड को अपने मुँह में लेने का इशारा करते हुए मेरे सिर को अपने लंड पर हल्के से दबाया तो मैंने किसी तरह का विरोध ना करते हुए अपने होंठों को खोल कर अपने सिर को नीचे की ओर झुका दिया। उनके लंड से एक अजीब तरह की खुश्बू आ रही थी। कुछ देर यूँ ही मुँह में रखने के बाद मैं उनके लंड को चूसने लगी।

 

 

 

अब सारे डर और सारी शरम से मैं परे थी। ज़िंदगी में मुझे अब किसी की चिंता नहीं थी। बस एक जुनून था, एक गर्मी थी जो मुझे झुलसाये दे रही थी। मैं उसके लंड को मुँह में लेकर चूस रही थी। अब मुझे कोई चिंता नहीं थी कि सलमान मेरी हरकतों के बारे में क्या सोचेगा। बस मुझे एक भूख परेशान कर रही थी जो हर हालत में मुझे मिटानी थी। वो मेरे सिर को अपने लंड पर दाब कर अपनी कमर को ऊँचा करने लगा। कुछ देर बाद उसने मेरे सिर को पूरी ताकत से अपने लंड पर दबा दिया। मेरा दम घुट रहा था। उसके लंड से उसके वीर्य की एक तेज़ धार सीधे गले के भीतर गिरने लगी। उसके लंड के आसपास के बाल मेरे नाक में घुस रहे थे। पूरा रस मेरे पेट में चले जाने के बाद ही उसने मुझे छोड़ा। मैं वहीं जमीन पर भरभरा कर गिर गयी और तेज़-तेज़ सांसें लेने लगी।

 

 

 

वो सोफ़े पर अब भी टाँगों को फैला कर बैठा हुआ था। उसके सामने मैं अपने गले को सहलाते हुए जोर-जोर से साँसें ले रही थी। उसने अपने पैर को आगे बढ़ा कर अपने अंगूठे को मेरी चूत में डाल दिया। फिर अपने पैर को आगे पीछे चला कर मेरी चूत में अपने अंगूठे को अंदर बाहर करने लगा। बहुत जल्दी उसके लंड में वापस हरकत होने लगी। उसने आगे की ओर झुक कर मेरे निप्पल पकड़ कर अपनी ओर खींचे तो मैं दर्द से बचने के लिये उठ कर उसके पास आ गयी। अब उसने मुझे सोफ़े पर हाथों के बल झुका दिया। पैर कार्पेट पर ही थे। अब मेरी टाँगों को चौड़ा करके पीछे से मेरी चूत पर अपना लंड सटा कर एक जोरदार धक्का मारा। उसका मोटा लंड मेरी चूत के अंदर रास्ता बनाता हुआ घुस गया। चूत बुरी तरह गीली होने के कारण ज्यादा परेशानी नहीं हुई। बस मुँह से एक दबी-दबी कराह निकली आआआहहहह उसके लंड का साइज़ इतना बड़ा था कि मुझे लगा कि मेरे जिस्म को चीरता हुआ गले तक पहुँच जायेगा।

 

 

 

अब वो पीछे से मेरी चूत में अपने लंड से धक्के मारने लगा। उसके हर धक्के से मेरे मोटे-मोटे बूब्स उछल- उछल जाते। वो मेरी गर्दन को टेढ़ा करके मेरे होंठों को चूमने लगा और अपने हाथों से मेरे दोनों मम्मों को मसलने लगा। काफी देर तक इस तरह मुझे चोदने के बाद मुझे सोफ़े पर लिटा कर ऊपर से ठोकने लगा। मेरी चूत में सिहरन होने लगी और दोबारा मेरा चूत-रस निकल कर उसके लंड को भिगोने लगा। कुछ ही देर में उसका भी वीर्य मेरी चूत में फ़ैल गया। हम दोनों जोर-जोर से सांसें ले रह थे। वो मेरे जिस्म पर पसर गया। हम दोनों एक दूसरे को चूमने लगे।

 

 

 

तभी गजब हो गया.......

 

 

 

जावेद की नींद खुल गयी। वो पेशाब करने उठा था। हम दोनों की हालत तो ऐसी हो गयी मानो सामने शेर दिख गया हो। सलमान सोफ़े के पीछे छिप गया। मैं कहीं और छिपने की जगह ना पा कर बेड की तरफ़ बढ़ी। किसमत अच्छी थी कि जावेद को पता नहीं चल पाया। नींद और नशे में होने की वजह से उसका दिमाग ज्यादा काम नहीं कर पाया होगा। उसने सोचा कि मैं बाथरूम से होकर आ रही हूँ। जैसे ही वो बाथरूम में घुसा सलमान जल्दी से आकर बिस्तर में घुस गया।

 

 

 

“कल सुबह कोई बहाना बना कर होटल में ही पड़े रहना,” उसने मेरे कान में धीरे से कहा और समीना की दूसरी ओर जा कर लेट गया।

 

 

 

कुछ देर बाद जावेद आया और मेरे से लिपट कर सो गया। मेरी चूत से अभी भी सलमान का रस टपक रहा था। मेरे मम्मों का तो मसल-मसल कर और भी बुरा हाल कर रखा था। मुझे अब बहुत पछतावा हो रहा था। क्यों मैं जिस्म की गर्मी के आगे झुक गयी? क्यों किसी गैर-मर्द से मैंने रिश्ता बना लिया। अब मैं एक गर्त में गिरती जा रही थी जिसका कोई अंत नहीं था। मैंने अपने जज़्बातों को कंट्रोल करने की ठान ली। अगले दिन मैंने सलमान को कोई मौका ही नहीं दिया। मैं पूरे समय सबके साथ ही रही जिससे सलमान को मौका ना मिल सके। उसने कईं बार मुझसे अकेले में मिलने की कोशिश की मगर मैं चुपचाप वहाँ से खिसक जाती। वैसे उसे ज्यादा मौका भी नहीं मिल पाया था। हम तीन दिन वहाँ इंजॉय करके वापस लौट आये। हनीमून में मैंने और कोई मौका उसे नहीं दिया। कईं बार मेरे जिस्म को मसल जरूर दिया था उसने, लेकिन जहाँ तक चुदाई की बात है, मैंने उसकी कोई प्लैनिंग नहीं चलने दी।

 

 हनीमून के दौरान हमने मसूरी में खूब मजे किये। जावेद तो बस हर वक्त अपना हथियार खड़ा ही रखता था। सलमान अक्सर मुझसे मिलने के लिये एकाँत की खोज में रहते थे जिससे मेरे साथ बदमाशी कर सकें लेकिन मैं अक्सर उनकी चालों को समझ के अपना पहले से ही बचाव कर लेती थी।

 

 

 

इतना प्रिकॉशन रखने के बाद भी कईं बार मुझे अकेले में पकड़ कर चूम लेते या मेरे कानों में फुसफुसा कर अगले प्रोग्राम के बारे में पूछते। उन्हें शायद मेरे बूब्स सबसे ज्यादा पसंद थे। अक्सर मुझे पीछे से पकड़ कर मेरे मम्मों को अपने हाथों से मसलते रहते थे जब तक कि मैं दर्द के मारे उनसे छिटक कर अलग ना हो जाऊँ।

 

 

 

जावेद तो इतनी शैतानी करता था कि पूछो मत। काफी सारे स्नैप्स भी लिये। अपने और मेरे कुछ अंतरंग स्‍नैप्स भी खिंचवाये। खींचने वाले सलमान जी ही रहते थे। उनके सामने ही जावेद मुझे चूमते हुए, बिस्तर पर लिटा कर, मेरे बूब्स को ब्लाऊज़ के ऊपर से दाँतों से काटते हुए और मुझे अपने सामने बिठा कर मेरे ब्लाऊज़ के अंदर हाथ डाल कर मेरे मम्मों को मसलते हुए कईं फोटो खींचे।

 

 

 

एक बार पता नहीं क्या मूड आया, मैं जब नहा रही थी तो बाथरूम में घुस आये। मैं तब सिर्फ एक छोटी सी पैंटी में थी। वो खुद भी एक अंडरवीयर पहने हुए थे।

 

 

 

“इस पोज़ में एक फोटो लेटे हैं।” उन्होंने मेरे नंगे बूब्स को मसलते हुए कहा।

 

 

 

“नहीं! मैं सलमान के सामने इस हालत में?.. बिल्कुल नहीं.. पागल हो रहे हो क्या?” मैंने उसे साफ़ मना कर दिया।

 

 

 

“अरे इसमें शरम की क्या बात है। सलमान भाई तो घर के ही आदमी हैं। किसी को बतायेंगे थोड़े ही। एक बार देख लेंगे तो क्या हो जायेगा। तुम्हें खा थोड़ी जायेंगे|” जावेद अपनी बात पर जिद करने लगा।

 

 

 

“जावेद इतना खुलापन अच्छी बात नहीं है। सलमान घर के हैं तो क्या हुआ.... हैं तो पराये मर्द ही ना.... और हमसे बड़े भी हैं। इस तरह तो हमारे बीच पर्दे का रिश्ता हुआ। पर्दा तो दूर, तुम तो मुझे उनके सामने नंगी होने को कह रहे हो। कोई सुनेगा तो क्या कहेगा,” मैंने वापस झिड़का।

 

 

 

“अरे मेरी जान! ये दकियानुसी खयाल कब से पालने लग गयी तुम। कुछ नहीं होगा। मैं अपने पास एक तुम्हारी अंतरंग फोटो रखना चाहता हूँ जिससे हमेशा तुम्हारे इस संगमरमर जिस्म की खुश्बू आती रहे।”

 

 

 

मैंने लाख कोशिशें की मगर उन्हें समझा नहीं पायी। आखिर में राज़ी हुई मगर इस शर्त पर कि मैं जिस्म पर पैंटी के अलावा ब्रा भी पहने रहुँगी उनके सामने। जावेद इस के लिये राज़ी हो गये। मैंने झट से होल्डर पर टंगे अपने टॉवल से अपने जिस्म को पोंछा और ब्रा लेकर पहन ली। जावेद ने बाथरूम का दरवाजा खोल कर सलमान को फोन किया और उन्हें अपनी प्लैनिंग बतायी। सलमान मेरे जिस्म को नंगा देखने की लालसा में लगभग दौड़ते हुए कमरे में पहुँचे।

 

 

 

जावेद ने उन्हें बाथरूम के अंदर आने को कहा। वो बाथरूम में आये तो जावेद मुझे पीछे से अपनी बाँहों में संभाले शॉवर के नीचे खड़े हो गये। सलमान की नज़र मेरे लगभग नंगे जिस्म पर घूम रही थी। उनके हाथ में पोलैरॉयड कैमरा था।

 

 

 

"म्म्म्म्म.... बहुत गर्मी है यहाँ अंदर। अरे साले साहब! सिर्फ फोटो ही क्यों, कहो तो कैमकॉर्डर ले आऊँ। ब्लू फ़िल्म ही खींच लो,” सलमान ने हंसते हुए कहा।

 

 

 

“नहीं जीजा जी! मूवी में खतरा रहता है। छोटा सा स्नैप कहीं भी छिपा कर रख लो,” जावेद ने हँसते हुए अपनी आँख दबायी।

 

 

 

“आप दोनों बहुत गंदे हो।” मैंने कसमसाते हुए कहा तो जावेद ने अपने होंठ मेरे होंठों पर रख कर मेरे होंठ सील दिये।

 

 

 

“शॉवर तो ओन करो.... तभी तो सही फोटो आयेगा,” सलमान ने कैमरा का शटर हटाते हुए कहा।

 

 

 

मेरे कुछ बोलने से पहले ही जावेद ने शॉवर ऑन कर दिया। गरम पानी की फुहार हम दोनों को भिगोती चली गयी। मैंने अपनी छातियों को देखा। ब्रा पानी में भीग कर बिल्कुल पारदर्शी हो गयी थी और जिस्म से चिपक गयी थी। मैं शरम से दोहरी हो गयी। मेरी नजरें सामने सलमान पर गयीं तो मैंने पाया कि उनकी नजरें मेरे नाभी के नीचे टाँगों के जोड़ पर चिपकी हुई हैं। मैं समझ गयी कि उस जगह का भी वही हाल हो रहा होगा। मैंने अपने एक हाथ से अपनी छातियों को ढका और दूसरी हथेली को अपनी टाँगों के जोड़ पर अपने पैंटी के ऊपर रख दिया।

 

 

 

“अरे अरे क्या कर रही हो...... पूरा स्नैप बिगड़ जायेगा। कितना प्यारा पोज़ दिया था जावेद ने.... सारा बिगाड़ कर रख दिया।” मैं चुपचाप खड़ी रही। अपने हाथों को वहाँ से हटाने की कोई कोशिश नहीं की। वो तेज कदमों से आये और जिस हाथ से मैं अपनी बड़ी-बड़ी छातियों को उनकी नजरों से छिपाने की कोशिश कर रही थी, उसे हटा कर ऊपर कर दिया। उसे जावेद की गर्दन के पीछे रख कर कहा, “तुम अपनी बांहें पीछे जावेद की गर्दन पर लपेट दो।” फिर दूसरे हाथ को मेरी जाँघों के जोड़ से हटा कर जावेद की गर्दन के पीछे पहले हाथ पर रख कर उस मुद्रा में खड़ा कर दिया। जावेद हमारा पोज़ देखने में बिज़ी था और सलमान ने उसकी नज़र बचा कर मेरी चूत को पैंटी के ऊपर से मसल दिया। मैं कसमसा उठी तो उसने तुरंत हाथ वहाँ से हटा दिया।

 

 

 

फिर वो अपनी जगह जाकर लेंस सही करने लगा। मैं जावेद के आगे खड़ी थी और मेरी बांहें पीछे खड़े जावेद की गर्दन के इर्दगिर्द थी। जावेद के हाथ मेरे मम्मों के ठीक नीचे लिपटे हुए थे। उसने हाथों को थोड़ा सा उठाया तो मेरे बूब्स उनकी बाँहों के ऊपर टिक गये। नीचे की तरफ़ से उनके हाथों का दबाव होने की वजह से मेरे उभार और उघड़ कर सामने आ गये थे।

 

 

 

मेरे जिस्म पर कपड़ों का होना और ना होना बराबर था। सलमान ने एक स्नैप इस मुद्रा में खींची। तभी बाहर से अवाज आयी.... “क्या हो रहा है तुम तीनों के बीच?”

 

 

 

मैं आपा की आवाज सुनकर खुश हो गयी। मैं जावेद की बाँहों से फ़िसलकर निकल गयी।

 

 

 

"आपा.... । समीना आपा देखो ना। ये दोनों मुझे परेशान कर रहे हैं।” मैं शॉवर से बाहर आकर दरवाजे की तरफ़ बढ़ना चाहती थी लेकिन जावेद ने मेरी बाँह पकड़ कर अपनी ओर खींचा और मैं वापस उनके सीने से लग गयी। तब तक आपा अंदर आ चुकी थी। अंदर का माहोल देख कर उनके होंठों पर शरारती हंसी आ गयी।

 

 

 

“क्यों परेशान कर रहे हैं आप?” उन्होंने सलमान को झूठमूठ झिड़कते हुए कहा, “मेरे भाई की दुल्हन को क्यों परेशान कर रहे हो?”

 

 

 

"इसमें परेशानी की क्या बात है। जावेद इसके साथ एक इंटीमेट फोटो खींचना चाहता था, सो मैंने दोनों की एक फोटो खींच दी।” उन्होंने पोलैरॉयड की फोटो दिखाते हुए कहा।

 

 

 

“बड़ी सैक्सी लग रही हो।” आपा ने अपनी आँख मेरी तरफ़ देख कर दबायी।

 

 

 

“एक फोटो मेरा भी खींच दो ना इनके साथ।“ सलमान ने कहा।

 

 

 

“हाँ हाँ आपा! हम तीनों की एक फोटो खींच दो। आप भी अपने कपड़े उतारकर यहीं शॉवर के नीचे आ जाओ,” जावेद ने कहा।

 

 

 

“आपा आप भी इनकी बातों में आ गयी,” मैंने विरोध करते हुए कहा। लेकिन वहाँ मेरा विरोध सुनने वाला था ही कौन।

 

 

 

सलमान ने फटा फट अपने सारे कपड़े उतार कर टॉवल स्टैंड पर रख दिये। अब उनके जिस्म पर सिर्फ एक छोटी सी फ्रेंची थी। फ्रेंची के बाहर से उनका पूरा उभार साफ़ साफ़ दिख रहा था। मेरी आँखें बस वहीं पर चिपक गयी। वो मेरे पास आ कर मेरे दूसरी तरफ़ खड़े होकर मेरे जिस्म से चिपक गये। अब मैं दोनों के बीच में खड़ी थी। मेरी एक बाँह जावेद के गले में और दूसरी बाँह सलमान के गले पर लिपटी हुई थी। दोनों मेरे कंधे पर हाथ रखे हुए थे। सलमान ने अपने हाथ को मेरे कंधे पर रख कर सामने को झुला दी जिससे मेरा एक स्तन उनके हाथों में ठोकर मारने लगा। जैसे ही आपा ने शटर दबाया सलमान जी ने मेरे स्तन को अपनी मुठ्ठी में भर लिया और मसल दिया। मैं जब तक संभलती तब तक तो हमारा ये पोज़ कैमरे में कैद हो चुका था।

 

 

 

इस फोटो को सलमान ने संभाल कर अपने पर्स में रख लिया। सलमान तो हम दोनों के चुदाई के भी स्नैप्स लेना चाहता था लेकिन मैं एकदम से अड़ गयी। मैंने इस बार उसकी बिल्कुल नहीं चलने दी।

 

 

 

इसी तरह मस्ती करते हुए कब चार दिन गुजर गये पता ही नहीं चला।

 

 

 

हनीमून पर सलमान को मेरे संग और चुदाई का मौका नहीं मिला। बेचारे अपना मन मसोस कर रह गये। हनीमून मना कर वापस लौटने के कुछ ही दिनों बाद मैं जावेद के साथ मथुरा चली आयी। जावेद उस कंपनी के मथुरा विंग को संभालता था। मेरे ससुर जी दिल्ली के विंग को संभालते थे और मेरे जेठ जी उस कंपनी के रायबरेली के विंग के सी-ई-ओ थे।

 

 

 

दिल्ली में घर वापस आने के बाद सब तरह-तरह के सवाल पूछते थे। मुझे तरह-तरह से तंग करने के बहाने ढूँढते। मैं उन सबकी नोक झोंक से शरमा जाती थी।

 

 

 

मैंने महसूस किया कि जावेद अपनी भाभी नसरीन से कुछ अधिक ही घुले मिले थे। दोनों एक दूसरे से काफी मजाक करते और एक दूसरे को छूने की या मसलने की कोशिश करते। मेरा शक यकीन में तब बदल गया जब मैंने उन दोनों को अकेले में एक कमरे में एक दूसरे के आगोश में देखा। मैंने जब रात को जावेद से बात की तो पहले तो वो इंकार करता रहा लेकिन बार-बार जोर देने पर उसने स्वीकार किया कि उसके और उसकी भाभी में जिस्मानी ताल्लुकात भी हैं। दोनों अक्सर मौका ढूँढ कर सैक्स का लुत्फ़ उठाते हैं। उसकी इस कबुलियत ने जैसे मेरे दिल पर रखा पत्थर हटा दिया। अब मुझे ये ग्लानि नहीं रही कि मैं छिप-छिप कर अपने शौहर को धोखा दे रही हूँ। अब मुझे यकीन हो गया कि जावेद को किसी दिन मेरे जिस्मानी तल्लुकातों के बारे में पता भी लग गया तो कुछ नहीं बोलेंगे। मैंने थोड़ा बहुत दिखावे का रूठने का नाटक किया तो जावेद ने मुझे पुचकारते हुए वो मंज़ूरी भी दे दी। उन्होंने कहा कि अगर मैं भी किसी से जिस्मानी ताल्लुकात रखुँगी तो वो कुछ नहीं बोलेंगे।

 

 

 

अब मैंने लोगों की नजरों का ज्यादा खयाल रखना शुरू किया। मैं देखना चाहती थी कि कौन-कौन मुझे चाहत भरी नजरों से देखते हैं। मैंने पाया कि घर के तीनों मर्द मुझे कामुक निगाहों से देखते हैं। नन्दोई और ससुर जी के अलावा मेरे जेठ जी भी अक्सर मुझे निहारते रहते थे। मैंने उनकी इच्छाओं को हवा देना शुरू किया। मैं अपने कपड़ों और अपने पहनावे में काफी खुला पन रखती थी। आंदरूनी कपड़ों को मैंने पहनना छोड़ दिया। मैं सारे मर्दों को अपने जिस्म के भरपूर जलवे करवाती। जब मेरे कपड़ों के अंदर से झाँकते मेरे नंगे जिस्म को देख कर उनके कपड़ों के अंदर से लंड का उभार दिखने लगता तो ये देख कर मैं भी गीली होने लगती और मेरे निप्पल खड़े हो जाते। लेकिन मैं इन रिश्तों का लिहाज करके अपनी तरफ़ से चुदाई की हालत तक उन्हें आने नहीं देती।

 

 

 

एक चीज़ जो दिल्ली आने के बाद पता नहीं कहाँ और कैसे गायब हो गयी पता ही नहीं चला। वो थी हम दोनों की शॉवर के नीचे खींची हुई फोटो। मैंने मथुरा रवाना होने से पहले जावेद से पूछा मगर वो भी पूरे घर में कहीं भी नहीं ढूँढ पाया। मुझे जावेद पर बहुत गुस्सा आ रहा था। पता नहीं उस नंगी तसवीर को कहाँ रख दिया था। अगर गलती से भी किसी और के हाथ पड़ जाये तो?

 

 

 

खैर हम वहाँ से मथुरा आ गये। वहाँ हमारा एक शानदार मकान था। मकान के सामने गार्डन और उसमें लगे तरह-तरह के फूल एक दिलकश तसवीर पेश करते थे। दो नौकर हर वक्त घर के काम काज में लगे रहते थे और एक माली भी था। तीनों गार्डन के दूसरी तरफ़ बने क्वार्टर्स में रहते थे।  शाम होते ही काम निबटा कर उन्हें जाने को कह देती क्योंकि जावेद के आने से पहले मैं उनके लिये बन संवर कर तैयार रहती थी।

 

 

 

मेरे वहाँ पहुँचने के बाद जावेद के काफी सब-ऑर्डीनेट्स मिलने के लिये आये। उसके कुछ दोस्त भी थे। जावेद ने मुझे खास-खास कॉंट्रेक्टरों से भी मिलवाया। वो मुझे हमेशा एक दम बनठन के रहने के लिये कहते थे। मुझे सैक्सी और एक्सपोज़िंग कपड़ों मे रहने के लिये कहते थे। वहाँ पार्टियों और गेट- टूगेदर में सब औरतें एक दम सैक्सी कपड़ों में आती थी। जावेद वहाँ दो क्लबों का मेंबर था, जो सिर्फ बड़े लोगों के लिये थे। बड़े लोगों की पार्टियाँ देर रात तक चलती थीं और पार्टनर्स बदल-बदल कर डाँस करना, शराब पीना, उलटे सीधे मजाक करना और एक दूसरे के जिस्म को छूना आम बात थी।

 

 

 

शुरू-शुरू में तो मुझे बहुत शरम आती थी। लेकिन धीरे-धीरे मैं इस माहौल में ढल गयी। कुछ तो मैं पहले से ही चंचल थी और पहले गैर मर्द, मेरे नन्दोई ने मेरे शरम के पर्दे को तार-तार कर दिया था। अब मुझे किसी भी गैर मर्द की बाँहों में जाने में ज्यादा झिझक महसूस नहीं होती थी। जावेद भी तो यही चाहता था। जावेद चाहता था कि मुझे सब एक सिडक्टिव औरत के रूप में जानें। वो कहते थे कि जो औरत जितनी फ़्रैंक और ओपन मायंडिड होती है, उसका हसबैंड उतनी ही तरक्की करता है। इन सबका हसबैंड के रेप्यूटेशन पर और बिज़नेस पर भी फ़र्क पड़ता है।

 

 

 

हर हफ्ते एक-आध इस तरह की गैदरिंग हो ही जाती थी। मैं इनमें शमिल होती लेकिन किसी गैर मर्द से जिस्मानी ताल्लुकात से झिझकती थी। शराब पीने, नाच गाने तक और ऊपरी चूमा चाटी तक भी सब सही था, लेकिन जब बात बिस्तर तक आ जाती तो मैं चुपचाप अपने को उससे दूर कर लेती थी।

 

 

 

वहाँ आने के कुछ दिनों बाद जेठ और जेठानी वहाँ हमारे पास आये । जावेद भी समय निकाल कर घर में ही घुसा रहता था। बहुत मज़ा आ रहा था। खूब हंसी मजाक चलता। देर रात तक नाच गाने और पीने-पिलाने का प्रोग्राम चलता रहता था। फिरोज़ भाई जान और नसरीन भाभी काफी खुश मिजाज़ के थे। उनके निकाह को चार साल हो गये थे मगर अभी तक कोई औलाद नहीं हुई थी। ये एक छोटी कमी जरूर थी उनकी ज़िंदगी में मगर बाहर से देखने में क्या मज़ाल कि कभी कोई एक शिकन भी ढूँढ लें चेहरे पर। एक दिन दोपहर को खाने के साथ मैंने कुछ ज्यादा ही शराब पी ली। मैं सोने के लिये बेडरूम में आ गयी। बाकी तीनों ड्राइंग रूम में गपशप कर रहे थे। शाम तक यही सब चलना था इसलिये मैंने अपने कमरे में आकर फटाफट अपने कपड़े उतारे और नशे में एक हल्का सा फ्रंट ओपन गाऊन डाल कर बिस्तर पर गिर पड़ी। अंदर कुछ भी नहीं पहन रखा था और मुझे अपने सैंडल उतारने तक का होश नहीं था। पता नहीं नशे में चूर मैं कब तक सोती रही। अचानक कमरे में रोशनी होने से नींद खुली। मैंने अलसाते हुए आँखें खोल कर देखा तो बिस्तर पर मेरे पास जेठ जी बैठे मेरे खुले बालों पर मोहब्बत से हाथ फ़िरा रहे थे। मैं हड़बड़ा कर उठने लगी तो उन्होंने उठने नहीं दिया।

 

 

 

“लेटी रहो,” उन्होंने माथे पर अपनी हथेली रखते हुए कहा,  “अब कैसा लग रहा है शहनाज़?”

 

 

 

“अब काफी अच्छा लग रहा है।” तभी मुझे एहसास हुआ कि मेरा गाऊन सामने से कमर तक खुला हुआ है और मेरी गोरी-चिकनी चूत जेठ जी को मुँह चिढ़ा रही है। कमर पर लगे बेल्ट की वजह से पूरी नंगी होने से रह गयी थी लेकिन ऊपर का हिस्सा भी अलग होकर एक निप्पल को बाहर दिखा रहा था। मैं शरम से एक दम पानी-पानी हो गयी। मैंने झट अपने गाऊन को सही किया और उठने लगी। जेठजी ने झट अपनी बाँहों का सहारा दिया। मैं उनकी बाँहों का सहारा ले कर उठ कर बैठी लेकिन सिर जोर का चकराया और मैंने सिर को अपने दोनों हाथों से थाम लिया। जेठ जी ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया। मैंने अपने चेहरे को उनके घने बालों से भरे मजबूत सीने में घुसा कर आँखें बंद कर लीं। मुझे आदमियों का घने बालों से भरा सीना बहुत सैक्सी लगता है। जावेद के सीने पर बाल बहुत कम हैं लेकिन फिरोज़ भाई जान का सीना घने बालों से भरा हुआ है। कुछ देर तक मैं यूँ ही उनके सीने में अपने चेहरे को छिपाये उनके जिस्म से निकलने वाली खुश्बू अपने जिस्म में समाती रही। कुछ देर बाद उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में संभाल कर मुझे बिस्तर के सिरहाने से टिका कर बिठाया। मेरा गाऊन वापस अस्त-व्यस्त हो रहा था। जाँघों तक टांगें नंगी हो गयी थी। मैंने अपने सैंडल खोलने के लिये हाथ आगे बढ़ाया तो वो बोले पड़े, “इन्हें रहने दो शहनाज़ .... अच्छे लगते हैं तुम्हारे पैर इन स्ट्रैपी हाई-हील सैंडलों में।” मैं मुस्कुरा कर फिर से पीछे टिक कर बैठ गयी।

 

 

 

मुझे एक चीज़ पर खटका हुआ कि मेरी जेठानी नसरीन और जावेद नहीं दिख रहे थे। मैंने सोचा कि दोनों शायद हमेशा कि तरह किसी चुहलबाजी में लगे होंगे या वो भी मेरी तरह नशे में चूर होकर कहीं सो रहे होंगे। फिरोज़ भाई जान ने मुझे बिठा कर सिरहाने के पास से ट्रे उठा कर मुझे एक कप कॉफी दी।

 

 

 

“ये... ये आपने बनायी है?” मैं चौंक गयी क्योंकि मैंने कभी जेठ जी को किचन में घुसते नहीं देखा था।

 

 

 

“हाँ! क्यों अच्छी नहीं बनी है?” फिरोज़ भाई जान ने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा।

 

 

 

“नहीं नहीं! बहुत अच्छी बनी है,” मैंने जल्दी से एक घूँट भर कर कहा, “लेकिन भाभी जान और वो कहाँ हैं?”

 

 

 

"वो दोनों कोई फ़िल्म देखने गये हैं... छः से नौ.... नसरीन जिद कर रही थी तो जावेद उसे ले गया है।”

 

 

 

“लेकिन आप? आप नहीं गये?” मैंने हैरानी से पूछा।

 

 

 

“तुम नशे में चूर थीं। अगर मैं भी चला जाता तो तुम्हारी देख भाल कौन करता?” उन्होंने वापस मुस्कुराते हुए कहा। फिर बात बदलने के लिये मुझसे आगे बोले, “मैं वैसे भी तुमसे कुछ बात कहने के लिये तनहाई खोज रहा था।”

 

 

 

“क्यों? ऐसी क्या बात है?”

 

 

 

“तुम बुरा तो नहीं मानोगी ना?”

 

 

 

“नहीं! आप बोलिये तो सही,” मैंने कहा।

 

 

 

“मैंने तुमसे पूछे बिना दिल्ली में तुम्हारे कमरे से एक चीज़ उठा ली थी,” उन्होंने हिचकते हुए कहा।

 

 

 

“क्या?”

 

 

 

“ये तुम दोनों की फोटो,” कहकर उन्होंने हम दोनों की हनीमून पर सलमान द्वारा खींची वो फोटो सामने की जिसमें मैं लगभग नंगी हालत में जावेद के सीने से अपनी पीठ लगाये खड़ी थी। इसी फोटो को मैं अपने ससुराल में चारों तरफ़ खोज रही थी। लेकिन मिली ही नहीं थी। मिलती भी तो कैसे, वो स्नैप तो जेठ जी अपने सीने से लगाये घूम रहे थे। मेरे होंठ सूखने लगे। मैं फटीफटी आँखों से एक टक उनकी आँखों में झाँकती रही। मुझे उनकी गहरी आँखों में अपने लिये मोहब्बत का बेपनाह सागर उफ़नते हुए दिखायी दिया।

 

 

 

“आ... आप ने ये फोटो रख ली थी?”

 

 

 

“हाँ इस फोटो में तुम बहुत प्यारी लग रही थीं... किसी जलपरी की तरह। मैं इसे हमेशा साथ रखता हूँ।”

 

 

 

“क्यों.... क्यों...? मैं आपकी बीवी नहीं, ना ही माशुका हूँ। मैं आपके छोटे भाई की ब्याहता हूँ। आपका मेरे बारे में ऐसा सोचना भी मुनासिब नहीं है।” मैंने उनके शब्दों का विरोध किया।

 

 

 

“सुंदर चीज़ को सुंदर कहना कोई पाप नहीं है, ” फिरोज़ भाई जान ने कहा,  “अब मैं अगर तुमसे नहीं बोलता तो तुमको पता चलता? मुझे तुम अच्छी लगती हो तो इसमें मेरा क्या कसूर है?”

 

 

 

“दो... वो स्नैप मुझे दे दो! किसी ने उसको आपके पास देख लिया तो बातें बनेंगी,” मैंने कहा।

 

 

 

“नहीं वो अब मेरी अमानत है। मैं उसे किसी भी कीमत पर अपने से अलग नहीं करुँगा।”

 

 

 

मैं उनका हाथ थाम कर बिस्तर से उतरी। जैसे ही उनका सहारा छोड़ कर बाथरूम तक जाने के लिये दो कदम आगे बढ़ी तो अचानक सर बड़ी जोर से घूमा और मैं हाई-हील सैंडलों में लड़खड़ा कर गिरने लगी। इससे पहले कि मैं जमीन पर भरभरा कर गिर पड़ती, फिरोज़ भाई जान लपक कर आये और मुझे अपनी बाँहों में थाम लिया। मुझे अपने जिस्म का अब कोई ध्यान नहीं रहा। मेरा जिस्म लगभग नंगा हो गया था। उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में फूल की तरह उठाया और बाथरूम तक ले गये। मैंने गिरने से बचने के लिये अपनी बाँहों का हार उनकी गर्दन पर पहना दिया। दोनों किसी नौजवान जोड़े की तरह लग रहे थे। उन्होंने मुझे बाथरूम के भीतर ले जाकर उतारा।

 

 

 

“मैं बाहर ही खड़ा हूँ। तुम फ़्रेश हो जाओ तो मुझे बुला लेना। संभालकर उठना-बैठना,” फिरोज़ भाई जान मुझे हिदायतें देते हुए बाथरूम के बाहर निकल गये और बाथरूम के दरवाजे को बंद कर दिया। मैंने पेशाब करके लड़खड़ाते हुए अपने कपड़ों को सही किया जिससे वो फिर खुल कर मेरे जिस्म को बेपर्दा ना कर दें। मैं अब खुद को ही कोस रही थी कि किस लिये मैंने अपने अंदरूनी कपड़े उतारे। मैं जैसे ही बाहर निकली तो वो बहर दरवाजे पर खड़े मिल गये। वो मुझे दरवाजे पर देख कर लपकते हुए आगे बढ़े और मुझे अपनी बाँहों में भर कर वापस बिस्तर पर ले आये।

 

 

 

मुझे सिरहाने पर टिका कर मेरे कपड़ों को अपने हाथों से सही कर दिया। मेरा चेहरा तो शरम से लाल हो रहा था।

 

 

 

“अपने इस हुस्‍न को जरा संभाल कर रखिये वरना कोई मर ही जायेगा… आहें भर भर कर,” उन्होंने मुस्कुरा कर कहा। फिर साईड टेबल से एक एस्प्रीन निकाल कर मुझे दिया। फिर वापस मेरे कप में कुछ कॉफी भरकर मुझे दी और बोले, “लो इससे तुम्हारा हेंगओवर ठीक हो जायेगा।” मैंने कॉफी के साथ दवाई ले ली।

 

 

 

“लेकिन एक बात अब भी मुझे खटक रही है। वो दोनों आप को साथ क्यों नहीं ले गये…। आप कुछ छिपा रहे हैं... बताइये ना…।”

 

 

 

“कुछ नहीं शहनाज़ मैं तुम्हारे कारण रुक गया। कसम तुम्हारी।”

 

 

 

लेकिन मेरे बहुत जिद करने पर वो धीरे धीरे खुलने लगे।

 

 

 

वो भी असल में कुछ तनहाई चाहते थे।

 

 

 

“मतलब?” मैंने पूछा।

 

 

 

“नहीं तुम बुरा मान जाओगी। मैं तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहता।”

 

 

 

“मुझे कुछ नहीं होगा! आप कहो तो.... क्या आप कहना चाहते हैं कि जावेद और नसरीन भाभी जान के बीच.....” मैंने जानबूझ कर अपने वाक्य को अधुरा ही रहने दिया।

 

 

 

वो भोंचक्के से कुछ देर तक मेरी आँखों में झाँकते रहे।

 

 

 

“मुझे सब पता है.... मुझे पहले ही शक हो गया था। जावेद को जोर देकर पूछा तो उसने कबूल कर लिया।”

 

 

 

“तुम..... तुमने कुछ कहा नहीं? तुम नयी बीवी हो उसकी..... तुमने उसका विरोध नहीं किया?” फिरोज़ ने पूछा। “विरोध तो आप भी कर सकते थे। आप को सब पता था लेकिन आप ने कभी दोनों को कुछ कहा नहीं। आप तो मर्द हैं और उनसे बड़े भी,” मैंने उलटा उनसे ही सवाल किया।

 

 

 

“चाह कर भी कभी नहीं किया। मैं दोनों को बेहद चाहता हूँ और.....”

 

 

 

“और क्या?”

 

 

 

“और..... नसरीन मुझे कमज़ोर समझती है।” कहते हुए उन्होंने अपना चेहरा नीचे झुका लिया। मैं उस प्यारे इंसान की परेशानी पर अपने को रोक नहीं पायी और मैंने उनके चेहरे को अपनी हथेली में भरकर उठाया। मैंने देखा कि उनकी आँखों के कोनों पर दो आँसू चमक रहे हैं। मैं ये देख कर तड़प उठी। मैंने अपनी अँगुलियों से उनको पोंछ कर उनके चेहरे को अपने सीने पर खींच लिया। वो किसी बच्चे की तरह मेरी छातियों से अपना चेहरा सटाये हुए थे।

 

 

 

“आपने कभी किसी डॉक्टर से जाँच क्यों नहीं करवायी?” मैंने उनके बालों में अपनी अँगुलियाँ फ़िराते हुए पूछा।

 

 

 

“दिखाया था... कईं बार चेक करवाया...”

 

 

 

“फिर?”

 

 

 

“डॉक्टर ने कहा....” दो पल को वो रुके। ऐसा लगा मानो सोच रहे हों कि मुझे बतायें या नहीं। फिर धीरे से बोले, “मुझ में कोई कमी नहीं है।“

 

 

 

“क्या?” मैं जोर से बोली, “फिर भी आप सारा कसूर अपने ऊपर लेकर चुप बैठे हैं। आपने भाभी जान को बताया क्यों नहीं? ये तो बुजदिली है!”

 

 

 

“अब तुम इसे मेरी बुजदिली समझो चाहे जो भी। लेकिन मैं उसकी उम्मीद को तोड़ना नहीं चाहता। भले ही वो सारी ज़िंदगी मुझे एक नामर्द समझती रहे।”

 

 

 

“मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है लेकिन मैं आपको वो दूँगी जो नसरीन भाभी जान ने नहीं दिया।”

 

 

 

उन्होंने चौंक कर मेरी तरफ़ देखा। उनकी गहरी आँखों में उत्सुक्ता थी मेरी बात का आशय सुनने की। मैंने आगे कहा, “मैं आपको अपनी कोख से एक बच्चा दूँगी।”

 

 

 

“क्या???? कैसे??” वो हड़बड़ा उठे।

 

 

 

“अब इतने बुद्धू भी आप हो नहीं कि समझाना पड़े कैसे!” मैं उनके सीने से लग गयी, “अगर वो दोनों आपकी चिंता किये बिना जिस्मानी ताल्लुकात रख सकते हैं तो आपको किसने ऐसा करने से रोका है?” मैंने अपनी आँखें बंद करके फुसफुसाते हुए कहा जो उनके अलावा किसी और को सुनायी नहीं दे सकता था।

 

 इतना सुनना था कि उन्होंने मुझे अपने सीने में दाब लिया। मैंने अपना चेहरा ऊपर उठाया तो उनके होंठ मेरे होंठों से आ मिले। मेरा जिस्म कुछ तो दोपहर के नशे से और कुछ उत्तेजना से तप रहा था। मैंने अपने होंठ खोल कर उनके होंठों का स्वागत किया। उन्होंने मुझे इस तरह चूमना शुरू किया मानो बरसों के भूखे हों। मैं उनके चौड़े सेने के बालों पर अपनी अँगुलियाँ फेर रही थी। उन्होंने मेरे जिस्म पर बंधी गाऊन की उस डोर को खींच कर खोल दिया। अब मैं सिर्फ सैंडल पहने, पूरी तरह नंगी उनके सामने थी। मैंने भी उनके पायजामे के ऊपर से उनके लंड को अपने हाथों से थाम कर सहलाना शुरू किया।

 

 

 

“मममम… काफी मोटा है। भाभी जान को तो मज़ा आ जाता होगा?” मैंने उनके लंड को अपनी मुठ्ठी में भर कर दबाया। फिर पायजामे की डोरी को खोल कर उनके लंड को बाहर निकाला। उनका लंड काफी मोटा था। उनके लंड के ऊपर का सुपाड़ा एक टेनिस की गेंद की तरह मोटा था। फिरोज़ भाई जान गोरे चिट्टे थे लेकिन लंड काफी काला था। उनके लंड के मुँह से पानी जैसा चिपचिपा रस निकल रहा है। मैंने उनकी आँखों में झाँका। वो मेरी हरकतों को गोर से देख रहे थे। मैं उनको इतनी खुशी देना चाहती थी जितनी नसरीन भाभी जान ने भी नहीं दी होगी। मैंने अपनी जीभ पूरी बाहर निकाली और स्लो मोशन में अपने सिर को उनके लंड पर झुकाया। मेरी आँखें लगातार उनके चेहरे पर टिकी हुई थी। मैं उनके चेहरे पर उभरने वाली खुशी को अपनी आँखों से देखना चाहती थी। मैंने अपनी जीभ उनके लंड के टिप पर लगायी और उससे निकलने वाले रस को चाट कर अपनी जीभ पर ले लिया। फिर उसी तरह धीरे-धीरे मैंने अपना सिर उठा कर अपनी जीभ पर लगे उनके रस को उनकी आँखों के सामने किया और मुँह खोल कर जीभ अंदर कर ली। मुझे अपना रस पीते देख वो खुशी से भर उठे और वापस मेरे चेहरे पर अपने होंठ फिराने लगे। वो मेरे होंठों को, मेरे कानों को, मेरी आँखों को, गालों को चूमे जा रहे थे और मैं उनके लंड को अपनी मुठ्ठी में भर कर सहला रही थी। मैंने उनके सिर को पकड़ कर नीचे अपनी चूचियों से लगाया। उन्होंने जीभ निकाल कर दोनों चूचियों के बीच की गहरी खायी में फ़िरायी। फिर एक मम्मे को अपने हाथों से पकड़ कर उसके निप्पल को अपने मुँह में भर लिया। मेरे निप्पल पहले से ही तन कर कड़े हो गये थे। वो एक निप्पल को चूस रहे थे और दूसरे मम्मे को अपनी हथेली में भर कर मसल रहे थे। पहले तो उन्होंने धीरे-धीरे मसला मगर कुछ ही देर में दोनों मम्मे पूरी ताकत से मसल-मसल कर लाल कर दिये। मैं उत्तेजना में सुलगने लगी। मैंने उनके लंड के नीचे उनकी गेंदों को अपनी मुठ्ठी में भर कर सहलाना शुरू किया। वो बीच-बीच में मेरे फूले हुए निप्पल को दाँतों से काट रहे थे और कभी जीभ से निप्पल को छेड़ने लगते। मैं “सीईऽऽऽऽ आआआहहऽऽऽऽऽ  मममऽऽऽऽ ऊँऊँऽऽऽऽ” जैसी आवाजें निकालने से खुद को नहीं रोक पा रही थी। उनके होंठ दोनों मम्मों पर घूमने लगे और जगह-जगह मेरे मम्मों को काट-काट कर अपने मिलन की निशानी छोड़ने लगे। पूरे मम्मों पर लाल-लाल दाँतों के निशान उभार आये। मैं दर्द और उत्तेजना में “सीईऽऽऽ सीईऽऽऽ” कर रही थी और अपने हाथों से अपने मम्मों को उठाकर उनके मुँह में दे रही थी।

 

 

 

“कितनी खूबसूरत हो…” फिरोज़ भाई जान ने मेरे दोनों बूब्स को पकड़ कर खींचते हुए कहा।

 

 

 

 

“आगे भी कुछ करोगे या इनसे ही चिपके रहने की मरज़ी है?” मैंने उनको प्यार भरी एक झिड़की दी। निप्पल लगातार चूसते रहने की वजह से दुखने लगे थे। मम्मों पर जगह-जगह उनके दाँतों के काटने से लाल-लाल निशान उभरने लगे थे। मैं काफी उत्तेजित हो गयी थी। जावेद इतना फोर-प्ले कभी नहीं करता था। उसको तो बस टाँगें चौड़ी करके अंदर डाल कर धक्के लगाने में ही मज़ा आता था।

 

 

 

उन्होंने मेरी टाँगें पकड़ कर नीचे कीं ओर खींचा तो मैं बिस्तर पर लेट गयी। अब उन्होंने मेरी दोनों टाँगें उठा कर उनके नीचे दो तकिये लगा दिये जिससे मेरी चूत ऊपर को उठ गयी। मैंने अपनी टाँगों को चौड़ा करके छत की ओर उठा दीं। फिर उनके सिर को पकड़ कर अपनी चूत के ऊपर दबा दिया। फिरोज़ भाई जान अपनी जीभ निकाल कर मेरी चूत के अंदर उसे डाल कर घुमाने लगे। मेरे पूरे जिस्म में सिहरन सी दौड़ने लगी। मैं अपनी कमर को और ऊपर उठाने लगी जिससे उनकी जीभ ज्यादा अंदर तक जा सके। मेरे हाथ बिस्तर को मजबूती से थामे हुए थे। मेरी आँखों की पुतलियाँ पीछे की ओर उलट गयी और मेरा मुँह खुल गया। मैं जोर से चींख पड़ी, “हाँऽऽऽ और अंदरऽऽ। फिरोज़ आआआहहहऽऽऽऽ ऊऊऊहहहऽऽऽ इतनेऽऽऽ दिन कहाँ थेऽऽऽ। मैंऽऽऽ पाऽऽऽगल हो जाऊँऽऽऽगीऽऽऽ.... ऊऊऽऽऽहहहऽऽऽ ऊऊऊईईईई माँऽऽऽ क्याऽऽऽ कर रहे होऽऽऽऽ फिरोज़ मुझेऽऽऽ संभालोऽऽऽऽ मेराऽऽऽ छूटनेऽऽऽ वालाऽऽऽऽ हैऽऽऽ। फिरोऽऽज़ इसीऽऽऽ तरह साऽऽऽरी ज़िंदगीऽऽऽ तुम्हारी दूऽऽसरीऽऽऽ बीवी बनकर चुदवातीऽऽऽ रहुँऽऽऽऽगी।” एक दम से मेरी चूत से रस की बाढ़ सी आयी और बाहर की ओर बह निकली। मेरा पूरा जिस्म किसी पत्ते की तरह काँप रहा था। काफी देर तक मेरा झड़ना चलता रहा। जब सारा रस फिरोज़ भाई जान के मुँह में उढ़ेल दिया तो मैंने उनके सर को पकड़ कर उठाया। उनकी मूछें, नाक, होंठ सब मेरे रस से सने हुए थे। उन्होंने अपनी जीभ निकाली और अपने होंठों पर फिरायी।

 

 

 

“छी… गंदे!” मैंने उनसे कहा।

 

 

 

“इसमें गंदी वाली क्या बात हुई? ये तो टॉनिक है। तुम मेरा टॉनिक पी कर देखना.... अगर जिस्म में रंगत ना आजये तो कहना।”

 

 

 

“जानु अब आ जाओ!” मैंने उनको अपने ऊपर खींचा, “मेरा जिस्म तप रहा है। नशे की खुमारी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है.... इससे पहले कि मैं पागल हो जाऊँ मेरे अंदर अपना बीज डाल दो।”

 

 

 

फिरोज़ भाई जान ने अपने लंड को मेरे मुँह से लगाया।

 

 

 

“एक बार मुँह में तो लो..... उसके बाद तुम्हारी चूत में डालुँगा। पहले एक बार प्यार तो करो इसे!” मैंने उनके लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ा और अपनी जीभ निकाल कर उसे चूसना और चाटना शुरू कर दिया। मैं अपनी जीभ से उनके लंड को एकदम नीचे से ऊपर तक चाट रही थी और अपनी जीभ से उनके लंड के नीचे लटकते हुए अंडकोशों को भी चाट रही थी। उनका लंड मुझे बड़ा प्यारा लग रहा था। मैं उनके लंड को चाटते हुए उनके चेहरे को देख रही थी। उनका उत्तेजित चेहरा बड़ा प्यारा लग रहा था। दिल को सकून मिल रहा था कि मैं उन्हें कुछ तो आराम दे पाने में कामयाब रही थी। उन्होंने मुझे इतना प्यार दिया था कि उसका एक टुकड़ा भी मैं वापस अगर दे सकी तो मुझे अपने ऊपर फ़ख्र होगा।

 

 

 

उनके लंड से चिपचिपा सा बेरंग का प्री-कम निकल रहा था जिसे मैं बड़ी बेकरारी से चाट कर साफ़ कर देती थी। मैं काफी देर तक उनके लंड को तरह-तरह से चाटती रही। उनका लंड काफ़ी मोटा था इसलिये मुँह के अंदर ज्यादा नहीं ले पा रही थी और इसलिये जीभ से चाट-चाट कर ही उसे गीला कर दिया था। कुछ देर बाद उनका लंड झटके खाने लगा। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रख कर मुझे रुकने का इशारा किया।

 

 

 

“बस..... बस..... और नहीं! नहीं तो अंदर जाने से पहले ही निकल जायेगा,” कहते हुए उन्होंने मेरे हाथों से अपने लंड को छुड़ा लिया और मेरी टाँगों को फैला कर उनके बीच घुटने मोड़ कर झुक गये। उन्होंने अपने लंड को मेरी चूत से सटाया।

 

 

 

“आपका बहुत मोटा है। मेरी चूत को फाड़ कर रख देगा,” मैंने घबराते हुए कहा,  “फिरोज़ भाई जान धीरे-धीरे करना नहीं तो मैं दर्द से मार जाऊँगी।”

 

 

 

वो हंसने लगे।

 

 

 

“आप बहुत खराब हो। इधर तो मेरी जान की पड़ी है”, मैंने उनसे कहा।

 

 

 

मैंने भी अपने हाथों से अपनी चूत को चौड़ा कर उनके लंड के लिये रास्ता बनाया। उन्होंने अपने लंड को मेरी चूत के दर पर टिका दिया। मैंने उनके लंड को पकड़ कर अपनी फैली हुई चूत के अंदर खींचा।

 

 

 

“अंदर कर दो....” मेरी आवाज भारी हो गयी थी। उन्होंने अपने जिस्म को मेरे जिस्म के ऊपर लिटा दिया। उनका लंड मेरी चूत की दीवारों को चौड़ा करता हुआ अंदर जाने लगा। मैं सब कुछ भूल कर अपने जेठ के सीने से लग गयी। बस सामने सिर्फ फिरोज़ थे और कुछ नहीं। वो ही इस वक्त मेरे आशिक, मेरे सैक्स पार्टनर और जो कुछ भी मानो, थे। मुझे तो अब सिर्फ उनका लंड ही दिख रहा था।

 

 

 

जैसे ही उनका लंड मेरी चूत को चीरता हुआ आगे बढ़ा मेरे मुँह से “आआऽऽऽहहऽऽऽ” की आवाज निकली और उनका लंड पूरा का पूरा मेरी चूत में धंस गया। वो इस पोज़िशन में मेरे होंठों को चूमने लगे।

 

 

 

“अच्छा तो अब पता चला कि मुझसे मिलने के लिये तुम भी इतनी बेसब्र थी.... और मैं बेवकूफ सोच रहा था कि मैं ही तुम्हारे पीछे पड़ा हूँ। अगर पता होता ना कि तुम भी मुझसे मिलने को इतनी बेताब हो तो....” वाक्य को अधुरा ही रख कर वो कुछ रुके।

 

 

 

“तो?.... तो?”

 

 

 

“तो तुम्हें किसी की भी परवाह किये बिना कब का पटक कर ठोक चुका होता,” उन्होंने शरारती लहजे में कहा।

 

 

 

“धत!! इस तरह कभी अपने छोटे भाई की बीवी से बात करते हैं? शरम नहीं आती आपको?” मैंने उनके कान को अपने दाँतों से चबाते हुए कहा।

 

 

 

“शरम? अच्छा चोदने में कोई शरम नहीं है पर शरम बात करने में ही है ना?” कहकर वो अपने हाथों का सहारा लेकर मेरे जिस्म से उठे और साथ-साथ उनका लंड भी मेरी चूत को रगड़ता हुआ बाहर की ओर निकला और फिर वापस पूरे जोर से मेरी चूत में अंदर तक धंस गया।

 

 

 

“ऊऊऊहहऽऽऽ दर्द कर रहा है। आपका वाकय काफी बड़ा है। मेरी चूत छिल गयी है। पता नहीं नसरीन भाभी इतने मोटे लंड को छोड़ कर मेरे जावेद में क्या ढूँढ रही हैं?” मैंने उनके आगे पीछे होने की रिदम से अपनी रिदम भी मिलायी। हर धक्के के साथ उनका लंड मेरी चूत में अंदर तक घुस जाता और उनकी कोमल झाँटें मेरी मुलायम त्वचा पर रगड़ खा जाती। वो जोर-जोर से मुझे ठोकने लगे उनके हर धक्के से पूरा बिस्तर हिलने लगता। काफी देर तक वो ऊपर से धक्के मारते रहे। मैंने नीचे से अपनी टाँगें उठा कर उनकी कमर पर लपेट ली थी और उनके बालों भरे सीने में अपने तने हुए निप्पल रगड़ रही थी। इस रगड़ से एक सिहरन सी पूरे जिस्म में दौड़ रही थी। मैंने अपने हाथों से उनके सिर को पकड़ कर अपने होंठ उनके होंठों पर लगा कर अपनी जीभ उनके मुँह में घुसा दी। मैं इसी तरह उनके लंड को अपनी चूत में लेने के लिये अपनी कमर को उचका रही थी। उनके जोरदार धक्के मुझे पागल बना रहे थे। उन्होंने अपना चेहरा ऊपर किया तो मैं उनके होंठों की छुअन के लिये तड़प कर उनकी गर्दन से लटक गयी। फिरोज़ भाई जान के शरीर में दम काफी था जो मेरे जिस्म का बोझ उठा रखा था। मैं तो अपने हाथों और पैरों के बल पर उनके जिस्म पर झूल रही थी। इसी तरह मुझे उठाये हुए वो लगातार चोदे जा रहे थे। मैं “आआऽऽहहऽऽऽ माँआऽऽऽ मममऽऽऽ ऊफफऽऽऽ” जैसी आवाजें निकाले जा रही थी। उनके धक्कों से तो मैं निढाल हो गयी थी। वो लगातार इसी तरह पंद्रह मिनट तक ठोकते रहे। इन पंद्रह मिनट में मैं दो बार झड़ चुकी थी लेकिन उनकी रफतार में कोई कमी नहीं आयी थी। उनके सीने पर पसीने की कुछ बूँदें जरूर चमकने लगी थीं। मैंने अपनी जीभ निकाल कर उन नमकीन बूँदों को चाट लिया। वो मेरी इस हरकत से और जोश में आ गये। पंद्रह मिनट बाद उन्होंने मेरी चूत से अपने लंड को खींच कर बाहर निकाला।

 

 

 

उन्होंने मुझे किसी बार्बी डॉल की तरह एक झटके में उठाकर हाथों और पैरों के बल घोड़ी बना दिया। मेरी टपकती हुई चूत अब उनके सामने थी।

 

 

 

“मममऽऽऽ दोऽऽऽ.... डाऽऽऽल दो‍ओऽऽऽ। आज मुझे जितना जी में आये मसल डालो..... आआआह मेरी गर्मी शाँत कर दो।” मैं सैक्स की भूखी किसी वेश्या की तरह छटपटा रही थी उनके लंड के लिये।

 

 

 

“एक मिनट ठहरो,” कहकर उन्होंने मेरा गाऊन उठाया और मेरी चूत को अच्छी तरह साफ़ करने लगे। ये जरूरी भी हो गया था। मेरी चूत में इतना रस निकला था कि पूरी चूत चिकनी हो गयी थी। उनके इतने मोटे लंड के रगड़ने का अब एहसास भी नहीं हो रहा था। जब तक लंड के रगड़ने का दर्द नहीं महसूस होता तब तक मज़ा उतना नहीं आ पाता है। इसलिये मैं भी उनके इस काम से बहुत खुश हुई। मैंने अपनी टाँगों को फैला कर अपनी चूत के अंदर तक का सारा पानी सोख लेने में मदद की। मेरी चूत को अच्छी तरह साफ़ करने के बाद उन्होंने अपने लंड पर चुपड़े मेरे रस को भी मेरे गाऊन से साफ़ किया। मैंने बेड के सिरहाने को पकड़ रखा था और कमर उनकी तरफ़ कर रखी थी। उन्होंने वापस अपने लंड को मेरी चूत के द्वार पर लगा कर एक और जोरदार धक्का दिया।

 

 

 

“हममऽऽऽफफफऽऽऽऽ” मेरे मुँह से एक आवाज निकली और मैंने उनके लंड को अपनी दुखती हुई चूत में रगड़ते हुए अंदर जाते हुए वापस महसूस किया। वो दोबारा जोर-जोर से धक्के लगाने लगे। उनके धक्कों से मेरे बड़े-बड़े स्तन किसी पेड़ पर लटके आमों की तरह झूल रहे थे। मेरे गले पर पहना हुआ भारी नेकलेस उनके धक्कों से उछल-उछल कर मेरी चूचियों को और मेरी ठुड्डी को टक्कर मार रहा था। मैंने उसके लॉकेट को अपने दाँतों से दबा लिया जिससे कि वो झूले नहीं। फिरोज़ भाई जान ने मेरी इस हरकत को देख कर मेरे नेकलेस को अपने हाथों में लेकर अपनी ओर खींचा। मैंने अपना मुँह खोल दिया। अब ऐसा लग रहा था मानो वो किसी घोड़ी की सवारी कर रहे हों और नेकलेस उनके हाथों में दबी उसकी लगाम हो। वो इस तरह मेरी लगाम थामे मुझे पीछे से ठोकते जा रहे थे।

 

 

 

“फिरोज़.....ऊऊऊऽऽऽहहऽऽऽ..... फिरोज़....मेरा वापस झड़ने वाला है.... तुम भी मेरा साथ दो प्लीईऽऽऽज़,” मैंने फिरोज़ भाई जान से मेरे साथ झड़ने की गुज़ारिश किया। फिरोज़ भाई जान ने मेरी पीठ पर झुक कर मेरे झूलते हुए दोनों मम्मों को अपनी मुठ्ठी में पकड़ लिया और पीछे से अपनी कमर को आगे पीछे ठेलते हुए जोर-जोर के धक्के मारने लगे। मैंने अपने सिर को झटका देकर अपने चेहरे पर बिखरी अपनी ज़ुल्फों को पीछे किया तो मेरे दोनों मम्मों को मसलते हुए जेठ जी के हाथों को देखा। उनके हाथ मेरे निप्पलों को अपनी चुटकियों में भर कर मसल रहे थे।

 

 

 

“मममम... फिरोज़… फिरोज़” अब हमारे बीच कोई रिश्तों का तकल्लुफ नहीं बचा था। मैं अपने जेठ को उनके नाम से ही बुला रही थी, “फिरोज़..... मैं झड़ रही हूँ..... फिरोज़ तुम भी आ जाओ.... तुम भी अपनी धार छोड़ कर मेल कर दो।”

 

 

 

मैंने महसूस किया कि उनका लंड भी झटके लेने लगा है। उन्होंने मेरी गर्दन के पास अपना चेहरा रख दिया। उनकी गरम-गरम साँस मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थी। उन्होंने लगभग मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा, “शहनाज़ ..... मेरा निकल रहा है.... आज तुम्हारी कोख तुम्हारे जेठ के रस से भर जायेगी।”

 

 

 

“भर जाने दो मेरे जानम डाआऽऽऽल दो मेरे पेट में अपना बच्चा डाल दो.... मैं आपको अपनी कोख से बच्चा दूँगी।” मैंने कहा और एक साथ दोनों के जिस्म से अमृत की धारा बह निकली। उनकी अँगुलियाँ ने मेरी चूचियों को बुरी तरह निचोड़ दिया। मेरे दाँत मेरे नेकलेस पर गड़ गये और हम दोनों बिस्तर पर गिर पड़े। वो मेरे ऊपर ही पड़े हुए थे। हमारे जिस्म पसीने से लठपथ हो रहे थे।

 

 

 

"आआआऽऽऽऽहहहऽऽऽऽ फिरोज़ऽऽऽऽ. आज आपने मुझे वाकय ठंडा कर दिया आआऽऽपने मुझे वो… मज़ा…. दिया जिसके.. .लिये मैं... काफी.. दिनों से तड़प रही थी.. मममऽऽऽ।” मेरा चेहरा तकिये में धंसा हुआ था और मैं बड़बड़ाये जा रही थी। वो बहुत खुश हो गये और मेरी नंगी पीठ को चूमने लगे और बीच बीच में मेरी पीठ पर काट भी लेते। मैं बुरी तरह थक चुकी थी। वापस नशे और हेंगओवर ने मुझे घेर लिया। पता ही नहीं चला कब मैं नींद के आगोश में चली गयी।

 

 

 

जेठजी ने मेरे नंगे जिस्म पर कपड़े किस तरह पहनाये ये भी पता नहीं चल पाया। उन्होंने मुझे कपड़े पहना कर चादर से अच्छी तरह लपेट कर सुला दिया। मैं हसीन ख्वाबों में खो गयी।

 

 

 

अच्छा हुआ कि उन्होंने मुझे कपड़े पहना दिये थे, वरना अपनी इस हालत की सफायी जावेद और नसरीन भाभी जान से करना मुश्किल काम होता। मेरे पूरे जिस्म पर उकेरे गये दाँतों के निशानों की दिलकश नक्काशी का भी कोई जवाब नहीं था।

 

 

 

जब तक दोनों वापस नहीं आ गये फिरोज़ भाई जान की गोद में ही सिर रख कर सोती रही और फिरोज़ भाई जान मेरे बालों में अपनी अँगुलियाँ फेरते रहे। बीच-बीच में वो मेरे गालों पर या मेरे होंठों पर अपने गरम होंठ रख देते।

 

 

 

जावेद और नसरीन भाभी रात के दस बजे तक चहकते हुए वापस लौटे। होटल से खाना पैक करवा कर ही लौटे थे। मेरी हालत देख कर जावेद और नसरीन भाभी घबरा गये। बगल में ही एक डॉक्टर रहता था उसे बुला कर मेरी जाँच करवायी। डॉक्टर ने देख कर कहा कि बहुत ज्यादा शराब पीने की वजह से डी-हायड्रेशन हो गया है और जूस वगैरह पीने को कह कर चले गये।

 

 

 

अगले दिन सुबह मेरी तबियत एकदम सलामत हो गयी। अगले दिन जावेद का जन्मदिन था। शाम को बाहर खाने का प्रोग्राम था। एक बड़े होटल में सीट पहले से ही बुक कर रखी थी। वहीं पर पहले हम सबने ड्रिंक्स ली फिर खाना खाया। वापस लौटते समय जावेद ने बज़ार से एक ब्लू फ़िल्म का डी-वी-डी खरीद लिया। घर पहुँच कर हम चारों हमारे बेडरूम में इकट्ठे हुए। सब फिर से ड्रिंक्स लेने लगे। मुझे सबने मना भी किया कि पिछले दिन मेरी तबियत शराब पीने से खराब हो गयी थी और कुछ देर पहले होटल में तो मैंने ड्रिंक पी ही थी, पर मैं कहाँ मानने वाली थी। मैंने भी ज़िद करके उनके साथ और ड्रिंक्स लीं। फिर पहले म्यूज़िक चला कर कुछ देर तके एक दूसरे की बीवियों के साथ हमने डाँस किया। मैं जेठ जी की बाँहों में नशे की हालत में थिरक रही थी और नसरीन भाभी को जावेद ने अपनी बाँहों में भर रखा था। फिर जावेद ने कमरे की ट्यूबलाईट ऑफ कर दी और सिर्फ एक हल्का नाईट लैंप जला दिया। हम चारों बिस्तर पर बैठ गये।

 

 

 

जावेद ने डी-वी-डी ऑन करके ब्लू फ़िल्म चला दी। फिर बिस्तर के सिरहाने पर पीठ लगा कर हम चारों बैठ गये। एक किनारे पर जावेद बैठा था और दूसरे किनारे पर फिरोज़ भाई जान थे। बीच में हम दोनों औरतें थीं। दोनों ने नशे में मस्त अपनी-अपनी बीवियों को अपनी बाँहों में समेट रखा था। इस हालत में हम ब्लू फ़िल्म देखने लगे। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती गयी, कमरे का माहौल गरम होता गया। दोनों मर्द बिना किसी शरम के अपनी अपनी बीवियों के गुप्ताँगों को मसलने लगे। जावेद मेरे मम्मों को मसल रहा था और फिरोज़ नसरीन भाभी के। जावेद ने मुझे उठा कर अपनी टाँगों के बीच बिठा लिया। मेरी पीठ उनके सीने से सटी हुई थी। वो अपने दोनों हाथ मेरे गाऊन के अंदर डाल कर अब मेरे मम्मों को मसल रहे थे। मैंने देखा नसरीन भाभी जावेद को चूम रही थी और जावेद के हाथ भी नसरीन भाभी जान के गाऊन के अंदर थे। मुझे उन दोनों को इस हालत में देख कर पता नहीं क्यों कुछ जलन सी होने लगी। हम दोनों के गाऊन कमर तक उठ गये थे। और नंगी जाँघें सबके सामने थीं। जावेद अपने एक हाथ को नीचे से मेरे गाऊन में घुसा कर मेरी चूत को सहलाने लगे। मैं अपनी पीठ पर उनके लंड की ठोकर को महसूस कर रही थी।

 

 

 

फिरोज़ ने नसरीन भाभी के गाऊन को कंधे पर से उतार दिया था और एक मम्मे को बाहर निकाल कर चूसने लगे थे। ये देख कर जावेद ने भी मेरे एक मम्मे  को गाऊन के बाहर निकालने की कोशिश की। मगर मेरे इस गाऊन का गला कुछ छोटा था इसलिये उसमें से मेरा स्तन बाहर नहीं निकल पाया। उन्होंने काफी कोशिशें की मगर सफ़ल ना होते देख कर गुस्से में एक झटके में मेरे गाऊन को मेरे जिस्म से हटा दिया। अब सिर्फ हाई-हील के सैंडल पहने मैं सबके सामने बिल्कुल नंगी हो गयी क्योंकि प्रोग्राम के अनुसार हम दोनों औरतों ने गाऊन के अंदर कुछ भी नहीं पहन रखा था। मैं शरम के मारे अपने हाथों से अपने मम्मों को छिपाने लगी और अपनी टाँगों को एक दूसरे से सख्ती से दबा लिया जिससे मेरी चूत के दर्शन ना हों।

 

 

 

“क्या करते हो.. शरम करो बगल में फिरोज़ भाई और नसरीन भाभी जान हैं.... तुमने उनके सामने मुझे नंगी कर दिया। छी-छी क्या सोचेंगे जेठ जी?” मैंने फुसफुसाते हुए जावेद के कानों में कहा जिससे बगल वाले नहीं सुन सकें।

 

 

 

“तो इसमें क्या है? नसरीन भाभी जान भी तो लगभग नंगी ही हो चुकी हैं। देखो उनकी तरफ़..” मैंने अपनी गर्दन घूमा कर देखा तो पाया कि जावेद सही कह रहा था। फिरोज़ भाई जान ने भाभी के गाऊन को छातियों से भी ऊपर उठा रखा था। वो भाभी जान की चूचियों को मसले जा रहे थे। वो भाभी जान के एक निप्पल को अपने दाँतों से काटते हुए दूसरे बूब को अपनी मुठ्ठी में भर कर मसलते जा रहे थे। नसरीन भाभी ने फिरोज़ भाई जान के पायजामे को खोल कर उनके लंड को अपने हाथों में लेकर सहलाना शुरू कर दिया था।

 

 

 

इधर जावेद मेरी टाँगों को खोल कर अपने होंठ मेरी चूत के ऊपर फ़ेरने लगा। उसने ऊपर बढ़ते हुए मेरे दोनों निप्पल को कुछ देर चूसा और फिर मेरे होंठों को चूमने लगा। नसरीन भाभी जान के बूब्स भी मेरी तरह काफी बड़े-बड़े थे। दोनों भाइयों ने लगता है दूध की बोतलों का मुआयना करके ही निकाह के लिये पसंद किया था। नसरीन भाभी के निप्पल काफी लंबे और मोटे हैं जबकि मेरे निप्पल कुछ छोटे हैं। अब हम चारों एक दूसरे की जोड़ी को निहार रहे थे। पता नहीं टीवी स्क्रीन पर क्या चल रहा था। सामने लाईव ब्लू फ़िल्म इतनी गरम थी कि टीवी पर देखने की किसे फ़ुर्सत थी। जावेद ने मेरे हाथों को अपने हाथों से अपने लंड पर दबा कर सहलाने का इशारा किया। मैं भी नसरीन भाभी की देखा देखी जावेद के पायजामे को ढीला करके उनके लंड को बाहर निकाल कर सहला रही थी। फिरोज़ की नजरें मेरे जिस्म पर टिकी हुई थी। उनका लंड मेरे नंगे जिस्म को देख कर फूल कर कुप्पा हो रहा था।

 

 

 

चारों अपने-अपने लाईफ पार्टनर्स के साथ सैक्स के खेल में लगे हुए थे। मगर चारों ही एक दूसरे के साथी का तस्सवुर करके उत्तेजित हो रहे थे। फिरोज़ ने बेड पर लेटते हुए नसरीन भाभी जान को अपनी टाँगों के बीच खींच लिया और उनके सिर को पकड़ कर अपने लंड पर झुकाया। नसरीन भाभी ने उनके लंड पर झुकते हुए हमारी तरफ़ देखा। पल भर को मेरी नजरों से उनकी नजरें मिली तो वो मुझे भी ऐसा करने को इशारा करते हुए मुस्कुरा दीं। मैंने भी जावेद के लंड पर झुक कर उसे चाटना शुरू किया। जावेद के लंड को मैं अपने मुँह में भर कर चूसने लगी और नसरीन भाभी फिरोज़ के लंड को चूस रही थी। इसी दौरान हम चारों बिल्कुल नंगे हो गये।

 

 

 

“जावेद लाईट बंद कर दो.... शरम आ रही है,” मैंने जावेद को फुसफुसाते हुए कहा।

 

 

 

“इसमें शरम किस बात की। वो भी तो हमारे जैसी हालत में ही हैं,” कहकर उन्होंने पास में चुदाई में मसरूफ फिरोज़ और नसरीन की ओर इशारा किया। जावेद ने मुझे अपने ऊपर लिटा लिया। वो ज्यादा देर तक ये सब पसंद नहीं करते थे। थोड़े से फोर-प्ले के बाद ही वो चूत के अंदर अपने लंड को घुसा कर अपनी सारी ताकत चोदने में लगाने पर ही विश्वास करते थे। उन्होंने मुझे अपने ऊपर खींच कर अपनी चूत में उनका लंड लेने के लिये इशारा किया। मैंने उनकी कमर के पास बैठ कर घुटनों के बल अपने जिस्म को उनके लंड के ऊपर किया। फिर उनके लंड को अपने हाथों से अपनी चूत के मुँह पर सेट करके मैंने अपने जिस्म का सारा बोझ उनके लंड पर डाल दिया। उनका लंड मेरी चूत के अंदर घुस गया। मैंने पास में दूसरे जोड़े की ओर देखा। दोनों अभी भी लंड चुसाई में बिज़ी थे। नसरीन भाभी जान अभी भी उनके लंड को चूस रही थीं। मेरा तो उन दोनों की लंड चुसाई देख कर ही पहली बार झड़ गया। नाईट लैंप की रोश्नी में सिर्फ सैंडल पहने नंगी नसरीन भाभी का जिस्म दमक रहा था।

 

 

 

तभी जावेद ने ऐसी हरकत कि जिससे हमारे बीच बची-खुची शरम का पर्दा भी तार-तार हो गया। जावेद ने फिरोज़ भाई जान का हाथ पकड़ा और मेरे एक मम्मे पर रख दिया। फिरोज़ ने अपने हाथों में मेरे मम्मे को थाम कर कुछ देर सहलाया। ये पहली बार था जब किसी गैर मर्द ने मुझे मेरे हसबैंड के सामने ही मसला था। फिरोज़ मेरे एक मम्मे को थोड़ी देर तक मसलते रहे और फिर मेरे निप्पल को पकड़ कर अपनी अँगुलियों से उमेठने लगे।

 

 

 

जावेद इसी का बहाना लेकर नसरीन भाभी के एक मम्मे को अपने हाथों में भर कर दबाने लगे। जावेद की आँखें नसरीन भाभी से मिली और नसरीन भाभी अपने सिर को फिरोज़ भाई जान की जाँघों के बीच से उठा कर आगे आ गयीं जिससे जावेद को उनके मम्मों पर हाथ फ़ेरनेके लिये ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़े। अब हम दोनों औरतें अपने-अपने हसबैंड के लंड की सवारी कर रही थीं। ऊपर नीचे होने से दोनों की बड़ी-बड़ी चूचियाँ उछल रही थीं। जावेद के हाथों की मालिश अपने मम्मों पर पाकर नसरीन भाभी की धक्के मारने की रफ़्तार बढ़ गयी और वो, “आआऽऽहहऽऽऽ ममऽऽऽऽ” जैसी आवाजें मुँह से निकालती हुई फिरोज़ भाई जान पर लेट गयी। लेकिन फिरोज़ भाई जान का तना हुआ लंड उनकी चूत से नहीं निकला।

 

 

 

कुछ देर तक इसी तरह चोदने के बाद जावेद ने मुझे अपने ऊपर से उठा कर बिस्तर पर लिटाया और मेरी दोनों टाँगें उठा कर अपने कंधे पर रख लीं और मेरी चूत पर अपने लंड को लगा कर अंदर धक्का दे दिया। फिर वो मेरी चूत पर जोर-जोर से धक्के मारने लगे। मैं फिरोज़ की बगल में लेटी हुई उनको नसरीन भाभी को चूमते और मोहब्बत करते हुए देख रही थी। मेरे मन में जलन की आग लगी हुई थी। काश वहाँ उनके जिस्म पर नसरीन भाभी जान नहीं बल्कि मेरा नंगा जिस्म पसरा हुआ होता।

 

 

 

वो मुझे बिस्तर पर लेटे हुए ही निहार रहे थे। उनके होंठ नसरीन भाभी जान को चूम चाट रहे थे लेकिन आँखें और दिल मेरे पास था। वो अपने हाथों को मेरे जिस्म पर फेरते हुए शायद मेरी कल्पना करते हुए अपनी नसरीन को वापस ठोकने लगे। नसरीन भाभी के काफी देर तक ऊपर से चोदने के बाद फिरोज़ भाई जान ने उसे हाथों और पैरों के बल झुका दिया। ये देख जावेद ने भी मुझे उलटा करके मुझे भी उसी पोज़िशन में कर दिया। सामने आईना लगा हुआ था। हम दोनों जेठानी देवरानी पास-पास घोड़ी बने हुए थे। दोनों भाइयों ने एक साथ एक रिदम में हम दोनों को ठोकना शुरू किया। चार बड़े-बड़े मम्मे एक साथ आगे पीछे हिल रहे थे। हम दोनों एक दूसरे की हालत देख कर और ज्यादा उत्तेजित हो रहे थे। कुछ देर तक इस तरह चोदने के बाद दोनों ने हम दोनों को बिस्तर पर लिटा दिया और ऊपर से मिशनरी स्टाईल में धक्के मारने लगे। इस तरह चुदाई करते हुए हमारे जिस्म अक्सर एक दूसरे से रगड़ खा कर और अधिक उत्तेजना का संचार कर रहे थे।

 

 

 

नसरीन भाभी जान अब झड़ने वाली थी वो जोर-जोर से चींखने लगी, “हाँ हाँ.. औऽऽर जोर से‍एऽऽऽ और जोर से‍एऽऽऽ। हाँ इसी‍इऽऽऽ तरह.... फिरोज़ आज तुम में काफी जोश है.. आज तो तुम्हारा बहुत तन रहा है। आज तो मैं निहाल हो गयी....” इस तरह बड़बड़ाते हुए उसने अपनी कमर को उचकाना शुरू किया और कुछ ही देर में इस तरह बिस्तर पर निढाल होकर गिरी, मानो उसके जिस्म से हवा निकाल दी गयी हो। अब तो फिरोज़ भाई जान उसके ठंडे पड़े शरीर को ठोक रहे थे।

 

 

 

मैंने सोचा काश उनकी जगह मैं होती तो बराबर का साथ देती और उन्हें दिखाती कि मुझ में कितना स्टैमिना है। इस गेम में तो जेठ जी को हरा कर ही छोड़ती।

 

 

 

कुछ देर बाद जावेद ने अपने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी और उसके लंड से गरम वीर्य की धार मेरी चूत के अंदर बहने लगी। मैंने भी उसके साथ-साथ अपने रस का द्वार खोल दिया। हम दोनों अब एक दूसरे के पास लेटे हुए लंबी-लंबी सांसें ले रहे थे। मेरा दो बार निकल जरूर गया था लेकिन अभी तक मैं गर्मी से जल रही थी। आज तो मैं इतनी उत्तेजित थी कि अगर जावेद मुझे रात भर चोदता तो मैं उसका पूरी रात साथ देती।

 

 

 

तभी फिरोज़ उठ कर बाथरूम चले गये। जावेद हम दोनों औरतों के बीच लेट गया और हम दोनों को अपनी दोनों बाँहों में भर कर अपने ऊपर खींच लिया। हम दोनों औरतें उसके नंगे जिस्म से लिपटी हुई थीं। जावेद एक बार मुझे चूमता तो एक बार अपनी भाभी को। हम दोनों औरतें उसके जिस्म को सहला रही थीं। मैंने अपना हाथ उसके लंड पर रखा तो पता चला कि वहाँ पर तो पहले से ही एक हाथ रखा हुआ था। मैंने नीचे झुक कर देखा कि नसरीन भाभी ने जावेद का लंड अपने हाथों में थाम रखा है।

 

 ये देख कर मैंने अपना हाथ वहाँ से हटा लिया। अचानक मुझे अपने पीछे कुछ आवाज आयी। मैंने अपने होंथों को जावेद की पकड़ से छुड़ाया और पीछे घूम कर देखा कि पीछे बिस्तर के पास फिरोज़ खड़े हम तीनों को देख रहे थे। कमरे में अंधेरा था। नाईट लैंप और टीवी की हल्की रोशनी में उनका भोला सा चेहरा बहुत मासूम लग रहा था। शायद उन्हें भी अपने छोटे भाई की किसमत पर जलन हो रही थी। इसलिये चुपचाप खड़े हमारी हरकतों को निहार रहे थे। उन्हें इस तरह खड़े देख कर मुझे उनपर मोहब्बत उमड़ आयी। मैंने अपने आप को जावेद के बंधन से अलग किया और अपने हाथ उनकी ओर उठा कर अपने आगोश में बुला लिया, “आओ ना कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ।”

 

 

 

वो मेरे इस तरह उन्हें बुलाने से बहुत खुश हुए और मेरी बगल में लेट गये। हम दोनों की ओर देख कर जावेद दूसरी तरफ़ सरक गया और हमें जगह दे दी। अब मेरा मजनू मेरी बाँहों में था इसलिये मुझे कहीं और देखने की जरूरत नहीं थी। मैं उनके जिस्म से चिपकते ही सारी दुनिया से बेखबर हो गयी। मुझे अब किसी बात की या किसी भी आदमी की चिंता नहीं थी। बस चिंता थी तो सिर्फ इतनी कि ये मेरा जेठ जो मुझे बेहद चाहता है, उसे मैं दुनिया भर की खुशी दे दूँ।

 

 

 

फिरोज़ मेरे नंगे जिस्म से बुरी तरह लिपट गये। मैं भी उनसे किसी बेल की तरह लिपट गयी। हम दोनों को देख कर ऐसा लग रहा था मानो जन्मों के भूखे हों और पहली बार सामने स्वादिष्ट भोजन मिला हो। उनके होंठ मेरे होंठों को रगड़ रहे थे। मैं भी उनके निचले होंठ को कभी काट रही थी तो कभी उनके मुँह के अंदर अपनी जीभ घुमाने लगती और वो अपनी जीभ से मेरी जीभ को सहलाने लगते।

 

 

 

“बहुत प्यासे हो?” मैंने उनके कानों में फुसफुसा कर कहा जिसे हम दोनों के अलावा किसी ने नहीं सुना।

 

 

 

“हम्म्म्म,” उन्होंने सिर्फ इतना कहा और मेरे जिस्म को चूमना जारी रखा।

 

 

 

“आज की सारी रात तुम्हारी है। आज जितना जी चाहे मुझे अपने रस से भिगो लो फिर पता नहीं कब मिलना हो। ना तो आज की रात मैं सोऊँगी ना एक पल को तुम्हें सोने दूँगी।” मैंने अपने दाँतों से उनके कान के नीचे की लो को काटते हुए कहा, “आज रात भर हम दोनों एक दूसरे की प्यास बुझायेंगे।”

 

 

 

उन्होंने मेरे मम्मों को अपने हाथों में थाम लिया और उसे चूमने लगे। मेरी नज़र अचानक पास में दूसरे जोड़े पर गयी। उनकी चुदाई शुरू हो चुकी थी। जावेद नसरीन भाभी जान को पीछे से ठोकते हुए हम दोनों को देख रहा था। नसरीन भाभी जान, “आआहहऽऽऽ ऊऊऊहहहऽऽऽऽ” कर रही थीं।

 

 

 

मुझे उस तरफ़ देखते देख फिरोज़ ने भी उनको देखा तो मैंने तड़प कर उनके सिर को अपनी दोनों छातियों के बीच दबाते हुए कहा, “नहीं आज और कहीं नहीं, आज सिर्फ मैं और तुम। सिर्फ हम दोनों.. क्या हो रहा है कहाँ हो रहा है.... कुछ भी मत देखो। सिर्फ मुझे देखो मुझे प्यार करो। मैं तड़प रही हूँ। मैं तुम्हारे भाई की बीवी हूँ मगर तुमने मुझे पागल बना दिया। मैं तुम पर पागल हो गयी हूँ।” मैं उनके सिर को पकड़ कर अपने निप्पल को उनके होंठों से रगड़ रही थी। आज तक मैंने कभी किसी के साथ सैक्स में इस तरह की हरकतें नहीं की थीं। मुझ पर शराब और कामुक्ता का मिलाजुला नशा सवार था। मैं जोर-जोर से बोल रही थी। मुझे अब किसी की परवाह नहीं थी कि कौन क्या सोचता है। मेरे निप्पल एक दम कड़क और फ़ूले हुए थे। मैं उन्हें फिरोज़ भाई जान के सीने पर रगड़ रही थी। उनके छोटे-छोटे निप्पल से जब मेरे निप्पल रगड़ खाते तो एक सिहरन सी पूरे जिस्म में दौड़ जाती थी। मैंने अपने हाथों में उनके लंड को थाम कर उसे अपनी चूत के ऊपर सटा कर दोनों जाँघों के बीच दबा लिया। फिरोज़ भाई जान तो पूरे मस्त हो रहे थे। वो उसी हालत में अपने लंड को आगे पीछे करने लगे। दोनों जाँघों के बीच उनका लंड रगड़ खा रहा था।

 

 

 

मैं करवट बदल कर उन्हें नीचे बिस्तर पर गिरा कर उनके ऊपर सवार हो गयी। मैं उनके चेहरे को बेहताशा चूमे जा रही थी। सबसे पहले उनके होंठों को फिर दोनों बंद आँखों को फिर अपने होंठ उनके गालों पर फ़िरते हुए गले तक ले गयी। मैंने अपने दाँतों से फिरोज़ भाई जान की ठुड्डी को पकड़ लिया और अपने दाँतों को उन पर गड़ाते हुए उनकी ठुड्डी को चूसने लगी। वो मेरे दोनों निप्पल को पकड़ कर उनसे खेल रहे थे। मैंने अपने जिस्म को कुछ ऊपर किया और उनके मुँह तक अपने मम्मों को ले आयी। अपने एक निप्पल को उनके होंठों के ऊपर ऐसे लटका रखा था कि उनके होंठ लालच के मारे खुल गये और मेरे उस निप्पल को किसी अंगूर की तरह मुँह में लेने के लिये लपके, लेकिन मैंने झटके से अपने जिस्म को पीछे करके उनके वार से अपने को बचाया। मैं उनकी मायूसी पर हँस पड़ी। मैंने उनके सिर को बालों से पकड़ कर तकिये से दबा दिया। अब वो अपने सिर को नहीं हिला सकते थे। इस तरह उनको जकड़ कर उनके होंठों पर अपने निप्पल को हल्के-हल्के छुआने लगी। उन्हें इस तरह तरसाने में बहुत मज़ा आ रहा था। उनके होंठ मेरे निप्पल को अपने में समाने के लिये तरस रहे थे। मैं साथ-साथ अपनी जाँघों को उनकी जाँघों के ऊपर मसल रही थी। मेरी चूत के ऊपर का उभार उनके लंड को पीस देने के लिये मसल रहा था। मैं अपने निप्पल को उनके होंठों पर कुछ देर तक छुआने के बाद पूरे चेहरे के ऊपर फ़ेरने लगी। उनके जिस्म में सिहरन सी दौड़ती हुई मैं महसूस कर रही थी। मैं अपने निप्पल को उनके चेहरे पर फ़िराते हुए गले के ऊपर से होते हुए उनके सीने पर रगड़ने लगी। उनके सीने पर उगे घने काले बालों पर अपने निप्पल फ़िराते हुए मुझे बहुत मज़ा आ रहा था। उत्तेजना के मारे उनका लंड झटके खा रहा था। मैं अपने निप्पल से उनके सीने को सहलाते उनके पेट और उसके बीच उनकी नाभी पर छुआने लगी। सिहरन से उन्होंने पेट को अंदर खींच लिया था। मुझे उनको इस तरह उत्तेजित करने में बहुत मज़ा आ रहा था।

 

 

 

पास में नसरीन भाभी जान और जावेद में घमासान छिड़ा हुआ था। दोनों ही एक दूसरे को पछाड़ने के लिये जी जान से जुटे हुए थे। दोनों की चुदाई की रफतार काफी बढ़ गयी थी और दोनों के जिस्म पसीने से लथपथ हो रहे थे। तभी जावेद “आआऽऽहहऽऽऽ.. उम्म्म्म” करता हुआ अपनी भाभी जान के नंगे जिस्म के ऊपर पसर गया। उसका साथ देते हुए नसरीन भाभी भी अपने रस से जावेद के लंड को धोने लगीं। वो दोनों खलास हो कर एक दूसरे को चूमते हुए बुरी तरह हाँफ रहे थे।

 

 

 

हम दोनों इस रात को एक यादगार बना देना चाहते थे, इसलिये हमें सैक्स के खेल को शुरू करने की कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। सारी रात हम दोनों को एक दूसरे के साथ ही रहना था इसलिये हम खूब मजे ले-ले कर एक दूसरे के साथ चुदाई का मज़ा ले रहे थे।

 

 

 

मैंने फिरोज़ भाई जान के लंड के ऊपर अपने निप्पल को फिराना शुरू किया। लंड की जड़ से लेकर टोपे के ऊपर तक अपने लंड को किसी रुई की तरह फ़िरा रही थी। उनका लंड तो उत्तेजना से फूल कर कुप्पा हो रहा था। उनके लंड की टिप पर कुछ बूँद प्री-कम चमकने लगा। वो बस लुढ़क कर बिस्तर को छूने वाला ही था कि मैंने लपक कर अपनी जीभ निकाल कर उसे चाट कर अपने मुँह में भर लिया। उसका स्वाद बहुत मज़ेदार लगा। फिरोज़ भाई जान ने मेरे मम्मों को पकड़ कर उन्हें अपने लंड के ऊपर दाब कर मुझे इशारा किया कि मैं उनको अपने मम्मों से चोदूँ। मैं अपने दोनों मम्मों के बीच उनके मोटे लंड को दबा कर अपने जिस्म को आगे पीछे करने लगी। 

उन्हें इसमें मुझसे चोदने जैसा मज़ा मिल रहा था। इसलिये वो मुझे सहलाते हुए “आआआहहऽऽ ऊऊहहहऽऽऽ” कर रहे थे। कुछ देर उनके लंड को अपनी दोनों छातियों के बीच लेकर निचोड़ने के बाद मैंने उनके लंड पर अपनी जीभ फ़िरानी शुरू कर दी। अब फिरोज़ भाई जान के लिये अपनी उत्तेजना पर काबू कर पाना मुश्किल हो रहा था। उन्होंने मेरी कमर को खींच कर अपनी ओर किया। वो मेरी चूत को अपने मुँह में लेना चाहते थे इसलिये मैंने अपने दोनों घुटने मोड़ कर उनके सिर के दोनों ओर रख कर अपनी चूत को उनके होंठों से सटाया।

 

 

 

अब हम परफेक्ट 69 के पोज़ में थे। मैं उनके लंड को चाट और चूस रही थी और वो मेरी चूत पर अपनी जीभ फ़िरा रहे थे। जावेद और नसरीन भाभी एक दूसरे के नंगे जिस्म से खेलते हुए हमें देखते-देखते नींद की आगोश में चले गये थे। दोनों नंगे ही एक दूसरे की बाँहों में सो गये थे। लेकिन हम दोनों कि आँखों से नींद कोसों दूर थी। आज तो पूरी रात थकना और फिरोज़ भाई जान को थकाना था।

 

 

 

फिरोज़ भाई जान मेरे चूत की फाँकों को अपने दोनों हाथों की अँगुलियों से फैला कर अपनी जीभ मेरी क्लिट से लेकर अंदर तक फिराने लगे। मैंने भी उनके उस मोटे लंड को अपने हाथों से पकड़ कर अपने मुँह में लिया। बीच-बीच में अपनी जीभ निकाल कर उनके लंड पर ऊपर से नीचे तक फिराने लगती। मैं उनके लंड के नीचे लटकते हुए टट्टों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगी। मैंने उन्हें सताने के लिये उनके लंड के टोपे पर हल्के से अपने दाँत गड़ा दिये। वो “आआआह” कर उठे और मुझसे बदला लेने के लिये मेरी क्लिटोरिस को अपने दाँतों के बीच दबा दिया। मैं उत्तेजना से छटपटा उठी। वो काफी गरम हो चुके थे उनको शायद इस पोज़िशन में मज़ा नहीं आ रहा था क्योंकि उनकी जबरदस्तियों को मैं ऊपर होने की वजह से नाकाम कर रही थी। उन्होंने मुझे करवट बदल कर नीचे पटका और खुद ऊपर सवार हो गये। अब मैं नीचे थी और वो मेरे ऊपर। मैंने अपनी टाँगों को मोड़ कर अपनी चूत को उनकी तरफ़ आगे किया और उनके सिर को अपनी दोनों जाँघों के बीच दबा दिया। मैंने दोनों जाँघों से उनके सिर को भींच रखा था जिससे उनको भागने का कोई रास्ता नहीं मिले। लेकिन दूसरी ओर मेरी हालत उन्होंने खराब कर रखी थी। उनका लंड मेरे गले में ठोकर मार रहा था। मैंने जितना हो सकता था अपने मुँह को फाड़ रखा था लेकिन उनके लंड का साइज़ कुछ ज्यादा ही था। मेरा मुँह दुखने लगा था और जीभ दर्द करने लगी थी। उन्होंने अपनी कमर को मेरे मुँह पर दबा रखा था। मैंने उनके लंड की जड़ को अपनी मुठ्ठी में पकड़ कर उनके लंड को पूरा अंदर घुसने से रोका लेकिन उन्होंने अपने हाथों से जबरदस्ती मेरे हाथ को अपने लंड पर से हटा दिया और एक धक्का मारा। मेरी साँस रुकने लगी क्योंकि उनका लंड गले में घुस गया था। मैं छटपटाने लगी तो उन्होंने अपने लंड को कुछ बाहर खींच कर पल भर के लिये मुझे कुछ राहत दी लेकिन फिर पूरे जोर से वापस अपने लंड को गले के अंदर डाल दिया। अब मैंने अपनी साँसें उनके धक्कों के साथ ट्यून कर लीं जिससे दोनों को ही कोई दिक्कत नहीं हो। हर धक्के के साथ उनके टट्टे मेरी नाक को भी बंद कर देते थे। उनके घुंघराले बाल मेरे नथुनों में घुस कर गुदगुदी करने लगते। वो तेजी से अपनी कमर को आगे पीछे कर रहे थे और ऐसा लग रहा था मानो उन्होंने मेरे मुँह को मेरी चूत समझ रखा हो। मैंने भी अपनी टाँगों से उनके सिर को कैंची की तरह अपनी चूत में दाब रखा था। उनका लंड मेरे थूक से गीला हो कर चमक रहा था। कुछ देर तक इसी तरह मुझे रगड़ने के बाद जब उनके लंड में झटके आने लगे तो उन्होंने मुझे एकदम से छोड़ दिया नहीं तो मेरे मुँह में ही धार छोड़ देते। मेरा तो कब का छूट चुका था। जब वो मुझ पर से उतरे तो मैंने देखा कि मेरे रस से उनके होंठ लिसड़े हुए हैं। वो अपनी जीभ निकाल कर अपने गीले होंठों पर फ़ेर रहे थे।

 

 

 

“मज़ा आ गया”, उन्होंने कहा।

 

 

 

“धत्त! आप बहुत गंदे हैं!” मैंने शरमाते हुए उनसे कहा, “आपने मेरे मुँह को क्या समझ रखा था.... इतना बड़ा वो.. घुसेड़-घुसेड़ कर गला चीर कर रख दिया।“

 

 

 

“वो? वो क्या?” उन्होंने शरारत से पूछा।

 

 

 

“वो....” मैंने उनके लंड की ओर इशारा किया।

 

 

 

“अरे उसका कुछ नाम भी होगा। इतनी प्यारी चीज़ है.... जरा मोहब्बत से नाम तो लेकर देखो.... कितना खुश होगा।”

 

 

 

“क्यों सताते हो.. अब आ जाओ ऊपर”, मैंने कहा।

 

 

 

“नहीं पहले तुम इसका नाम लो।” वैसे तो औरतों के लिये लंड का नाम और वो भी किसी पराये मर्द के सामने लेना बड़ा मुश्किल होता है लेकिन मेरे लिये कोई बड़ी बात नहीं थी। फिर भी मैं शरमाने का नाटक करते हुए झिझकते हुए धीरे से फ़ुसफ़ुसायी, “लंड!”

 

 

 

“क्या.. कुछ सुनायी नहीं दिया....” वो पूरी बेशरमी पर उतर आये थे।

 

 

 

“लंड!” मैंने फिर से कहा इस बार आवाज में कुछ जोर था। वो खुश हो गये। उन्होंने उठकर अचानक लाईट ऑन कर दी। पूरा कमरा दूधिया रोशनी में नहा गया।

 

 

 

“ऊँ हूँ नहीं…” मैंने शरम से अपने छातियों को हाथों से ढक लिया और अपनी चूत को दोनों टाँगों के बीच भींच लिया जिससे उनकी उस पर नज़र ना पड़े।

 

 

 

“क्या करते हो बेशरम.. मुझे बहुत शरम आ रही है.... प्ली..ईऽऽ..ज़ लाईट बंद कर दो!” मैंने कहा।

 

 

 

“नहीं! आज मुझे तुम्हारा ये हुस्न पूरी तसल्ली के साथ देखने दो। ये कोई पहली बार तो हम नहीं मिल रहे हैं। हम पहले भी एक दूसरे के सामने नंगे हुए हैं.... भूल गयीं?” फिरोज़ भाई जान मुस्कुरा रहे थे। वो बिस्तर के पास खड़े हो कर मेरे जिस्म को निहारने लगे। मैं उनकी हरकतों से पागल हुई जा रही थी। उन्होंने अपने हाथों से मेरे हाथ को मम्मों से हटाया। मैं कनखियों से उनकी हरकतों को बीच-बीच में देख रही थी। फिर उन्होंने मेरे दूसरे हाथ को मेरी जाँघों से भी हटा दिया। मैं अपने नंगे जिस्म को रोशनी में उनके सामने उघाड़े हुए लेटी हुई थी। फिर उन्होंने मेरी जाँघों को पकड़ कर उनको एक दूसरे से अलग किया और फैला दिया, जिससे मेरी चूत खुल जाये। वो कुछ देर तक मेरे नंगे जिस्म को इसी तरह निहारते रहे और फिर झुक कर मेरे होंठों पर एक किस किया और मेरी कमर के नीचे एक तकिया दे कर मेरी कमर को उठाया। मेरी चूत ऊपर की तरफ़ हो गयी। उन्होंने मेरी टाँगों को मोड़ कर मेरी छातियों से लगा दिया। फिर मेरे ऊपर से अपने लंड को मेरी चूत पर रख कर कहा, “शहनाज़! आँखें खोलो!” मैंने और सख्ती से अपनी आँखों को भींच लिया और सिर हिला कर इंकार जताया।

 

 

 

“तुम्हें मेरी कसम शहनाज़ ! अपनी आँखें खोलो और हमारे इस मिलन को अपने दिल दिमाग में कैद कर लो।” उन्होंने अब अपना वास्ता दिया तो मैंने झिझकते हुए अपनी आँखें खोलीं। मेरा जिस्म इस तरह टेढ़ा हो रहा था कि मुझे अपनी चूत के मुँह पर रखा उनका मोटा और लंबा लंड साफ़ नज़र आ रहा था।

 

 

 

मैंने कुछ कहे बिना उनके लंड को अंदर लेने के लिये अपनी कमर को उचकाया। लेकिन उन्होंने मुझे अपने मकसद में कामयाब नहीं होने दिया और अपने लंड को ऊपर खींच लिया। मेरी चूत के दोनों होंठ उत्तेजना में बार-बार खुल और बंद हो रहे थे। शायद अपनी भूख अब उनसे नहीं संभाल रही थी। मेरी चूत के किनारे, रस से बुरी तरह गीले हो रहे थे। उन्होंने मेरी चूत के रस को पहले की तरह अपने पायजामे से पोंछ कर साफ़ किया और पूरा सुखा दिया। मैं उनके लंड को अपनी चूत में लेने के लिये बुरी तरह तड़प रही थी।

 

 

 

“क्यों तड़पा रहे हो जान! अंदर कर दो ना! क्यों मिन्नतें करवा रहे हो!” मैंने उनकी आँखों में झाँकते हुए उनसे मिन्नतें कीं।

 

 

 

“ऊँहूँ पहले रिक्वेस्ट करो,” वो मेरी हालत का मज़ा ले रहे थे।

 

 

 

“प्ली..ईऽऽऽ..ज़ऽऽऽ”, मैंने उनसे कहा।

 

 

 

“क्या? प्लीज़ क्या?” उन्होंने वापस मुझे छेड़ा।

 

 

 

“आप बहुत गंदे हो। छी! ऐसी बातें लड़कियाँ बोलती हैं क्या?”

 

 

 

“नहीं! जब तक नहीं बोलोगी कि तुम्हें क्या चाहिये, तब तक नहीं दूँगा।” उन्होंने सताना जारी रखा।

 

 

 

“ओफ ओह! दे दो ना अपना लंऽऽड!” कहकर मैंने झट से अपनी आँखें बंद कर लीं।

 

 

 

“उम्म! अपने जेठ जी का लंड चाहिये?” मैंने अपना सिर हिलाया तो उन्होंने आगे कहा, “तो फिर खुद ही ले लो अपनी चूत में।”

 

 

 

मैंने लपक कर उनके लंड को पकड़ा और दूसरे हाथ से अपनी चूत की फाँकें अलग कर के उनके लंड को अपनी चूत के दरवाजे पर रख कर जोर का धक्का ऊपर की तरफ़ मारा तो उनका मोटा लंड थोड़ा मेरी चूत में घुस गया।

 

 

 

“हूँ...ऊँह।” मेरे मुँह से एक हल्की सी दर्द भरी आवाज निकली। मैंने अब अपनी टाँगों को दोनों ओर फैलाया और उनकी कमर को दोनों ओर से अपनी टाँगों से जकड़ लिया। अब मैं उनके जिस्म से किसी जोंक की तरह चिपक गयी थी। वो अपनी कमर उठाते तो मेरा पूरा जिस्म उनके साथ ही उठ जाता। उन्होंने एक ही धक्के में अपना पूरा मूसल जैसा लंड मेरी चूत में डाल दिया। मैंने अपनी चूत के मसल्स से उनके लंड को बुरी तरह जकड़ रखा था। मैं उनके मंथन से पहले अपनी चूत से उनके लंड को अच्छी तरह महसूस करना चाहती थी।

 

 

 

“शहनाज़! बहुत टाईट है तुम्हारी…” कहते हुए फिरोज़ भाई जान के होंठ मेरे होंठों पर आ लगे।

 

 

 

“आपको पसंद आयी?” मैंने पूछा तो उन्होंने बस हूँ कहा।

 

 

 

“ये तुम्हारे लिये है..... जब जी चाहे इसको यूज़ करना,” मैंने उनके गले में अपनी बांहें डाल कर उनके कान में धीरे से कहा, “आज मुझे इतना रगड़ो कि जिस्म का एक-एक जोड़ दर्द से तड़पने लगे।”

 

 

 

वो अब मेरे दोनों मम्मों को अपनी मुठ्ठी से मसलते हुए मेरी चूत में धक्के मार रहे थे। हर धक्के के साथ उनका लंड एक दम टोपे तक बाहर आता और फिर अगले ही पल पूरा अंदर समा जाता। मेरी चूत को तकिये से उठा कर रखने की वजह से उनके लंड की हर हरकत मुझे नज़र आ रही थी। मैं इतनी उत्तेजित थी और मेरा इतनी बार झड़ना हुआ कि गिनती ही भूल गयी। मैं बुरी तरह थक चुकी थी। लेकिन वो लगातार मुझे आधे घंटे तक इसी तरह ठोकते रहे। मेरा जिस्म पसीने से लथपथ हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं बादलों में उड़ती हुई जा रही हूँ। मुझे चुदाई में इतना मज़ा कभी नहीं मिला था। लग रहा था कि काश फिरोज़ भाई जान सारी ज़िंदगी इसी तरह बिना रुके चोदते ही जायें, बस… चोदते ही जायें। पूरा बिस्तर उनके धक्कों से हिल रहा था लेकिन नसरीन भाभी और जावेद पर कोई असर नहीं पड़ रहा था। दोनों थक कर और शराब के नेशे में बेसुध होकर गहरी नींद में सो रहे थे।

 

 

 

काफी देर तक इसी तरह चुदवाने के बाद जब मैंने महसूस किया कि फिरोज़ भाई जान के धक्कों में कुछ नरमी आ रही है तो कमान मैंने अपने हाथों में संभाल ली। हमने पोज़ बदल लिया। अब वो नीचे लेटे थे और मैं उनके ऊपर चढ़ कर अपनी चूत से उनको चूस रही थी। उन्होंने मेरे कूदते हुए दोनों मम्मों को अपने हाथों से सहलाना शुरू कर दिया। मैंने अपनी चूत का दबाव उनके लंड पर बनाया और अब मैं उनके रस को जल्दी निकाल देना चाहती थी क्योंकि मेरा कईं बार निकल चुका था और मैं थक गयी थी। लेकिन वो थे कि अपने लंड का फाऊँटेन चालू ही नहीं कर रहे थे। मुझे भी उनको ऊपर से करीब-करीब पंद्रह मिनट तक चोदना पड़ा तब जा कर मुझे महसूस हुआ कि अब उनके लंड से धार छूटने वाली है। इतना समझते ही मेरी चूत ने उनसे पहले ही अपना रस छोड़ दिया। वो भी मेरे साथ अपने रस का मेरी चूत में मिलाप करने लगे।

 

 

 

जैसे ही उनका छूटने को हुआ, उन्होंने मेरे निप्पल को अपनी मुठ्ठी में भींच कर अपनी ओर खींचा। नतीजा यह हुआ कि मैं उनके सीने से लग गयी। उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में सख्ती से जकड़ लिया और अपना रस छोड़ने करने लगे। उनकी बाजुओं में इतनी ताकत थी कि मुझे लगा मेरे सीने की दो चार हड्डियाँ टूट जायेंगी। काफी देर तक हम दोनों इसी तरह एक दूसरे की बाँहों में लेटे रहे। मैंने उनके सीने पर अपना सिर रख दिया और आँखें मूँद कर उनके निप्पल से खेलने लगी।

 

 

 

काफी देर तक हम एक दूसरे के जिस्म को सहलाते हुए लेटे रहे। मोहब्बत करते हुए फिरोज़ भाई जान को झपकी आने लगी, लेकिन आज तो सरी रात का प्रोग्राम था, इतनी जल्दी मैं कैसे उनको छोड़ सकती थी।

 

 

 

“क्या नींद आ रही है?” मैंने उनसे पूछा। वो बिना कुछ कहे मुझसे और सख्ती से लिपट गये और अपना मुँह मेरे दोनों मम्मों के बीच में दबा कर अपनी जीभ उनके बीच फिराने लगे। एक तो उनकी जीभ और दूसरी उनकी गरम सांसें..... मुझे ऐसा लग रहा था जैसे सीधे मेरे दिल में ही उतरती जा रही हैं। मैंने उनको हटा कर उठाते हुए कहा, “मेरा तो सारा नशा उतर गया है.... आओ एक-दो पैग लगाते हैं.....”

 

 

 

“मुझे तो नींद सी आ रही है.... कॉफी पिलाओगी?” उहोंने कहा।

 

 

 

 “अभी बना कर लाती हूँ.... तुम्हें आज पूरी रात जागना है मेरे लिये.... पर मैं तो व्हिस्की ही पीयूँगी..... तब जा कर मदहोशी में सारी रात मज़ा कर सकुँगी”, कह कर मैं बिस्तर से उठी। जैसे ही मैं अपने जिस्म को छुड़ा कर बिस्तर से नीचे उतरी तो उन्होंने मुझे हाथ पकड़ कर खींच कर वापस अपने ऊपर गिरा लिया और मेरे जिस्म को चूमने लगे।

 

 

 

“इतने उतावले भी नहीं बनो। अभी तो पूरी रात पड़ी है। अभी आपको तरो ताज़ा बनाती हूँ एक कड़क कॉफी पिला कर”, कहते हुए मैं वापस बिस्तर से उठी। मैंने नीचे उतर कर अपने कपड़े उठाने चाहे मगर उन्होंने झपट कर मेरे कपड़े अपने पास ले लिये और मुझे उसी तरह नंगी ही जाने को कहा। मैं शरम से दोहरी हुई जा रही थी। उन्होंने मेरे कपड़े बिस्तर पर दूसरी ओर फ़ेंक दिये और उन्होंने भी बिस्तर से नंगी हालत में उतर कर मुझे अपनी बाँहों में ले लिया। मुझे उसी तरह बाँहों में समेटे हुए वो ड्रैसिंग टेबल के सामने ले कर आये। फिर मुझे अपने सामने खड़ी कर के मेरे हाथ उठा कर अपनी गर्दन के पीछे रख लिये। मेरे बालों की लटों को मेरे मम्मों पर से हटा कर मुझे आइने के सामने बिल्कुल नंगी हालत में खड़ा कर दिया। हम दोनों एक दूसरे को निहार रहे थे।

 

 

 

“कैसी लग रही है हम दोनों की जोड़ी?” उन्होंने पूछा। मैं कुछ नहीं बोली और हम बस एक दूसरे को देखते रहे। चार इंच ऊँची हील के सैंडल पहने होने के बावजूद मैं उनके कंधे तक ही आ रही थी। कुछ देर बाद जब उन्होंने मुझे छोड़ा तो मैं किचन की ओर चली गयी। पीछे-पीछे वो भी आ गये।

 

 

 

मैंने कॉफी के लिये दूध चढ़ा दिया था और गैस ओवन के पास नंगी हालत में खड़ी अपने पैग की चुसकियाँ लेने लगी। पता ही नहीं चला कि कब वो मेरे पीछे आ कर खड़े हो गये। अपनी गर्दन पर जब किसी की गरम साँसों का एहसास हुआ तो मैं एकदम से चौंक उठी।

 

 

 

“इसमें दूध मत डालना.... तुम्हारा यूज़ कर लेंगे!” उन्होंने कहते हुए मेरी बगलों के नीचे से अपने हाथ निकाल कर मेरे दोनों मम्मों को थाम लिया और अपने हाथों से हल्के-हल्के उन पर फिराने लगे। उनके इस तरह सहलाने से मेरे निप्पल फ़ोरन खड़े हो गये। मैंने अपने मम्मों को सहलाते उनके हाथों को देख कर कहा, “बुद्धू अभी तक इनमें दूध आया कहाँ है। अभी तो ये खाली हैं।”

 

 

 

“चिंता क्यों करती हो.... इसी तरह मिलती रही तो वो दिन दूर नहीं जब तेरे दोनों मम्मे और मम्मों के नीचे का हिस्सा, दोनों फूल उठेंगे।”

 

 

 

“तो मना कब किया है.... फुला दो ना। मैं उसी का तो इंतज़ार कर रही हूँ।” वो मेरे निप्पल से खेल रहे थे। “आपने मुझे बिकुल बेशरम बना दिया है। देखो हमारा रिश्ता पर्दे का है और हम दोनों किस तरह नंगे खड़े हैं। वो दोनों जाग गये तो क्या कहेंगे?” मैंने अपना पैग खत्म करते हुए कहा।

 

 

 

 “वो क्या कहेंगे.... वो दोनों भी तो इसी तरह पड़े हैं। जब उन्हें किसी तरह की शरम और हया महसूस नहीं हो रही है तो हम क्यों ऐसी फ़ालतू बातों में अपना वक्त बर्बाद करें।” उन्होंने मेरे खाली ग्लास में और व्हिस्की डालते हुए कहा और वो अपने लंड को मेरे दोनों चूतड़ों के बीच रगड़ने लगे। उनका लंड वापस खड़ा होने लगा था। मैंने उनके लंड को अपने हाथों में थाम लिया और सहलाने लगी।

 

 

 

“आपका ये काफी बड़ा है। बहुत परेशान करता है। मेरी चूत को तो बिल्कुल फाड़ कर रख दिया। अभी तक दुख रही है।” मैंने उनके लंड के साथ-साथ, नीचे लटकते उनके गेंदों को भी सहलाते हुए कहा और अपना पैग पीने लगी।

 

 

 

अचानक उन्होंने अपनी मुठ्ठी में बंद एक खूबसूरत लॉकेट मेरे गले में पहना दिया।

 

 

 

“ये?” मैं उसे देख कर चौंक गयी।

 

 

 

“ये तुम्हारे लिये है। हमारी मोहब्बत की एक छोटी सी निशानी!” उन्होंने उस नेकलेस को गले में पहनाते हुए कहा।

 

 

 

“ये छोटी सी है?” मैंने उस नेकलेस को अपने हाथों में लेकर निहारते हुए कहा, “ये तो बहुत महंगी है, फिरोज़!”

 

 

 

“खूबसूरत जिस्म पर पहनने के लिये गहना भी वैसा ही होना चाहिये। इसकी रौनक तो तुम्हारे गले से लिपट कर बढ़ गयी है।” मैंने उन्हें आगे कुछ बोलने नहीं दिया और अपना ग्लास रख कर पीछे घूम कर उनसे लिपट गयी और उनके तपते होंठ पर अपने होंठ रख दिये। उन्होंने अपने सिर को झुका कर मेरे दोनों बूब्स के बीच झूल रहे उस लॉकेट को चूमा। ऐसा करते वक्त उनका मुँह मेरे दोनों मम्मों के बीच धंस गया। मैंने उनके बालों में अपनी अँगुलियाँ फ़िराते हुए उनके सिर को अपनी छातियों के बीच दबा दिया। मैं अपनी एक टाँग को उठा कर उनकी जाँघ पर रगड़ने लगी। मेरी जाँघों पर लगा दोनों के रस का लेप उनकी जाँघ पर भी फ़ैल गया। मैं उनके लंड को अपने हाथों में लेकर अपनी चूत के ऊपर फिराने लगी। हम दोनों एक दूसरे को मसलते हुए वापस गरम होने लगे। उन्होंने मुझे किचन की स्लैब पर हाथ रखवा कर सामने की ओर झुकाया और अपने लंड को मेरी रस से चुपड़ी हुई चूत पर लगा कर अंदर कर दिया।

 

 

 

“ऊऊह क्या कर रहे हो। पूरा दूध मेरे ऊपर उफ़न जायेगा। दूध गरम हो गया है।” मैंने उन्हें रोकने के इरादे से कहा।

 

 

 

“होने दो कुछ भी.... लेकिन अभी इस वक्त मुझे सिर्फ तुम और तुम्हारा ये नशीला जिस्म दिख रहा है। अब मेरा अपने ऊपर काबू नहीं रहा। तुम मुझे इतना पागल कर देती हो कि मुझे और कुछ भी नहीं दिखता।”

 

 

 

अब वो पीछे से धक्के मार रहे थे। उनके हाथ सामने आकर मेरे दोनों मम्मों को आटे की तरह मथ रहे थे। मैं उनके चोदने के तरीकों पर मार मिटी। उनसे चुदाई करते समय मुझे इतना मज़ा मिल रहा था जितना मुझे आज तक नहीं मिला था। वो पीछे से जोर-जोर से धक्के मार रहे थे। पैन में दूध उबल कर उफ़नने लगा। लेकिन हम दोनों को कहाँ फ़ुर्सत थी। मैंने देखा कि दूध उफ़न कर नीचे गिर रहा है। मैंने ये देख कर गैस ऑफ कर दी। क्योंकि इस हालत में कॉफी बनाना कम से कम मेरे बस का तो नहीं था। मेरा आधा जिस्म किचन स्लैब के ऊपर लगभग लेट सा गया। मेरे खुले बाल चेहरे के चारों ओर फ़ैले हुए थे, इसलिये कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा था। मैं अपने आप को संभालने के लिये अपना हाथ स्लैब से हटाती तो उनके जोरदार धक्कों से स्लैब के ऊपर गिरने को होती इसलिये मैंने कुछ भी ना करके सिर्फ इंजॉय करना शुरू किया। कुछ ही देर में मेरी चूत से रस की धार बह निकली। एक के बाद एक, दो बार झड़ने से मेरा रस जाँघों से बहता हुआ घुटनों तक पहुँच रहा था। वो मुझे जोर-जोर से ठोक रहे थे और मैं उनके हर धक्के पर सामने की ओर झुक रही थी। काफी देर तक इस तरह मुझे ठोकने के बाद हम अलग हुए तो उन्होंने मुझे उठा कर किचन स्लैब के ऊपर बिठा दिया और मेरी टाँगें अपने कंधों पर रख कर मेरी चूत में वापस लंड डाल कर ठोकना शुरू किया। कभी तो मैं सहारे के लिये अपने हाथों को स्लैब पर रखती तो कभी उनके गले के इर्दगिर्द डाल देती और कभी अपना ग्लास लेकर एक-दो घूँट ड्रिंक पीने लगती। मेरा सिर पीछे कि ओर झुक गया था। मैंने उनके होंठों को अपने होंठों में दबा कर काटना शुरू किया। वो कुछ देर तक इसी तरह चोदने के बाद मुझे उसी हालत में लेकर ड्राइंग रूम में आ गये। मैंने उनके गले में अपनी बाँहों का घेरा डाल रखा था और अपना आधा भरा हुआ व्हिस्की का ग्लास भी एक हाथ में पकड़ा हुआ था। उन्होंने मुझे किसी फूल की तरह अपनी गोद में उठा रखा था।

 

 

 

ड्राइंग रूम में सोफ़े के ऊपर मुझे पटक कर अब वो वापस जोर-जोर से ठोकने लगे। समझ में नहीं आ रहा था कि दो बार अपना रस निकालने के बाद भी उनमें कैसे इतना दमखम बचा हुआ है। सोफ़े पर मुझे कुछ देर तक चोदने के बाद वापस मेरी चूत को अपने रस से लबालब भर दिया। उनके लंड से इस बार इतना रस निकला कि चूत के बाहर बहता हुआ सोफ़े के कपड़े को गीला कर दिया था। मैं भी उनके ही साथ वापस खल्लास हो गयी थी। कुछ देर तक वहीं पड़े हुए अपना पैग खत्म करने के बाद मैं वापस उठ कर किचन में गयी। अब मुझ पर व्हिस्की की मदहोशी छाने लगी थी और ऊँची हील के सैंडल में मुझे अपने कदम बहकते हुए से महसूस हो रहे थे। इस बार फिरोज़ भाई जान वहीं सोफ़े पर ही पसरे रह गये थे। रात के दो बज रहे थे लेकिन हमारे आँखों में नींद का कोई नामो निशान नहीं था।

 

 

 

मैं उनके लिये कॉफी बना कर ले आयी। मैंने देखा कि वो मेरे खाली ग्लास में फिर से व्हिस्की भर रहे थे। जब उन्होंने वो ग्लास अपने होंठों से लगाया तो मैंने उनसे वो ग्लास अपने हाथ में ले लिया। “आप कॉफी पीजिये... अभी तो आपको बहुत मेहनत करनी है.... ड्रिंक पियेंगे तो मेरा साथ नहीं दे पायेंगे।” फिर वहीं उसी हालत में सोफ़े पर मैं उनकी गोद में बैठ कर व्हिस्की पीने लगी और वो कप से कॉफी पीने लगे।

 

 

 हम दोनों एक दूसरे को चूमते हुए और सहलाते हुए व्हिस्की और कॉफी सिप कर रहे थे।

 

 

 

“आपको भाभी जान कैसे झेलती होंगी। मेरी तो हालत पतली करके रख दी आपने। ऐसा लग रहा है कि सारी हड्डियों का कचूमर बना दिया हो अपने।” मैंने उनके होंठों पर लगी झाग को अपनी जीभ से साफ़ करते हुए कहा, “देखो क्या हालत कर के रख दी है”, मैंने अपने गोरे मम्मों पर उभरे लाल नीले निशानों को दिखाते हुए कहा। “इतनी बुरी तरह मसला है आपने कि कईं दिन तक ब्रा पहनना मुश्किल हो जायेगा।” नशे में मेरी आवाज़ भी थोड़ी सी बहकने लगी थी।

 

 

 

फिरोज़ भाई जान ने मेरे मम्मों को चूमते हुए अचानक अपनी दो अँगुलियाँ मेरी रस से भरी चूत में घुसा दी। जब अँगुलियाँ बाहर निकाली तो दोनों अँगुलियों से रस चू रहा था। उन्होंने एक अँगुली अपने मुँह में रखते हुए दूसरी अँगुली मेरी ओर की जिसे मैंने अपने मुँह में डाल लिया। दोनों एक-एक अँगुली को चूस कर साफ़ करने लगे।

 

 

 

“मज़ा आ गया आज। इतना मज़ा सैक्स में मुझे पहले कभी नहीं आया था”, फिरोज़ भाई जान ने मेरी तारीफ़ करते हुए कहा, “तुम बराबर का साथ देती हो तो सैक्स में मज़ा बहुत आता है। नसरीन तो बस बिस्तर पर पैरों को फैला कर पड़ जाती है मानो मैं उससे जबरदस्ती कर रहा हूँ।”

 

 

 

“अब आपको कभी उदास होने नहीं दूँगी। जब चाहे मुझे अपनी गोद में खींच लेना.... अब तो इस जिस्म पर आपका भी हक बन गया है।”

 

 

 

हम दोनों इसी तरह बातें करते हुए अपनी व्हिस्की या कॉफी सिप करते रहे। उनकी कॉफी खत्म हो जाने के बाद वो उठे। उन्होंने मुझे अपने ग्लास में फिर व्हिस्की डालते हुए देखा तो मुझे रोक दिया। “बहुत पी चुकी हो तुम..... बहुत नशा हो गया.... और पियोगी तो फिर तबियत बिगड़ जायेगी”, कहते हुए उन्होंने झुक कर मुझे अपनी गोद में ले लिया और मुझे अपनी बाँहों में उठाये बेडरूम की तरफ़ बढ़े।

 

 

 

“मैंने कभी कॉलेज के दिनों में किसी से इश्क नहीं किया था। आज फिर लगता है मैं उन ही दिनों में लौट गयी हूँ”, कहते हुए मैंने उनके सीने पर अपने होंठ रख दिये। उन्होंने मुझे और सख्ती से जकड़ लिया। मेरे मम्मे उनके सीने में पिसे जा रहे थे। मैंने उनके बाँह के मसल्स जो मुझे गोद में उठाने के कारण फूले हुए थे, उसे काटने लगी।

 

 

 

उन्होंने मुझे बेडरूम में लाकर बिस्तर पर लिटा दिया। फिर वो मेरी बगल में लेट गये और मेरे चेहरे को कुछ देर तक निहारते रहे। फिर मेरे होंठों पर अपनी अँगुली फ़िराते हुए बोले, “मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि तुम जैसी कोई हसीना कभी मेरी बाँहों में आयेगी।”

 

 

 

“क्यों? भाभी तो मुझसे भी सुंदर हैं!” मैंने उनसे कहा।

 

 

 

“होगी.. लेकिन तुममें ऐसा कुछ है जिसके लिये मैं आज तक तरस रहा था.... तुम सबसे ही अलग हो।”

 

 

 

“अब और हिम्मत नहीं है लेकिन मन नहीं भरा। एक बार और मुझे वो सब दे दो। अपने दूध से मुझे भिगो दो।” मैंने उनके कान को अपने दाँतों से काटते हुए कहा।

 

 

 

“अब इसका खड़ा होना मुश्किल है। आज शाम से काफी काम करना पड़ा ना, इसलिये बेचारा मुरझा गया है”, फिरोज़ ने अपने लंड की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।

 

 

 

“अरे! मैं किस लिये हूँ। अभी देखती हूँ कैसे ये नहीं तनता। अभी इसे खड़ा करती हूँ”, कहकर मैं उनके लंड को सहलाने लगी। कुछ देर तक सहलाने पर भी कोई खास असर नहीं पड़ा तो मैंने उनको चित्त करके लिटा कर उनके लंड को अपने दोनों मम्मों के बीच लेकर उसे अपने मम्मों से सहलाने लगी। उनके लंड में हल्का सा तनाव आ रहा था लेकिन वो कुछ ही देर में वापस चला जाता था। फिर मैंने उनके निप्पल को दाँतों से धीरे-धीरे काटना शुरू किया तो उनके जिस्म में उत्तेजना बढ़ने लगी। लेकिन अभी तक लंड अपनी पूरी जवानी पर नहीं आया था।

 

 

 

आखिरकार मैं उनके लंड को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। अपनी जीभ निकाल कर उनके लंड को और उनकी गेंदों को चाटने लगी। बीच-बीच में हल्के-हल्के से उनके लंड पर अपने दाँत भी गड़ा देती। उनका लंड अब तन गया था। मैं उसे चाटने के साथ-साथ अपने हाथों से भी सहला रही थी। इस बार उनकी टाँगों को मोड़ कर फ़ैलाने की बारी मेरी थी। मैंने उनकी टाँगों को फैला दिया और उनकी दोनों टाँगों के बीच उनकी गेंदों के नीचे अपनी जीभ फिराने लगी। दोनों गेंदों के नीचे जहाँ दोनों टाँगों का जोड़ होता है वो हिस्सा बहुत ही सेंसटिव था, वहाँ जीभ फ़िराते ही उनका लंड एकदम सख्त हो गया।

 

 

 

मैंने अपने सर को उठाकर इतराते हुए उनकी आँखों में झाँका और मुस्कुरा दी, “देखा? जीत किसकी हुई। अरे औरतों का बस चले तो मुर्दों के लंड भी खड़े कर के दिखा दें।”

 

 

 

“मान गये तुमको.... तुम तो वायग्रा से भी ज्यादा पॉवरफुल हो”, फिरोज़ भाई जान ने कहा।

 

 

 

“अब तुम चुपचाप पड़े रहो.... अब तुम्हें मैं चोदुँगी। मेरे इस पागल आशिक को खुश करने की बारी अब मेरी है।” मैं अपनी जुबान से निकल रहे लफ्जों पर खुद हैरान रह गयी। पहली बार इस तरह के शब्द मैंने किसी गैर-मर्द से कहे थे।

 

 

 

“तुम्हारे इस गधे जैसे लंड का आज मैं सारा रस निचोड़ लुँगी। भाभी को अब अगले एक हफ़्ते तक बगैर रस के ही काम चलाना पड़ेगा”, कहते हुए मैं उनके ऊपर चढ़ गयी और अपने हाथों से उनके लंड को अपनी चूत पर सेट करके अपना बोझ उनके लंड पर डाल दिया। उनका लंड वापस मेरी चूत की दीवारों को रगड़ता हुआ अंदर धंस गया।

 

 

 

“उफ़्फ़्फ़ऽऽऽ हर बार मुझे लगता है कि तुम्हारा लंड गले तक घुस जायेगा। भाभी कैसे झेलती होंगी आपको।” मेरे मुँह से एक हल्की सी दर्द भरी आवाज निकली। ऐसा लग रहा था कि शायद उनके लंड ने ठोक-ठोक कर अंदर की चमड़ी उधेड़ दी हो। मेरी चूत इस बार तो दर्द से फ़टी जा रही थी। मैंने अपने निचले होंठ को दाँतों से सख्ती से दबा कर किसी भी तरह की आवाज को मुँह से निकलने से रोका।

 

 

 

“इसे झेल नहीं पाती है.... तभी शायद इधर-उधर मुँह मारती फिरती है”, उन्होंने कहा।

 

 

 

“फिर तो उन्हें वो मज़ा मिल नहीं पाता होगा जो इस वक्त मुझे आ रहा है।” मैंने उनके सीने पर उगे बालों को अपनी मुठ्ठी में भर कर खींचा तो वो भी उफ़्फ़ कर उठे।

 

 

 

“क्या कर रही हो दर्द हो रहा है!”

 

 

 

मैंने हँसते हुए कहा, “कुछ दर्द तो तुम्हें भी होना चाहिये ना।”

 

 

 

 

मैं अब जोर-जोर से उनके लंड पर अपनी कमर को ऊपर नीचे करने लगी। वो मेरे दोनों मम्मों को अपने हाथ में लेकर बुरी तरह मसल रहे थे। मैं अपने दोनों घुटनों को मोड़ कर उनके लंड पर बैठी हुई थी। इस तरह पता नहीं कब तक हम दोनों की चुदाई चलती रही। हम दोनों ने आँखें बंद कर रखी थी और बस एक दूसरे के साथ चुदाई का मज़ा ले रहे थे। मैं उनके ऊपर झुक कर अपने लंबे बालों को उनके सीने पर फ़िरा रही थी। मैंने अपनी चूत के मसल्स से उनके लंड को बुरी तरह जकड़ रखा था। कुछ देर बाद मेरे जिस्म में वापस सिहरन होने लगी तो मैं समझ गयी कि मेरा निकलने वाला है। मैंने फिरोज़ भाई जान के ऊपर लेट कर अपने दाँत उनके सीने में गड़ा दिये। मेरे नाखून उनके कंधों में धंसे हुए थे और मुँह खुल गया था। मुँह से एक इत्मीनान की “आआऽऽऽहहऽऽऽऽ” निकली और मैं एक बार फिर खल्लास होकर उनके ऊपर पसर गयी। उनका अभी तक रस निकला नहीं था इसलिये अभी वो मुझे छोड़ना नहीं चाहते थे लेकिन मैं थक कर चूर हो गयी थी। इस एक रात में ना जाने कितनी बार मैंने रस की बोंछार उनके लंड पर की थी। जिस्म इतना थक चुका था कि अब हाथ पैर हिलाने में भी जोर आ रहा था लेकिन मन था कि मान ही नहीं रहा था।

 

 

 

उन्होंने मुझे अपने ऊपर से उठाया और बिस्तर पर चौपाया बना कर झुका दिया। मेरे हाथ मुड़ गये और मेरा मुँह तकिये में धंस गया। उन्होंने मेरी कमर को बिस्तर के किनारे करके घुमाया और बिस्तर के नीचे खड़े हो गये। इस हालत में मैं अपनी कमर उनकी तरफ़ उठा कर बिस्तर में धंसी हुई थी। वो बिस्तर से उतर कर नीचे खड़े हो गये और पीछे से मेरी चूत पर अपने लंड को सटा कर धक्का मार दिया। मेरी चूत एक बार फिर दर्द से काँप गयी। मेरा मुँह तकिये में धंसा होने के कारण सिर्फ कुछ “गूँ-गूँ” जैसी आवाज निकली और मेरी चूत पर उनका वार चालू हो गया। इस तरह मैं अपने जिस्म को उठाये हुए नहीं रख पा रही थी। नशे में मेरा जिस्म उनके धक्कों से बार-बार इधर उधर लुढ़कने लगता और इसलिये उन्हें अपने हाथों से चूत को सामने की ओर रखना पड़ रहा था। इस तरह जब बार-बार परेशानी हुई तो उन्होंने मुझे बिस्तर से नीचे उतार कर पहले बिस्तर के कोने में कुशन रखा और फिर मुझे घुटनों के बल झुका दिया। अब मेरी टाँगें ज़मीन पर घुटनों के बल टिकी हुई थीं और कमर के ऊपर का जिस्म कुशन के ऊपर से होता हुआ बिस्तर पर पसरा हुआ था। कुशन होने के कारण मेरे नितंब ऊपर की ओर उठ गये थे। ये पोज़िशन मेरे लिये ज्यादा सही थी। मेरे किसी भी अंग पर अब ज्यादा जोर नहीं पड़ रहा था। इस हालत में उन्होंने बिस्तर के ऊपर अपने हाथ रख कर अपने लंड को वापस मेरी चूत में ठोक दिया। कुछ देर तक इस तरह ठोकने के बाद उनके लंड से रस झड़ने लगा। उन्होंने मेरी चूत में से अपना लंड निकाल कर मुझे सीधा किया और अपने वीर्य की धार मेरे चेहरे पर और मेरे बालों पर छोड़ दी। इससे पहले कि मैं अपना मुँह खोलती, मैं उनके वीर्य से भीग चुकी थी। इस बार झड़ने में उन्हें बहुत टाईम लग गया।

 

 

 

मैं थकान और नशे से एकदम निढाल हो चुकी थी। मुझमें उठकर बाथरूम में जाकर अपने को साफ़ करने की भी हिम्मत नहीं थी। मैं उसी हालत में आँखें बंद किये पड़ी रही। मेरा आधा जिस्म बिस्तर पर था और आधा नीचे। ऐसी अजीबोगरीब हालत में भी मैं गहरी नींद में डूब गयी। पता ही नहीं चला कब फिरोज़ भाई जान ने मुझे सीधा करके बिस्तर पर लिटा दिया और मेरे नंगे जिस्म से लिपट कर खुद भी सो गये।

 

 

 

बीच में एक बार जोर की पेशाब आने की वजह से नींद खुली तो मैंने पाया कि फिरोज़ भाई जान मेरे एक मम्मे पर सिर रखे सो रहे थे। मैंने उठने की कोशिश की लेकिन मेरा सिर नशे में घूम रहा था और पूरा जिस्म दर्द से टूट रहा था। इसलिये मैं दर्द से कराह उठी। मुझसे उठा नहीं गया तो मैंने फिरोज़ भाई जान को उठाया।

 

 

 

“मुझे सहारा देकर बाथरूम तक ले चलो प्लीज़”, मैंने लड़खड़ाती ज़ुबान में उनसे कहा। उन्होंने उठ कर मुझे सहारा दिया तो हाई-हील सैंडलों में मैं लड़खड़ाते कदमों से उनके कंधे पर सारा बोझ डालते हुए बाथरूम में गयी। वो मुझे अंदर छोड़ कर वहीं खड़े हो गये।

 

 

 

“आप बाहर इंतज़ार कीजिये.... मैं बुला लुँगी”, मैंने कहा।

 

 

 

“अरे कोई बात नहीं.... मैं यहीं खड़ा रहता हूँ.... अगर तुम गिर गयीं तो?”

 

 

 

“छी! इस तरह आपके सामने इस हालत में मैं कैसे पेशाब कर सकती हूँ?”

 

 

 

“तो इसमें शरमाने की क्या बात है? हम दोनों में तो सब कुछ हो गया है.... अब शरम किस बात की?” उन्होंने बाथरूम का दरवाजा भीतर से बंद करते हुए कहा।

 

 

 

मैंने शरम के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरा चेहरा शरम से लाल हो रहा था। लेकिन मैं इस हालत में अपने पेशाब को रोकने में नाकाम थी और नशे में मुझसे खड़ा भी नहीं रहा जा रहा था। इसलिये मैं कमोड की सीट पर इसी हालत में बैठ गयी।

 

 

 

जब मैं फ्री हुई तो वो वापस मुझे सहारा देकर बिस्तर तक लाये। मैं वापस उनकी बाँहों में दुबक कर गहरी नींद में सो गयी।

 

 

 

अगले दिन सुबह मुझे नसरीन भाभी ने उठाया तो सुबह के दस बज रहे थे। मैं उस पर भी उठने के मूड में नहीं थी और  “ऊँ-ऊँ” कर रही थी। अचानक मुझे रात की सारी घटना याद आयी। मैंने चौंक कर आँखें खोलीं तो मैंने देखा कि मेरा नंगा जिस्म गले तक चादर से ढका हुआ है और मेरे पैरों में अभी भी सैंडल बंधे थे। मुझ पर किसने चादर ढक दी थी, पता नहीं चल पाया। वैसे ये तो लग गया था कि ये फिरोज़ के अलावा कोई नहीं हो सकता है।

 

 

 

“क्यों मोहतर्मा? रात भर कुटायी हुई क्या?” नसरीन भाभी ने मुझे छेड़ते हुए पूछा।

 

 

 

“भाभी जान! आप भी ना बस…” मैंने उठते हुए कहा।

 

 

 

“कितनी बार डाला तेरे अंदर अपना रस। रात भर में तूने तो उसकी गेंदों का सारा माल खाली कर दिया होगा।”

 

 

 

मैं अपने सैंडल उतार कर बाथरूम की ओर भागने लगी तो उन्होंने मेरी बाँह पकड़ कर रोक लिया, “बताया नहीं तूने?”

 

 

 

मैं अपना हाथ छुड़ा कर बाथरूम में भाग गयी। नसरीन भाभी दरवाजा खटखटाती रह गयीं लेकिन मैंने दरवाजा नहीं खोला। काफी देर तक मैं शॉवर के नीचे नहाती रही और अपने जिस्म पर बने अनगिनत दाँतों के दागों को सहलाती हुई रात के मिलन की एक-एक बात को याद करने लगी। फिरोज़ भाई जान की हरकतें याद करके मैं बांवरियों की तरह खुद ही मुस्कुरा रही थी। उनका मोहब्बत करना, उनकी हरकतें, उनका गठा हुआ जिस्म, उनकी बाजुओं से उठती पसीने की खुश्बू, उनकी हर चीज़ मुझे एक ऐसे नशे में दुबोती जा रही थी जो शराब के नशे से कहीं ज्यादा मादक था। मेरे जिस्म का रोयाँ-रोयाँ किसी बिन ब्याही लड़की कि तरह अपने आशिक को पुकार रहा था। शॉवर से गिरती ठंडे पानी की फ़ुहार भी मेरे जिस्म की गर्मी को ठंडा नहीं कर पा रही थी बल्कि खुद गरम भाप बन कर उड़ जा रही थी।

 

 

 

काफी देर तक नहाने के बाद मैं बाहर निकली। कपड़े पहन कर मैं बेड रूम से निकली तो मैंने पाया कि जेठ जेठानी दोनों निकलने की तैयारी में लगे हुए हैं। ये देख कर मेरा वजूद जो रात के मिलन के बाद से बादलों में उड़ रहा था एक दम से कठोर जमीन पर आ गिरा। मेरा चहकता हुआ चेहरा एकदम से कुम्हला गया।

 

 

 

मुझे देखते ही जावेद ने कहा, “शहनाज़ खाना तैयार कर लो। भाभी जान ने काफी कुछ तैयारी कर ली है.... अब फिनिशिंग टच तुम दे दो। भाई जान और भाभी जल्दी ही निकल जायेंगे।” मैं कुछ देर तक चुपचाप खड़ी रही और तीनों को सामान पैक करते देखती रही। फिरोज़ भाई जान कनखियों से मुझे देख रहे थे। मेरी आँखें भारी हो गयी थीं और मैं तुरंत वापस मुड़ कर किचन में चली गयी।

 

 

 

मैं किचन में जाकर रोने लगी। अभी तो एक प्यारे से रिश्ते की शुरुआत ही हुई थी और वो पत्थर दिल बस अभी छोड़ कर जा रहा है। मैं अपने होंठों पर अपने हाथ को रख कर सुबकने लगी। तभी पीछे से कोई मेरे जिस्म से लिपट गया। मैं उनको पहचानते ही घूम कर उनके सीने से लग कर फ़फ़क कर रो पड़ी। मेरे आँसुओं का बाँध टूट गया था।

 

 

 

“प्लीईऽऽज़ कुछ दिन और रुक जाओ!” मैंने सुबकते हुए कहा।

 

 

 

“नहीं! मेरा ऑफिस में पहुँचना बहुत जरूरी है वरना एक जरूरी मीटिंग कैंसल करनी पड़ेगी।”

 

 

 

“कितने ज़ालिम हो.... आपको मीटिंग की पड़ी है और मेरा क्या होगा?”

 

 

 

“क्यों जावेद है ना और हम हमेशा के लिये थोड़ी जा रहे हैं..... कुछ दिन बाद मिलते रहेंगे। ज्यादा साथ रहने से रिश्तों में बासीपन आ जाता है।” वो मुझे साँतवना देते हुए मेरे बालों को सहला रहे थे। मेरे आँसू रुक चुके थे लेकिन अभी भी उनके सीने से लग कर सुबक रही थी। मैंने आँसुओं से भरा चेहरा ऊपर किया। फिरोज़ भाई जान ने अपनी अँगुलियों से मेरी पलकों पर टिके आँसुओं को साफ़ किया और फिर मेरे गीले गालों पर अपने होंठ फ़िराते हुए मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये। मैं तड़प कर उनसे किसी बेल की तरह लिपट गयी। हमारा वजूद एक हो गया था। मैंने अपने जिस्म का सारा बोझ उनपर डाल दिया और उनके मुँह में अपनी जीभ डाल कर उनके रस को चूसने लगी। मैंने अपने हाथों से उनके लंड को टटोला।

 

 

 

“तेरी बहुत याद आयेगी!” मैंने ऐसे कहा मानो मैं उनके लंड से बातें कर रही हूँ, “तुझे नहीं आयेगी मेरी याद?”

 

 

 

“इसे भी हमेशा तेरी याद आती रहेगी”, उन्होंने मुझसे कहा।

 

 

 

“आप चल कर तैयारी कीजिये मैं अभी आती हूँ”, मैंने उनसे कहा। वो मुझे एक बार और चूम कर वापस चले गये।

 

 

 

उनके निकलने की तैयारी हो चुकी थी। उनके निकलने से पहले मैंने सबकी आँख बचा कर उनको एक गुलाब भेंट किया जिसे उन्होंने तुरंत अपने होंठों से छुआ कर अपनी जेब में रख लिया।

 

 

 

काफ़ी दिनों तक मैं उदास रही। जावेद मुझे बहुत छेड़ा करता था उनका नाम ले-लेकर। मैं भी उनकी बातों के जवाब में नसरीन भाभी जान को ले आती थी। धीरे-धीरे हमारा रिश्ता वापस नॉर्मल हो गया। फिरोज़ भाई जान का अक्सर मेरे पास फोन आता था। हम नेट पर कैमकॉर्डर की मदद से एक दूसरे को देखते हुए बातें करते थे।

 

 

 

उसके बाद काफी दिनों तक सब कुछ अच्छा चलता रहा। लेकिन जो सबसे बुरा हुआ वो ये कि मेरी प्रेगनेंसी नहीं ठहरी। फिरोज़ भाई जान को एक यादगार गिफ्ट देने की तमन्ना दिल में ही रह गयी। फिरोज़ भाई जान से उस मुलाकात के बाद उस महीने मेरे पीरियड आ गये। उनके वीर्य से मैं प्रेगनेंट नहीं हुई। ये उनको और ज्यादा उदास कर गया। लेकिन मैंने उन्हें दिलासा दिया। उनको मैंने कहा, “मैंने जब ठान लिया है तो मैं तुम्हें ये गिफ्ट तो देकर ही रहुँगी।”

 

 

 

वहाँ सब ठीक थाक चलता रहा लेकिन कुछ महीने बाद जावेद काम से देर रात तक घर आने लगे। मैंने उनके ऑफिस में भी पता किया तो पता लगा कि वो बिज़नेस में घाटे के दौर से गुजर रहे हैं और जो फर्म उनका सारा प्रोडक्शन खरीद कर विदेश भेजता था, उस फर्म ने उनसे रिश्ता तोड़ देने का ऐलान किया है।

 

 

 

एक दिन जब उदास हो कर जावेद घर आये तो मैंने उनसे इस बारे में डिसकस करने का सोचा। मैंने उनसे पूछा कि वो परेशान क्यों रहने लगे हैं। तो उन्होंने कहा, “इलाईट एक्सपोर्टिंग फर्म हमारी कंपनी से नाता तोड़ रहा है। जहाँ तक मैंने सुना है, उनका मुंबई की किसी फर्म के साथ पैक्ट हुआ है।”

 

 

 

“लेकिन हमारी कंपनी से इतना पुराना रिश्ता कैसे तोड़ सकते हैं?”

 

 

 

“क्या बताऊँ! उस फर्म का मालिक रस्तोगी और चिन्नास्वामी… पैसे के अलावा भी कुछ फेवर माँगते हैं जो कि मैं पूरा नहीं कर सकता”, जावेद ने कहा।

 

 

 

“ऐसी क्या डिमाँड करते हैं?” मैंने उनसे पूछा।

 

 

 

“दोनों एक नंबर के राँडबाज हैं। उन्हें लड़की चाहिये।”

 

 

 

“तो इसमें क्या परेशान होने की बात हुई। इस तरह की फरमाईश तो कईं लोग करते हैं और करते रहेंगे!” मैंने उनके सर पर हाथ फ़ेर कर साँतवना दी, “आप तो कुछ इस तरह की लड़कियाँ रख लो अपनी कंपनी में या फिर किसी प्रोफेशनल को एक दो दिन का पेमेंट देकर मंगवा लो उनके लिये।”

 

 

 

“अरे बात इतनी सी होती तो परेशानी क्या थी। वो बाज़ारू औरतों को नहीं पसंद करते। उन्हें तो कोई साफ़ सुथरी औरत चाहिये..... कोई घरेलू औरत!” जावेद ने कहा, “दोनों अगले हफ़्ते यहाँ आ रहे हैं और अपना ऑर्डर कैंसल करके इनवेस्टमेंट वापस ले जायेंगे। हमारी कंपनी बंद हो जायेगी।”

 

 

 

“तो अब्बू से बात कर लो.... वो आपको पैसे दे देंगे”, मैंने कहा।

 

 

 

“नहीं! मैं उनसे कुछ नहीं माँगुँगा। मुझे अपनी परेशानी को खुद ही हल करना पड़ेगा। अगर पैसे दे भी दिये तो भी जब खरीदने वाला कोई नहीं रहेगा तो कंपनी को तो बंद करना ही पड़ेगा।” जावेद ने कहा, “अमेरिका में जो फर्म हमारा माल खरीदती है, वो उसका पता देने को तैयार नहीं हैं। नहीं तो मैं डायरेक्ट डीलिंग ही कर लेता।”

 

 

 

“फिर?” मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी कि इसका क्या उपाय सोचा जाय।

 

 

 

“फिर क्या....? जो होना है होकर रहेगा।” उन्होंने एक गहरी साँस ली। मैंने उन्हें इतना परेशान कभी नहीं देखा था।

 

 

 

“कल आप उनको कह दो कि लड़कियों का इंतज़ाम हो जायेगा।” मैंने कहा, “देखते हैं उनके यहाँ पहुँचने से पहले क्या किया जा सकता है।”

 

 

 

अगले दिन जब वो आये तो उन्हें रिलैक्स्ड पाने कि जगह और ज्यादा टूटा हुआ पाया। मैंने कारण पूछा तो वो टाल गये।

 

 

 

“आपने बात की थी उनसे?”

 

 

 

“हाँ!”

 

 

 

“फिर क्या कहा आपने? वो तैयार हो गये? अरे परेशान क्यों होते हो..... हम लोग इस तरह की किसी औरत को ढूँढ लेंगे। जो दिखने में सीधी साधी घरेलू औरत लगे।”

 

 

 

“अब कुछ नहीं हो सकता!”

 

 

 

“क्यों?” मैंने पूछा।

 

 

 

“तुम्हें याद है वो हमारे निकाह में आये थे।“

 

 

 

“आये होंगे… तो?”

 

 

 

“उन्होंने निकाह में तुम्हें देखा था।”

 

 

 

“तो???” मुझे अपनी साँस रुकती सी लगी और एक अजीब तरह का खौफ पूरे जिस्म में छाने लगा।

 

 

 

“उन्हें सिर्फ तुम चाहिये।”

 

 

 

“क्या?” मैं लगभग चींख उठी, “उन हरामजादों ने समझा क्या है मुझे? कोई रंडी?”

 

 

 

वो सर झुकाये हुए बैठे रहे। मैं गुस्से से बिफ़र रही थी और उनको गालियाँ दे रही थी और कोस रही थी। मैंने अपना गुस्सा शांत करने के लिये किचन में जाकर एक पैग व्हिस्की का पिया। फिर वापस आकर उनके पास बैठ गयी और कहा, “फिर???” मैंने अपने गुस्से को दबाते हुए उनसे धीरे-धीरे पूछा।

 

 

 

“कुछ नहीं हो सकता!” उन्होंने कहा, “उन्होंने साफ़ साफ़ कहा है कि या तो तुम उनके साथ एक रात गुजारो या मैं इलाईट ग्रुप से अपना कांट्रेक्ट खत्म समझूँ”, उन्होंने नीचे कार्पेट की ओर देखते हुए कहा।

 

 

 

“हो जाने दो कांट्रेक्ट खत्म। ऐसे लोगों से संबंध तोड़ लेने में ही भलाई होती है। तुम परेशान मत हो। एक जाता है तो दूसरा आ जाता है।”

 

 

 

“बात अगर यहाँ तक होती तो भी कोई परेशानी नहीं थी।” उन्होंने अपना सिर उठाया और मेरी आँखों में झाँकते हुए कहा, बात इससे कहीं ज्यादा संजीदा है। “अगर वो अलग हो गये तो एक तो हमारे माल की खपत बंद हो जायेगी जिससे कंपनी बंद हो जायेगी… दूसरा उनसे संबंध तोड़ते ही मुझे उन्हें १५ करोड़ रुपये देने पड़ेंगे जो उन्होंने हमारी फर्म में इनवेस्ट कर रखे हैं।”

 

 

 

मैं चुपचाप उनकी बातों को सुन रही थी लेकिन मेरे दिमाग में एक लड़ाई छिड़ी हुई थी।

 

 

 

“अगर फैक्ट्री बंद हो गयी तो इतनी बड़ी रकम मैं कैसे चुका पाऊँगा। अपनी फैक्ट्री बेच कर भी इतना नहीं जमा कर पाऊँगा।” अब मुझे भी अपनी हार होती दिखायी दी। उनकी माँग मानने के अलावा अब और कोई रास्ता नहीं बचा था। उस दिन हम दोनों के बीच और बात नहीं हुई। चुपचाप खाना खा कर हम सो गये। मैंने तो सारी रात सोचते हुए गुजारी। ये ठीक है कि जावेद के अलावा मैंने उनके बहनोई और उनके बड़े भाई से जिस्मानी ताल्लुकात बनाये थे और कुछ-कुछ ताल्लुकात ससुर जी के साथ भी बने थे लेकिन उस फैमिली से बाहर मैंने कभी किसी से जिस्मानी ताल्लुकात नहीं बनाये।

 

 

 

अगर मैं उनके साथ एक रात बिताती हूँ तो मुझ में और दो टके की किसी रंडी में क्या फर्क रह जायेगा। कोई भी मर्द सिर्फ मन बहलाने के लिये एक रात की माँग करता है क्योंकि उसे मालूम होता है कि अगर एक बार उसके साथ जिस्मानी ताल्लुकात बन गये तो ऐसी एक और रात के लिये औरत कभी मना नहीं कर पायेगी।

 

 

 

लेकिन इसके अलावा हो भी क्या सकता था। इस भंवर से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। ऐसा लग रहा था कि मैं एक बीवी से एक रंडी बनती जा रही हूँ। किसी ओर भी रोश्नी की कोई किरण नहीं दिख रही थी। किसी और से अपना दुखड़ा सुना कर मैं जावेद को जलील नहीं करना चाहती थी।

 

 

 

सुबह मैं अलसायी हुई उठी और मैंने जावेद को कह दिया, “ठीक है! मैं तैयार हूँ!”

 

 

 

जावेद चुपचाप सुनते रहे और नाश्ता करके चले गये। उस दिन शाम को जावेद ने बताया कि रस्तोगी से उनकी बात हुई थी और उन्होंने रस्तोगी को मेरे राज़ी होने की बात कह दी है।

 

 

 

“हरामजादा… मादरचोद…. खुशी से मारा जा रहा होगा!” मैंने मन ही मन जी भर कर गंदी-गंदी गालियाँ दीं।

 

 

 

“अगले हफ़्ते दोनों एक दिन के लिये आ रहे हैं”, जावेद ने कहा, “दोनों दिन भर ऑफिस के काम में बिज़ी होंगे.... शाम को तुम्हें उनको एंटरटेन करना होगा।” 

 

 

 

“कुछ तैयारी करनी होगी क्या?”

 

 

 

“किस बात की तैयारी?” जावेद ने मेरी ओर देखते हुए कहा, “शाम को वो खाना यहीं खायेंगे, उसका इंतज़ाम कर लेना..... पहले हम सब ड्रिंक करेंगे।”

 

 

 

मैं बुझे मन से उस दिन का इंतज़ार करने लगी।

 

 

 

अगले हफ़्ते जावेद ने उनके आने की इत्तला दी। उनके आने के बाद सारा दिन जावेद उनके साथ बिज़ी थे। शाम को छः बजे के आस पास वो घर आये और उन्होंने एक पैकेट मेरी ओर बढ़ाया।

 

 

 

“इसमें उन लोगों ने तुम्हारे लिये कोई ड्रेस पसंद की है। आज शाम को तुम्हें यही ड्रेस पहननी है। इसके अलावा जिस्म पर और कुछ नहीं रहे.... ये कहा है उन्होंने।”

 

 मैंने उस पैकेट को खोल कर देखा। उसमें एक पारदर्शी झिलमिलाती साड़ी थी और साथ में काफी ऊँची और पतली हील के सैंडल थे और कुछ भी नहीं था। उनके कहे अनुसार मुझे अपने नंगे जिस्म पर सिर्फ वो साड़ी और सैंडल पहनने थे बिना किसी पेटीकोट और ब्लाऊज़ के। साड़ी इतनी महीन थी कि उसके दूसरी तरफ़ की हर चीज़ साफ़-साफ़ दिखायी दे रही थी।

 

 

 

“ये..?? ये क्या है? मैं ये साड़ी पहनुँगी? इसके साथ अंडरगार्मेंट्स कहाँ हैं?” मैंने जावेद से पूछा।

 

 

 

“कोई अंडरगार्मेंट नहीं है। वैसे भी कुछ ही देर में ये भी वो तुम्हारे जिस्म से नोच देंगे और तुम सिर्फ इन सैंडलों में रह जाओगी।” मैं एक दम से चुप हो गयी।

 

 

 

"तुम?...... तुम कहाँ रहोगे?” मैंने कुछ देर बाद पूछा।

 

 

 

"वहीं तुम्हारे पास!” जावेद ने कहा।

 

 

 

“नहीं तुम वहाँ मत रहना। तुम कहीं चले जाना। मैं तुम्हारे सामने वो सब नहीं कर पाऊँगी..... मुझे शरम आयेगी”, मैंने जावेद से लिपटते हुए कहा।

 

 

 

“क्या करूँ। मैं भी उस समय वहाँ मौजूद नहीं रहना चाहता। मैं भी अपनी बीवी को किसी और की बाँहों में झूलता सहन नहीं कर सकता। लेकिन उन दोनों हरामजादों ने मुझे बेइज्जत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वो जानते हैं कि मेरी दुखती रग उन लोगों के हाथों में दबी है। इसलिये वो जो भी कहेंगे मुझे करना पड़ेगा। उन सालों ने मुझे उस वक्त वहीं मौजूद रहने को कहा है”, कहते-कहते उनका चेहरा लाल हो गया और उनकी आवाज रुंध गयी। मैंने उनको अपनी बाँहों में ले लिया और उनके सिर को अपने दोनों मम्मों में दबा कर साँतवना दी।

 

 

 

“तुम घबराओ मत जानेमन! तुम पर किसी तरह की परेशानी नहीं आने दूँगी।”

 

 

 

मैंने नसरीन भाभी जान से फ़ोन पर इस बारे में कुछ घूमा फ़िरा कर चर्चा की तो पता चला उनके साथ भी इस तरह के वाक्यात होते रहते हैं। मैंने उन्हें उन दोनों के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे कहा कि बिज़नेस में इस तरह के ऑफर्स चलते रहते हैं और मुझे आगे भी इस तरह की किसी सिच्युवेशन के लिये हमेशा तैयार रहना चाहिये। उन्होंने सलाह दी कि मैं नेगेटिव ना सोचूँ और ऐसे मौकों पर खुद भी इंजॉय करूँ|

 

 

 

उस दिन शाम को मैं बन संवर कर तैयार हुई। मैंने कमर में एक डोरी की सहायता से अपनी साड़ी को लपेटा। मेरा पूरा जिस्म सामने से साफ़ झलक रहा था। मैं कितनी भी कोशिश करती अपने गुप्ताँगों को छिपाने की, लेकिन कुछ भी नहीं छिपा पा रही थी। एक अंग पर साड़ी दोहरी करती तो दूसरे अंग के लिये साड़ी नहीं बचती। खैर मैंने उसे अपने जिस्म पर नॉर्मल साड़ी की तरह पहना। फिर उनके दिये हुए हाई-हील के सैंडल पहने जिनके स्ट्रैप मेरी टाँगों पर क्रिसक्रॉस होते हुए घुटनों के नीचे बंधते थे। मैंने उन लोगों के आने से पहले अपने आप को एक बार आईने में देख कर तसल्ली की और साड़ी के आंचल को अपनी छातियों पर दोहरा करके लिया। फिर भी मेरे मम्मे साफ़ झलक रहे थे।

 

 

 

उन लोगों की पसंद के मुताबिक मैंने अपने चेहरे पर गहरा मेक-अप किया था। मैंने उनके आने से पहले कोंट्रासेप्टिव का इस्तेमल कर लिया था क्योंकि प्रिकॉशन लेने के मामले में इस तरह के संबंधों में किसी पर भरोसा करना एक भूल होती है।

 

 

 

उनके आने पर जावेद ने जा कर दरवाजा खोला। मैं अंदर ही रही। उनकी बातें करने की आवाज से समझ गयी कि दोनों अपनी रात हसीन होने की कल्पना करके चहक रहे हैं। मैंने एक गहरी साँस लेकर अपने आप को वक्त के हाथों छोड़ दिया। जब इसके अलावा हमारे सामने कोई रास्ता ही नहीं बचा था तो फिर कोई झिझक कैसी। मैंने अपने आप को उनकी खुशी के मुताबिक पूरी तरह से निसार करने की ठान ली।

 

 

 

जावेद के आवाज देने पर मैं एक ट्रे में चार ग्लास और आईस क्यूब कंटेनर लेकर ड्राइंग रूम में पहुँची। सब की आँखें मेरे हुस्‍न को देख कर बड़ी-बड़ी हो गयी। मेरी आँखें जमीन में धंसी जा रही थी। मैं शरम से पानी-पानी हो रही थी। किसी अंजान के सामने अपने जिस्म की नुमाईश करने का ये मेरा पहल मौका था। मैं हाई-हील सैंडलों में धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई उनके पास पहुँची। मैं अपनी झुकी हुई नजरों से देख रही थी कि मेरे आजाद मम्मे मेरे जिस्म के हर हल्के से हिलने पर काँप उठते और उनकी ये उछल कूद सामने बैठे लोगों की भूखी आँखों को राहत दे रही थी।

 

 

 

जावेद ने पहले उन दोनों से मेरा इंट्रोडक्शन कराया, “मॉय वाईफ शहनाज़ !” उन्होंने मेरी ओर इशारा करके उन दोनों को कहा, फिर मेरी ओर देख कर कहा, “ये हैं मिस्टर रस्तोगी और ये हैं…”

 

 

 

“चिन्नास्वामी.. चिन्नास्वामी येरगंटूर मैडम। यू कैन काल मी चिन्ना इन शॉर्ट।” चिन्नास्वामी ने जावेद की बात पूरी की। मैंने सामने देखा दोनों लंबे चौड़े शरीर के मालिक थे। चिन्नास्वामी साढ़े छः फ़ीट का मोटा आदमी था। रंग एकदम कार्बन की तरह काला और खिचड़ी दाढ़ी में एकदम साऊथ इंडियन फ़िल्म का कोई टिपिकल विलेन लग रहा था। उसकी उम्र ४५ से पचास साल के करीब थी और वजन लगभग १०० किलो के आस्पास होगा। जब वो मुझे देख कर हाथ जोड़ कर हंसा तो ऐसा लगा मानो बादलों के बीच में चाँद निकल आया हो।

 

 

 

और रस्तोगी? वो भी बहुत बुरा था देखने में। वो भी ४० साल के आसपास का ५’८" हाईट वाला आदमी था जिसकी फूली हुई तोंद बाहर निकली हुई थी। सिर बिल्कुल साफ़ था। उसमें एक भी बाल नहीं था। मुझे उन दोनों को देख कर बहुत बुरा लगा। मैं उन दोनों के सामने लगभग नंगी खड़ी थी। कोई और वक्त होता तो ऐसे गंदे आदमियों को तो मैं अपने पास ही नहीं फ़टकने देती। लेकिन वो दोनों तो इस वक्त मेरे फूल से जिस्म को नोचने को बेकरार हो रहे थे। दोनों की आँखें मुझे देख कर चमक उठीं। दोनों की आँखों से लग रहा था कि मैंने वो साड़ी भी क्यों पहन रखी थी। दोनों ने मुझे सिर से पैर तक भूखी नजरों से घूरा। मैं ग्लास टेबल पर रखने के लिये झुकी तो मेरे मम्मों के वजन से मेरी साड़ी का आंचल नीचे झुक गया और रसीले फलों की तरह लटकते मेरे मम्मों को देख कर उनके सीनों पर साँप लौटने लगे। मैं ग्लास और आईस क्यूब टेबल पर रख कर वापस किचन में जाना चाहती थी कि चिन्नास्वामी ने मेरी बाजू को पकड़ कर मुझे वहाँ से जाने से रोका।

 

 

 

“तुम क्यों जाता है.... तुम बैठो हमारे पास!” उसने थ्री सीटर सोफ़े पर बैठते हुए मुझे बीच में खींच लिया। दूसरी तरफ़ रस्तोगी बैठा हुआ था। मैं उन दोनों के बीच सैंडविच बनी हुई थी।

 

 

 

“जावेद भाई ये किचन का काम तुम करो। अब हमारी प्यारी भाभी जान यहाँ से नहीं जायेगी”, रस्तोगी ने कहा। जावेद उठ कर ट्रे किचन में रख कर आ गया। उसके हाथ में सोडे की बोतलें थीं। जब वो वापस आया तो मुझे दोनों के बीच कसमसाते हुए पाया। दोनों मेरे जिस्म से सटे हुए थे और कभी एक तो कभी दूसरा मेरे होंठों को या मेरी साड़ी के बाहर झाँकती नंगी बांहों को और मेरी गर्दन को चूम रहे थे। रस्तोगी के मुँह से अजीब तरह की बदबू आ रही थी। मैं किसी तरह साँसों को बंद करके उनकी हरकतों को चुपचाप झेल रही थी।

 

 

 

जावेद केबिनेट से बीयर की कईं बोतलें और एक स्कॉच व्हिस्की की बोतल ले कर आया। उसे उसने स्वामी की तरफ़ बढ़ाया।

 

 

 

“नक्को.. भाभी जान खोलेंगी!” उसने एक बीयर की बोतल मेरे आगे करते हुए कहा।

 

 

 

“लो हम तीनों के लिये बीयर डालो ग्लास में और अपने लिये व्हिस्की। रस्तोगी अन्ना का गला प्यास से सूख रहा होगा!” चिन्ना ने कहा।

 

 

 

“जावेद! योर वाईफ इज़ अ रियल ज्वैल…” रस्तोगी ने कहा, “यू लकी बास्टर्ड, क्या सैक्सी जिस्म है इसका। यू आर रियली अ लकी बगर।” जावेद तब तक सामने के सोफ़े पर बैठ चुका था। दोनों के हाथ आपस में मेरे एक एक मम्मे को बाँट चुके थे। दोनों साड़ी के आंचल को छातियों से हटा कर मेरे दोनों मम्मों को चूम रहे थे। ऐसी हालत में तीनों के लिये बीयर उढ़ेलना एक मुश्किल का काम था। दोनों तो ऐसे जोंक की तरह मेरे जिस्म से चिपके हुए थे कि कोशिश के बाद भी उन्हें अलग नहीं कर सकी।

 

 

 

मैंने उसी हालत में तीनों ग्लास में बीयर डाली और अपने लिये एक ग्लास में व्हिस्की डाली और जब मैं अपनी व्हिस्की में सोडा डालने लगी तो रस्तोगी ने मेरे व्हिस्की के ग्लास को बीयर से भर दिया। फिर मैंने बीयर के ग्लास उनकी तरफ़ बढ़ाये।

 

 

 

पहला ग्लास मैंने रस्तोगी की तरफ़ बढ़ाया। “इस तरह नहीं। जो साकी होता है.... पहले वो ग्लास से एक सिप लेता है फिर वो दूसरों को देता है!”

 

 

 

मैंने ग्लास के रिम को अपने होंठों से छुआ और फिर एक सिप लेकर उसे रस्तोगी कि तरफ़ बढ़ा दिया। फिर दूसरा ग्लास उसी तरह चिन्ना स्वामी को दिया और तीसरा जावेद को। तीनों ने मेरी खूबसूरती पर चियर्स किया। सबने अपने-अपने ग्लास होंठों से लगा लिये। मैं भी व्हिस्की और बियर की कॉकटेल पीने लगी। मेरी धड़कनें तेजी सी चल रही थीं और बेचैनी में मैंने चार-पाँच घूँट में ही अपना ग्लास खाली कर दिया।

 

 

 

“मस्त हो भाभी जान तुम....” कहकर रस्तोगी मेरे लिये दूसरा पैग बनाने लगा। उसने मेरा ग्लास व्हिस्की से आधा भर दिया और बाकी आधा बीयर से भर कर ग्लास मुझे पकड़ा दिया। इतने में जावेद ने सिगरेट का पैकेट चिन्ना स्वामी की तरफ बढ़ाया।

 

 

 

“नहीं ऐसे नहीं.... ड्रिंक्स की तरह भाभी ही सिगरेट सुलगा कर देंगी!” रस्तोगी ने कहा।

 

 

 

“ल…लेकिन मैं स्मोक नहीं करती!”

 

 

 

“अरे ये सिगरेट ही तो है। ड्रिंक्स के साथ स्मोक करने से और मज़ा आता है।”

 

 

 

“प्लीज़ रस्तोगी। इससे जबरदस्ती मत करो ये स्मोक नहीं करती है।” जावेद ने रस्तोगी को मनाया।

 

 

 

“कोई बात नहीं सिगरेट के फिलटर को चूम कर हल्का सा कश लेकर सुलगा तो सकती है। इसे बस सुलगा दो तो इसका मज़ा बढ़ जायेगा...... हम पूरी सिगरेट तो स्मोक करने को नहीं कह रहे!”

 

 

 

मैंने झिझकते हुए सिगरेट होंठों से लगायी और रस्तोगी ने बढ़ कर लाईटर सिगरेट के आगे जला दिया। मैंने हल्का सा ही कश लिया तो धुंआ मेरे फेफड़ों में भर गया और मेरी आँखों में पानी आ गया और मैं खाँसने लगी। स्वामी ने फटाफट मेरा ग्लास मेरे होंठों से लगा दिया और मैंने उस स्ट्रॉंग ड्रिंक का बड़ा सा घूँट पिया तो मेरी खाँसी बंद हुई। मैंने वो सिगरेट स्वामी को पकड़ा दी और फिर रस्तोगी और जावेद के लिये भी उसी तरह सिगरेट जलायीं पर उसमें मुझे पहले की तरह तकलीफ नहीं हुई। सब सिगरेट पीते हुए अपनी बीयर पीने लगे और मैं भी अपना कड़क कॉकटेल पीने लगी। स्वामी कुछ ज्यादा ही मूड में हो रहा था। उसने मेरे नंगे मम्मे को अपने हाथ से छू कर मेरे निप्पल को अपने ग्लास में भरे बीयर में डुबोया और फिर उसे अपने होंठों से लगा लिया। उसे ऐसा करते देख रस्तोगी भी मूड में आ गया। दोनों एक-एक मम्मे पर अपना हक जमाये उन्हें बुरी तरह मसल रहे थे और निचोड़ रहे थे। रस्तोगी ने अपने ग्लास से एक अँगुली से बीयर की झाग को उठा कर मेरे निप्पल पर लगा दिया फिर उसे अपनी जीभ से चाट कर साफ़ किया।

 

 

 

“म्म्म्म्म.. मज़ा आ गया!” रस्तोगी ने कहा, “जावेद तुम्हारी बीवी तो बहुत नशीली चीज़ है।”

 

 

 

मेरे निप्पल उत्तेजना में किसी बुलेट की तरह कड़े हो गये थे। मैंने सामने देखा। सामने जावेद अपनी जगह बैठे हुए एकटक मेरे साथ हो रही हरकतों को देख रहे थे। उनका अपनी जगह बैठे-बैठे कसमसाना ये दिखा रहा था कि वो भी किस तरह उत्तेजित होते जा रहे हैं। मुझे उनका इस तरह उत्तेजित होना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। ठीक है जान पहचान में स्वैपिंग एक अलग बात होती है लेकिन अपनी बीवी को किसी अंजान आदमी के हाथों मसले जाने का मज़ा लेना अलग होता है।

 

 

 

मुझे वहाँ मौजूद हर मर्द पर गुस्सा आ रहा था लेकिन मेरा जिस्म, मेरे दिमाग में चल रही उथल पुथल से बिल्कुल बेखबर अपनी भूख से पागल हो रहा था। मैं अपना दूसरा ग्लास भी लगभग खाली कर चुकी थी लेकिन पता नहीं क्यों, व्हिस्की और बीयर की इतनी स्ट्रॉंग कॉकटेल पीने के बावजूद मुझे कुछ खास नशा महसूस नहीं हो रहा था। रस्तोगी से और नहीं रहा गया तो उसने उठ कर मुझे हाथ पकड़ कर खड़ा किया और मेरे जिस्म पर झूल रही मेरी इक्लौती साड़ी को खींच कर अलग कर दिया। अब तक मेरे जिस हुस्‍न की साड़ी के बाहर से झलक सी मिल रही थी, वो अब बेपर्दा होकर सामने आ गया। अब मैं सिर्फ वो हाई-हील के सैंडल पहने बिल्कुल नंगी उनके सामने अपना ड्रिंक का ग्लास पकड़े खड़ी थी। मैं शरम से दोहरी हो गयी। रस्तोगी ने मेरे जिस्म के पीछे से लिपट कर मुझे अपने गुप्ताँगों को छिपाने से रोका। उसने मेरी बगलों के नीचे से अपने हाथों को डाल कर मेरे दोनों मम्मे थाम लिये और उन्हें अपने हथेलियों से ऊपर उठा कर स्वामी के सामने करके एक भद्दी सी हंसी हंसा।

 

 

 

“स्वामी... देख क्या माल है। साली खूब मजे देगी।” और उसने मेरे दोनों निप्पलों को अपनी चुटकियों में भर कर बुरी तरह उमेठ दिया। मैं दर्द से “आआआऽऽऽऽहहहऽऽऽ” कर उठी। स्वामी अपनी हथेली से मेरी चूत के ऊपर सहला रहा था। मैं अपनी दोनों टाँगों को सख्ती से एक दूसरे से भींचे खड़ी थी जिससे मेरी चूत उनके सामने छिपी रहे। लेकिन स्वामी ने जबरदस्ती अपनी दो अँगुलियाँ मेरी दोनों टाँगों के बीच घुसेड़ दी। मैंने अपना ग्लास एक घूँट में खाली किया तो रस्तोगी ने ग्लास मेरे हाथ से लेकर टेबल पर रख दिया। दो मिनट पहले तक मुझे कुछ खास नशा महसूस नहीं हो रहा था पर अब अचानक एक ही पल में जोर का नशा मेरे सिर चड़ कर ताँडव करने लगा और मैं झूमने लगी।

 

 

 

चिन्नास्वामी ने मुझे बाँहों से पकड़ अपनी ओर खींचा तो मैं नशे में झूमती हुई लड़खड़ा कर उसकी गोद में गिर गयी। उसने मेरे नंगे जिस्म को अपनी मजबूत बाँहों में भर लिया और मुझे अपने सीने में कस कर दबा दिया। मेरी बड़ी-बड़ी चूचियाँ उसके मजबूत सीने पर दब कर चपटी हो रही थी। चिन्नास्वामी ने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी। मुझे उसके इस तरह अपनी जीभ मेरे मुँह में फिराने से घिन्न आ रही थी लेकिन मैंने अपने जज़बातों को कंट्रोल किया। उसके दोनों हाथों ने मेरी दोनों छातियों को थाम लिया और अब वो उन दोनों को आते की तरह गूंथ रहे थे। मेरे दोनों गोरे मम्मे उसके मसलने के कारण लाल हो गये थे और दर्द करने लगे थे।

 

 

 

“अबे स्वामी इन तने हुए फ़लों को क्या उखाड़ फ़ेंकने का इरादा है तेरा? जरा प्यार से सहला इन खरबूजों को। तू तो इस तरह हरकत कर रहा है मानो तू इसका रेप कर रहा हो। ये पूरी रात हमारे साथ रहेगी इसलिये जरा प्यार से....” रस्तोगी ने चिन्नास्वामी को टोका।

 

 

 

रस्तोगी मेरी बगल में बैठ गया और मुझे चिन्ना स्वामी की गोद से खींच कर अपनी गोद में बिठा लिया। मैं नशे में झूमती हुई चिन्नास्वामी के जिस्म से अलग हो कर रस्तोगी के जिस्म से लग गयी। स्वामी उठकर अपने कपड़ों को अपने जिस्म से अलग कर के वापस सोफ़े पर बैठ गया। वो नंगी हालत में अपने लंड को मेरे जिस्म से सटा कर उसे सहलाने लगा। रस्तोगी मेरे मम्मों को मसलता हुआ मेरे होंठों को चूम रहा था।

 

 

 

फिर वो जोर-जोर से मेरी दोनों छातियों को मसलने लगा। मेरे मुँह से “आआआऽऽऽहहऽऽऽ,  ममऽऽऽ” जैसी आवाजें निकल रही थी। पराये मर्द के हाथ जिस्म पर पड़ते ही एक अजीब सा सेंसेशन होने लगता है। मेरे पूरे जिस्म में सिहरन सी दौड़ रही थी। रस्तोगी ने आईस बॉक्स से कुछ आईस क्यूब्स निकाल कर अपने ग्लास में डाले और एक आईस क्यूब निकाल कर मेरे निप्पल के चारों ओर फिराने लगा। उसकी इस हरकत से मेरा पूरा जिस्म गनगना उठा। मेरा मुँह खुल गया और जुबान सूखने लगी। ना चाहते हुए भी नशे में मुँह से उत्तेजना की अजीब-अजीब सी आवाजें निकलने लगी। मेरा निप्पल जितना फूल सकता था उतना फूल चुका था। वो फूल कर ऐसा कड़ा हो गया था मानो वो किसी पत्थर से बना हो। मेरे निप्पल के चारों ओर गोल काले चकते में रोंये खड़े हो गये थे और छोटे छोटे दाने जैसे निकल आये थे। बर्फ़ ठंडी थी और निप्पल गरम। दोनों के मिलन से बर्फ़ में आग सी लग गयी थी। फिर रस्तोगी ने उस बर्फ़ को अपने मुँह में डाल लिया और अपने दाँतों से उसे पकड़ कर दोबारा मेरे निप्पल के ऊपर फिराने लगा। मैं सिहरन से काँप रही थी। मैंने उसके सिर को पकड़ कर अपने मम्मे के ऊपर दबा दिया। उसकी साँसें घुट गयी थीं। मैंने सामने देखा कि जावेद मुझे इस तरह हरकत करता देख मंद-मंद मुस्कुरा रहा है। मैंने बेबसी से अपने दाँत से अपना निचला होंठ काट लिया। मेरा जिस्म गरम होता जा रहा था। नशे की वजह से बार-बार मैं उनकी हरकतों से खिलखिला कर हंस पड़ती थी। मैं नशे में इतनी धुत्त थी और अब उत्तेजना इतनी बढ़ गयी थी कि अगर मैं सब लोक लाज छोड़ कर रंडियों जैसी हरकतें भी करने लगती तो किसी को ताज्जुब नहीं होता। तभी स्वामी बचाव के लिये आगे आ गया।

 

 

 

“अ‍इयो रस्तोगी.... तुम कितना देर करेगा। सारी रात ऐसा ही करता रहेगा क्या। मैं तो पागल हो जायेगा। अब आगे बढ़ो अन्ना।” स्वामी ने मुझे अपनी ओर खींचा। मैं गिरते हुए उसके काले रीछ की तरह बालों वाले सीने से लग गयी। उसने मुझे अपनी बाँहों में लेकर ऐसे दबाया कि मेरी साँस ही रुकने लगी। मुझे लगा कि शायद आज एक दो हड्डियाँ तो टूट ही जायेंगी। मेरी जाँघों के बीच उसका लंड धक्के मार रहा था। मैंने अपने हाथ नीचे ले जाकर उसके लंड को पकड़ा तो मेरी आँखें फ़टी की फ़टी रह गयीं। उसका लंड किसी बेस बाल के बल्ले की तरह मोटा था। इतना मोटा लंड तो मैंने बस ब्लू फ़िल्म में ही देखा था। उसका लंड ज्यादा लंबा नहीं था लेकिन इतना मोटा था कि मेरी चूत को चीर कर रख देता। उसके लंड की मोटाई मेरी कलाई के बराबर थी। मैं उसे अपनी मुठ्ठी में पूरी तरह से नहीं ले पा रही थी।

 

 

 

मेरी आँखें घबड़ाहट से बड़ी-बड़ी हो गयी। स्वामी की नजरें मेरे चेहरे पर ही थी। शायद वो अपने लंड के बारे में मुझसे तारीफ़ सुनना चाहता था जो कि उसे मेरे चेहरे के जज़बातों से ही मिल गयी। वो मुझे डरते देख मुस्कुरा उठा। अभी तो उसका लंड पूरा खड़ा भी नहीं हुआ था।

 

 

 

“घबराओ मत... पहले तुम्हारी कंट को रस्तोगी चौड़ा कर देगा फिर मैं उसमें डालेगा”, कहते हुए उसने मुझे वापस अपने सीने में दबा दिया और अपना लंड मेरी जाँघों के बीच रगड़ने लगा।

 

 

 

रस्तोगी मेरे नितंबों से लिपट गया। उसका लंड मेरे नितंबों के बीच रगड़ खा रहा था। रस्तोगी ने टेबल के ऊपर से एक बीयर की बोतल उठायी और जावेद को इशारा किया उसे खोलने के लिये। जावेद ने ओपनर ले कर उसके ढक्कन को खोला। रस्तोगी ने उस बोतल से बीयर मेरे एक मम्मे के ऊपर उढ़ेलनी शुरू की।

 

 

 

“स्वामी! ले पी ऐसा नशीला बीयर साले गेंडे तूने ज़िंदगी में नहीं पी होगी”, रस्तोगी ने कहा। स्वामी ने मेरे पूरे निप्पल को अपने मुँह में ले रखा था इसलिये मेरे मम्मे के ऊपर से होती हुई बीयर की धार मेरे निप्पल के ऊपर से स्वामी के मुँह में जा रही थी। वो खूब चटखारे ले-ले कर पी रहा था। मेरे पूरे जिस्म में सिहरन हो रही थी। मेरा निप्पल तो इतना लंबा और कड़ा हो गया था कि मुझे उसके साइज़ पर खुद ताज्जुब हो रहा था। बीयर की बोतल खत्म होने पर स्वामी ने भी वही दोहराया। इस बार स्वामी बीयर उढ़ेल रहा था और दूसरे निप्पल के ऊपर से बीयर चूसने वाला रस्तोगी था। दोनों ने इस तरह से बीयर खत्म की। मेरी चूत से इन सब हरकतों के कारण इतना रस निकल रहा था कि मेरी जाँघें भी गिली हो गयी थी। मैं उत्तेजना में अपनी दोनों जाँघों को एक दूसरे से रगड़ रही थी और अपने दोनों हाथों से उन दोनों के तने हुए लौड़ों को अपनी मुठ्ठी में लेकर सहला रही थी। अब मुझे उन दोनों के चुदाई में देरी करने पर गुस्सा आ रहा था। मेरी चूत में मानो आग लगी हुई थी। मैं सिसकारियाँ ले रही थी। मैं अपने निचले होंठों को दाँतों में दबा कर सिसकारियों को मुँह से बाहर निकलने से रोकती हुई जावेद को देख रही थी और आँखों ही आँखों में मानो कह रही थी कि “अब रहा नहीं जा रहा है। प्लीज़ इनको बोलो कि मुझे मसल मसल कर रख दें।”

 

 

 

इस खेल में उन दोनों का भी मेरे जैसा ही हाल हो गया था। अब वो भी अपने अंदर उबल रहे लावा को मेरी चूत में डाल कर शाँत होना चाहते थे। उनके लौड़ों से प्री-कम टपक रहा था।

 

 

 

“अ‍इयो जावेद! तुम कुछ करता क्यों नहीं। तुम सारा सामान इस टेबल से हटाओ!” स्वामी ने जावेद को कहा। जावेद और रस्तोगी ने फ़टाफ़ट सेंटर टेबल से सारा सामान हटा कर उसे खाली कर दिया। स्वामी ने मुझे बाँहों में लेकर ऊपर कर दिया। मेरे पैर जमीन से ऊपर उठ गये। वो इतना ताकतवर था कि मुझे इस तरह उठाये हुए उसने टेबल का आधा चक्कर लगाया और जावेद के सामने पहुँच कर मुझे टेबल पर लिटा दिया। ग्लास टॉप की सेंटर टेबल पर बैठते ही मेरा जिस्म ठंडे काँच को छूकर काँप उठा। मुझे उसने सेंटर टेबल के ऊपर लिटा दिया। मैं इस तरह लेटी थी कि मेरी चूत जावेद के सामने थी। मेरा चेहरा दूसरी तरफ़ होने की वजह से मुझे पता नहीं चल पाया कि मुझे इस तरफ़ अपनी चूत को पराये मर्द के सामने खोल कर लेटे देख कर मेरे शौहर के चेहरे पर किस तरह के भाव थे।

 

 

 

उसने मेरे पैर फैला कर पंखे की तरफ़ उठा दिये। मेरी चूत उनके सामने खुली हुई थी। स्वामी ने मेरी चूत को सहलाना शुरू किया। दोनों अपने होंठों पर जीभ फिरा रहे थे।

 

 

 

“जावेद देखो! तुम्हारी बीवी को कितना मज़ा आ रहा है”, रस्तोगी ने मेरी चूत के अंदर अपनी अँगुलियाँ डाल कर अंदर के चिपचिपे रस से लिसड़ी हुई अँगुलियाँ जावेद को दिखाते हुए कहा।

 

 

 

फिर स्वामी मेरी चूत से चिपक गया और रस्तोगी मेरे मम्मों से। दोनों के मुँह मेरे गुप्ताँगों से इस तरह चिपके हुए थे मानो फ़ेविकोल से चिपका दिये हों। दोनों की जीभ और दाँतों ने इस हालत में अपने काम शुरू कर दिया था। मैं उत्तेजित हो कर अपनी टाँगों को फ़ेंक रही थी।

 

 

 

मैंने अपने बगल में बैठे जावेद की ओर देखा। जावेद अपनी पैंट के ऊपर से अपने लंड को हाथों से दबा रहा था। जावेद अपने सामने चल रहे सैक्स के खेल में डूबा हुआ था।

 

 

 

“आआऽऽऽऽहहऽऽऽ जावेदऽऽऽ ममऽऽऽऽ मुझे क्याऽऽऽ होता जा रहा है?” मैंने अपने सूखे होंठों पर ज़ुबान फिरायी, मेरा जिस्म सैक्स की गर्मी से झुलस रहा है।

 

 

 

जावेद उठ कर मेरे पास आकर खड़ा हो गया। मैंने अपने हाथ बढ़ा कर उसके पैंट की ज़िप को नीचे करके, बाहर निकलने को छटपटा रहे उसके लंड को खींच कर बाहर निकाला और उसे अपने हाथों से सहलाने लगी। रस्तोगी ने पल भर को मेरे निप्पल पर से अपना चेहरा उठाया और जावेद को देख कर मुस्कुरा दिया और वापस अपने काम में लग गया। मेरी लंबी रेशमी ज़ुल्फें जिन्हें मैंने जुड़े में बाँध रखा था, अब खुल कर बिखर गयीं और जमीन पर फ़ैल गयीं।

 

 

 

रस्तोगी अब मेरे निप्पल को छोड़ कर उठा और मेरे सिर के दूसरी तरफ़ आकर खड़ा हो गया। मेरी नजरें जावेद के लंड पर अटकी हुई थीं, इसलिये रस्तोगी ने मेरे सिर को पकड़ कर अपनी ओर घुमाया। मैंने देखा कि मेरे चेहरे के पास उसका तना हुआ लंड झटके मार रहा था। उसके लंड से निकलने वाले प्री-कम की एक बूँद मेरे गाल पर आकर गिरी जिसके कारण मेरे और उसके बीच एक महीन रेशम की डोर से संबंध हो गया। उसके लंड से मेरे मुँह तक उसके प्री-कम की एक डोर चिपकी हुई थी। उसने मेरे सिर को अपने हाथों से पकड़ कर कुछ ऊँचा किया। दोनों हाथों से वो मेरे सिर को पकड़ कर अपने लंड को मेरे होंठों पर फिराने लगा। मैंने अपने होंठ सख्ती से बंद कर रखे थे। जितना वो देखने में भद्दा था उसका लंड भी उतना ही गंदा था।

 

 

 

उसका लंड पतला और लंबा था। उसके लंड का शेप भी कुछ टेढ़ा था। उसमें से पेशाब की बदबू आ रही थी। साफ़ सफ़ाई का ध्यान नहीं रखता था। उसके लंड के चारों ओर फ़ैला घना जंगल भी गंदा दिख रहा था। लेकिन मैं आज इनके हाथों बेबस थी। मुझे तो उनकी पसंद के अनुसार हरकतें करनी थी। मेरी पसंद नापसंद की किसी को परवाह नहीं थी। अगर मुझसे पूछा जाता तो ऐसे गंदों से अपने जिस्म को नुचवाने से अच्छा मैं किसी और के नीचे लेटना पसंद करती।

 

 

 

मैंने ना चाहते हुए भी अपने होंठों को खोला तो उसका लंड… जितना सा भी सुराख मिला उसमें रस्तोगी ने उसे ठेलना शुरू किया। मैंने अपने मुँह को पूरा खोल दिया तो उसका लंड मेरे मुँह के अंदर तक चला गया। मुझे एक जोर की उबकाई आयी जिसे मैंने जैसे तैसे जब्त किया। रस्तोगी मेरे सिर को पकड़ कर अपने लंड को अंदर ठेलने लगा लेकिन उसका लंड आधा भी मेरे मुँह में नहीं घुस पाया और उसका लंड मेरे गले में जा कर फ़ंस गया। उसने और अंदर ठेलने की कोशिश की तो उसका लंड गले के छेद में फ़ंस गया। मेरा दम घुटने लगा तो मैं छटपटाने लगी। मेरे छटपटाने से स्वामी के काम में रुकावट आ रही थी इसलिये वो मेरी चूत से अपना मुँह हटा कर रस्तोगी से लड़ने लगा।

 

 

 

“अबे इसे मार डालेगा क्या। तुझे क्या अभी तक किसी सी अपना लंड चुसवाना भी नहीं आया?”

 

 

 

रस्तोगी अपने लंड को अब कुछ पीछे खींच कर मेरे मुँह में आगे पीछे धक्के लगाने लगा। उसने मेरे सिर को सख्ती से अपने दोनों हाथों के बीच थाम रखा था। जावेद मेरे पास खड़ा मुझे दूसरों से आगे पीछे से इस्तमाल किये जाते देख रहा था। उसका लंड बुरी तरह तना हुआ था। यहाँ तक कि स्वामी भी मेरी चूत को चूसना छोड़ कर मेरे और रस्तोगी के बीच लंड-चुसाई देख रहा था।

 

 

 

“योर वाईफ इज़ एक्सीलेंट! शी इज़ अ रियल सकर”, स्वामी ने जावेद को कहा।

 

 

 

“ऊऊऽऽऽहहऽऽऽ अन्ना! तुम ठीक ही कहता है… ये तो अपनी रेशमा को भी फ़ेल कर देगी लंड चूसने में।” जावेद उनकी बातें सुनता हुआ हैरानी से मुझे देख रहा था। मैंने कभी इस तरह से अपने हसबैंड के लंड को भी नहीं चूसा था। ये तो उन दोनों ने मुझे इतनी स्ट्रॉंग शराब पिला कर मेरे नशे और जिस्म की गर्मी को इस कदर बढ़ा दिया था कि मैं अपने आप को किसी चीप रंडी जैसी हरकत करने से नहीं रोक पा रही थी।

 

 

 

स्वामी ने कुछ ही देर में रस्तोगी के पीछे आकर उसको मेरे सामने से खींच कर हटाया।

 

 

 

“रस्तोगी तुम इसको फ़क करो। इसकी कंट को रगड़-रगड़ कर चौड़ा कर दो। मैं तब तक इसके मुँह को अपने इस मिसाईल से चोदता हूँ।” ये कहकर स्वामी आ कर रस्तोगी की जगह खड़ा हो गया और उसकी तरह ही मेरे सिर को उठा कर उसने अपनी कमर को आगे किया जिससे मैं उसके लंड को अपने मुँह में ले सकूँ। उसका लंड एक दम कोयले सा काला था लेकिन वो इतना मोटा था कि पूरा मुँह खोलने के बाद भी उसके लंड के सामने का सुपाड़ा मुँह के अंदर नहीं जा पा रहा था। उसने अपने लंड को आगे ठेला तो मुझे लगा कि मेरे होंठों के किनारे अब चीर जायेंगे। मैंने सिर हिला कर उसको अपनी बेबसी जतायी। लेकिन वो मानने को तैयार नहीं था। उसने मेरे सिर को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर एक जोर का धक्का मेरे मुँह में दिया और उसके लंड के आगे का टोपा मेरे मुँह में घुस गया। मैं उस लंड के आगे वाले मोटे से गेंद को अपने मुँह में दाखिल होता देख कर घबरा गयी। मुझे लगा कि अब मैं और नहीं बच सकती। पहाड़ की तरह दिखने वाला काला भुजंग मेरे ऊपर और नीचे के रास्तों को फड़ कर रख देगा। मैं बड़ी मुश्किल से उसके लंड पर अपने मुँह को चला पा रही थी। मैं तो आगे पीछे तो क्या कर रही थी, स्वामी ही खुद मेरे सिर को अपने हाथों से पकड़ कर अपने लंड के आगे पीछे कर रहा था। मेरे मुँह में स्वामी के लंड को दाखिल होता देख अब रस्तोगी मेरे पैरों के बीच आ गया था। उसने मेरी टाँगों को पकड़ कर अपने कंधे पर रख लिया और अपने लंड को मेरी चूत पर लगाया। मैं उसके लंड की टिप को अपनी चूत की दोनों फाँकों के बीच महसूस कर रही थी। मैंने एक बार नजरें तिरछी करके जावेद को देखा। उसकी आँखें मेरी चूत पर लगे लंड को साँस रोक कर देख रही थी। मैंने अपनी आँखें बंद कर ली। मैं हालात से तो समझौता कर ही चुकी थी और शराब के नशे में मेरी चूत उत्तेजना में झुलसी जा रही थी। अब मैंने भी इस चुदाई को पूरी तरह इंजॉय करने का मन बना लिया।

 

 

 

रस्तोगी काफी देर से इसी तरह अपने लंड को मेरी चूत से सटाये खड़ा था और मेरी टाँगों और पैरों के साथ-साथ मेरे सैंडलों को अपनी जीभ से चाट रहा था। अब हालात बेकाबू होते जा रहे थे। अब मुझसे और देरी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। मैंने अपनी कमर को थोड़ा ऊपर किया जिससे उसका लंड बिना किसी प्रॉब्लम के अंदर घुस जाये। लेकिन उसने मेरी कमर को आगे आते देख अपने लंड को उसी स्पीड से पीछे कर लिया। उसके लंड को अपनी चूत के अंदर सरकता ना पाकर मैंने अपने मुँह से “गूँऽऽऽ गूँऽऽऽ” करके उसे और देर नहीं करने का इशारा किया। कहना तो बहुत कुछ चाहती थी लेकिन उस मोटे लंड के गले तक ठोकर मारते हुए इतनी सी आवाज भी कैसे निकल गयी पता नहीं चला।

 

 

 

मैंने अपनी टाँगें उसके कंधे से उतार कर उसकी कमर के इर्द-गिर्द घेरा डाल दिया और उसकी कमर को अपनी टाँगों के जोर से अपनी चूत में खींचा लेकिन वो मुझसे भी ज्यादा ताकतवर था। उसने इतने पर भी अपने लंड को अंदर नहीं जाने दिया। आखिर हार कर मैंने अपने एक हाथ से उसके लंड को पकड़ा और दूसरे हाथ से अपनी चूत के द्वार को चौड़ा करके अपनी कमर को उसके लंड पर ऊँचा कर दिया।

 

 

 

“देख जावेद! तेरी बीवी कैसे किसी रंडी की तरह मेरा लंड लेने के लिये छटपटा रही है।” रस्तोगी मेरी हालत पर हंसने लगा। उसका लंड अब मेरी चूत के अंदर तक घुस गया था। मैंने उसके कमर को सख्ती से अपनी टाँगों से अपनी चूत पर जकड़ रखा था। उसके लंड को मैंने अपनी चूत के मसल्स से एक दम कस कर पकड़ लिया और अपनी कमर को आगे पीछे करने लगी। अब रस्तोगी मुझे नहीं बल्कि मैं रस्तोगी को चोद रही थी। रस्तोगी ने भी कुछ देर तक मेरी हालत का मज़ा लेने के बाद अपने लंड से धक्के देना शुरू कर दिया।

 

 

 

वो कुछ ही देर में पूरे जोश में आ गया और मेरी चूत में दनादन धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ लगता था कि मैं टेबल से आगे गिर पड़ुँगी। इसलिये मैंने अपने हाथों से टेबल को पकड़ लिया। रस्तोगी ने मेरे दोनों मम्मों को अपनी मुठ्ठी में भर लिया और उनसे जैसे रस निकालने की कोशिश करने लगा। मेरे मम्मों पर वो कुछ ज्यादा ही मेहरबान था। जब से आया था, उसने उन्हें मसल-मसल कर लाल कर दिया था। दस मिनट तक इसी तरह ठोकने के बाद उसके लंड से वीर्य की तेज़ धार मेरी चूत में बह निकली। उसके वीर्य का साथ देने के लिये मेरे जिस्म से भी धारा फूट निकली। उसने मेरे एक मम्मे को अपने दाँतों के बीच बुरी तरह जकड़ लिया। जब सारा वीर्य निकल गया तब जाकर उसने मेरे मम्मे को छोड़ा। मेरे मम्मे पर उसके दाँतों से हल्के से कट लग गये थे जिनसे खून की दो बूँदें चमकने लगी थी। स्वामी अभी भी मेरे मुँह को अपने खंबे से चोदे जा रहा था। मेरा मुँह उसके हमले से दुखने लगा था। लेकिन रस्तोगी को मेरी चूत से हटते देख कर उसकी आँखें चमक गयी और उसने मेरे मुँह से अपने लंड को निकाल लिया। मुझे ऐसा लगा मानो मेरे मुँह का कोई भी हिस्सा काम नहीं कर रहा है। जीभ बुरी तरह दुख रही थी। मैं उसे हिला भी नहीं पा रही थी और मेरा जबड़ा खुला का खुला रह गया। उसने मेरी चूत की तरफ़ आकर मेरी चूत पर अपना लंड सटाया।

 

 

 

जावेद वापस मेरे मुँह के पास आ गया। मैंने उसके लंड को वापस अपनी मुठ्ठी में लेकर सहलाना चालू किया। मैं उसके लंड पर से अपना ध्यान हटाना चाहती थी। मैंने जावेद की ओर देखा तो जावेद ने मुस्कुराते हुए अपना लंड मेरे होंठों से सटा दिया। मैंने भी मुस्कुरा कर अपना मुँह खोल कर उसके लंड को अंदर आने का रास्ता दिया। स्वामी के लंड को झेलने के बाद तो जावेद का लंड किसी बच्चे का हथियार लग रहा था।

 

 

 

स्वामी ने मेरी टाँगों को दोनों हाथों से जितना हो सकता था उतना फैला दिया। वो अपने लंड को मेरी चूत पर फिराने लगा। मैंने उसके लंड को हाथों में भर कर अपनी चूत पर रखा।

 

 

 

“धीरे-धीरे.. स्वामी! नहीं तो मैं मार जाऊँगी!” मैंने स्वामी से रिक्वेस्ट किया। स्वामी एक भद्दी हँसी हँसा। हँसते हुए उसका पूरा जिस्म हिल रहा था। उसका लंड वापस मेरी चूत पर से हट गया।

 

 

 

“ओये जावेद! तुम्हारी बीवी को तुम जब चाहे कर सकता है..... अभी तो मेरी हेल्प करो। इधर आओ मेरे रॉड को हाथों से पकड़ कर अपनी वाईफ के कंट में डालो। मैं इसकी टाँगें पकड़ा हूँ। इसलिये मेरा लंड बार-बार तुम्हारी वाईफ की कंट से फ़िसल जाता है। पकड़ो इसे…” जावेद ने आगे की ओर हाथ बढ़ा कर स्वामी के लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ा। कुछ देर से कोशिश करने की वजह से स्वामी का लंड थोड़ा ढीला पड़ गया था।

 

 

 

“जावेद! पहले इसे अपने हाथों से सहला कर वापस खड़ा करो। उसके बाद अपनी बीवी की पुसी में डालना। आज तेरी वाईफ की पुसी को फाड़ कर रख दुँगा!” जावेद उसके लंड को हाथों में लेकर सहलाने लगा। मैंने भी हाथ बढ़ा कर उसके लंड के नीचे लटक रही गेंदों को सहलाना शुरू किया। कैसा अजीब माहौल था; अपनी बीवी की चूत को ठुकवाने के लिये मेरा हसबैंड एक अजनबी के लंड को सहला कर खड़ा कर रहा था। कुछ ही देर में हम दोनों की कोशिशें रंग लायीं और स्वामी का लंड वापस खड़ा होना शुरू हो गया। उसका आकार बढ़ता ही जा रहा था। उसे देख-देख कर मेरी घिग्घी बंधने लगी।

 

 

 

“धीरे-धीरे स्वामी! मैं इतना बड़ा नहीं ले पाऊँगी। मेरी चूत अभी बहुत टाईट है।” मैंने कसमसाते हुए कहा, “तुम… तुम बोलते क्यों नहीं? ” मैंने नशे में लड़खड़ाती आवाज़ में जावेद से कहा।

 

 

 

जावेद ने स्वामी की तरफ़ देख कर उससे धीरे से रिक्वेस्ट की, “मिस्टर स्वामी! प्लीज़ थोड़ा धीरे से। शी हैड नेवर बिफोर एक्सपीरियंस्ड सच ए मासिव कॉक। यू मे हार्म हर… योर कॉक इज़ श्योर टू टियर हर अपार्ट।”

 

 

 

“हाहाह… डोंट वरी जावेद! वेट फोर फाईव मिनट्स। वंस आई स्टार्ट हंपिंग, शी विल स्टार्ट आस्किंग फोर मोर लाईक ए रियल स्लट”, स्वामी ने जावेद को दिलासा दिया। उसने मेरी चूत के अंदर अपनी दो अँगुली डाल कर उसे घुमाया और फिर मेरे और रस्तोगी के वीर्य से लिसड़ी हुई अँगुलियों को बाहर निकाल कर मेरी आँखों के सामने एक बार हिलाया और फिर उसे अपने लंड पर लगाने लगा। ये काम उसने कईं बार दोहराया। उसका लंड हम दोनों के वीर्य से गीला हो कर चमक रहा था। उसने वापस अपने लंड को मेरी चूत पर सटाया और दूसरे हाथ से मेरी चूत की फाँकों को अलग करते हुए अपने लंड को एक हल्का धक्का दिया। मैंने अपनी टाँगों को छत की तरफ़ उठा रखा था। मेरी चूत उसके लंड के सामने खुल कर फ़ैली हुई थी। हल्के से धक्के से उसका लंड अंदर ना जाकर गीली चूत पर नीचे की ओर फ़िसल गया। उसने दोबारा अपने लंड को मेरी चूत पर सटाया। जावेद उसके पास ही खड़ा था। उसने अपनी अँगुलियों से मेरी चूत की फाँकों को अलग किया और चूत पर स्वामी के लंड को फ़ंसाया। स्वामी ने अब एक जोर का धक्का दिया और उसके लंड के सामने का टोपा मेरी चूत में धंस गया। मुझे ऐसा लगा मानो मेरी दोनों टाँगों के बीच किसी ने खंजर से चीर दिया हो। मैं दर्द से छटपटा उठी, “आआआऽऽऽऽहहऽऽऽऽ”  और मेरे नाखुन जावेद के लंड पर गड़ गये। मेरे साथ वो भी दर्द से बिलबिला उठा। लेकिन स्वामी आज मुझ पर रहम करने के मूड में बिल्कुल नहीं था। उसने वापस अपने लंड को पूरा बाहर खींचा तो एक फक सी आवाज आयी जैसे किसी बोतल का कॉर्क खोला गया हो।

 

 उसे मुझे दर्द देने में मज़ा आ रहा था। नहीं तो वो अगर चाहता तो उस हालत में ही अपने लंड को धक्का दे कर और अंदर कर देता। लेकिन वो तो पूरे लंड को बाहर निकाल कर वापस मुझे उसी तरह के दर्द से छटपटाता देखना चाहता था। मैंने उसके जुनून को कम करने के लिये उसके सीने पर अपना एक हाथ रख दिया था लेकिन ये तो आँधी में एक कमज़ोर फूल की जुररत के समान ही था।

 

 

 

उसने वापस अपने लंड को मेरी चूत पर लगा कर एक जोर का धक्का दिया। मैं दर्द से बचने के लिये आगे की ओर खिसकी लेकिन कोई फ़र्क नहीं पड़ा। मैं दर्द से दोहरी हो कर चींख उठी, “उफफऽऽऽ माँऽऽऽ मार गयीईऽऽऽऽ।”

 

 

 

उसका आधा लंड मेरी चूत के मुँह को फाड़ता हुआ अंदर धंस गया। मेरा एक हाथ उसके सीने पर पहले से ही गड़ा हुआ था। मैंने दर्द से राहत पाने के लिये अपने दूसरे हाथ को भी उसके सीने पर रख दिया। उसके काले सीने पर घने काले सफ़ेद बल उगे हुए थे। मैंने दर्द से अपनी अँगुलियों के नाखुन उसके सीने पर गड़ा दिये। एक दो जगह से तो खून भी छलक आया और मुट्ठियाँ बंद हो कर जब खुली तो मुझे उसमें उसके सीने के टूटे हुए बाल नज़र आये। स्वामी एक भद्दी सी हँसी हँसा और मेरी टाँगों को पकड़ कर हँसते हुए उसने मुझसे पूछा, “कैसा लग रहा है जान.. मेरा ये मिसाईल? मज़ा आ गया ना?”

 

 

 

मैं दर्द को पीती हुई फ़टी हुई आँखों से उसको देख रही थी। उसने दुगने जोर से एक और धक्के के साथ अपने पूरे लंड को अंदर डाल दिया। मैं किसी मछली की तरह छटपटा रही थी। “आआऽऽऽऽहहहऽऽऽऽ मेरे खुदाऽऽऽऽऽ!! जावेद बचाऽऽऽओ ऊऊऽऽऽ मुझे ये फाड़ देंगेऽऽऽ।”

 

 

 

मैं टेबल से उठने की कोशिश करने लगी मगर रस्तोगी ने मेरे मम्मों को अपने हाथों से बुरी तरह मसलते हुए मुझे वापस लिटा दिया। उसने मेरे दोनों निप्पलों को अपनी मुठ्ठियों में भर कर इतनी जोर का मसला कि मुझे लगा मेरे दोनों निप्पल उखड़ ही जायेंगे। मैं इस दो तरफ़ा हमले से छटपटाने लगी। शुक्र है कि मैंने उनके कहने पर इतनी शराब पी रखी थी। अगर मैं इतने नशे में नहीं होती तो मैं ये सब बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर पाती थी।

 

 

 

स्वामी अपने पूरे लंड को मेरी चूत में डाल कर कुछ देर तक उसी तरह खड़ा रहा। मेरी चूत के अंदर मानो आग लगी हुई थी। मेरी चूत की दीवारें चरमरा रही थीं। रस्तोगी उस वक्त मेरे निप्पल और मेरे मम्मों को अपने हाथों से और दाँतों से बुरी तरह नोच रहा था और काट रहा था। इससे मेरा ध्यान बंटने लगा और कुछ देर में मैं अपने नीचे उठ रही दर्द की लहर को भूल कर रस्तोगी से अपने मम्मों को छुड़ाने लगी। कुछ देर बाद स्वामी का लंड सरसराता हुआ बाहर की ओर निकलता महसूस हुआ । उसने अपने लंड को टिप तक बाहर निकाला और फिर पूरे जोश के साथ अंदर डाल दिया। अब वो मेरी चूत में जोर-जोर से धक्के मारने लगा। उसको हरकत में आते देख रस्तोगी का लंड वापस खड़ा होने लगा। वो घूम कर मेरे दोनों कंधों के पास टाँगें रख कर अपने लंड को मेरे होंठों पर रगड़ने लगा। मैंने उसको लाचार समझ कर अपने मुँह को खोल कर उसके लंड को अपने मुँह में ले लिया। वो मेरी छातियों के ऊपर बैठ गया। मुझे ऐसा लगा मानो मेरे सीने की सारी हवा निकल गयी हो। वो अपने लंड को मेरे मुँह में देकर झुकते हुए अपने दोनों हाथों को अपने घुटनों पर रख कर मेरे मुँह में अपने लंड से धक्के मारने लगा। इस पोज़िशन में स्वामी मुझे दिखायी नहीं दे रहा था मगर उसके जबरदस्त धक्के मेरे पूरे जिस्म को बुरी तरह झकझोर रहे थे।

 

 

 

कुछ देर बाद मुझे रस्तोगी का लंड फूलते हुए महसूस हुआ। उसने एक झटके से अपने पूरे लंड को बाहर की ओर खींचा और उसे पूरा बाहर निकाल लिया। उसकी ये हरकत मुझे बहुत बुरी लगी। किसी को इतना चोदने के बाद भी उसके पेट में अपना रस नहीं उढ़ेलो तो लगता है मानो सामने वाला दगाबाज़ हो। मैंने उसके वीर्य को पाने के लिये अपना मुँह पूरा खोल दिया। उसने अपने लंड को अपनी मुठ्ठी में पकड़ा और वीर्य की एक तेज़ धार हवा में उछलती हुई मेरी ओर बढ़ी। उसने ढेर सारा वीर्य मेरे चेहरे पर, मेरे बालों में और मेरे खुले हुए मुँह में डाल दिया। मैंने तड़प कर अपने मुँह को उसके लंड के ऊपर लगाया और उसके बचे हुए वीर्य को अपने मुँह में भरने लगी।

 

 

 

“मेरे वीर्य को पीना नहीं। इसे मुँह में ही रख जब तक स्वामी का वीर्य तेरी चूत में नहीं छूट जाता!” रस्तोगी ने मुझसे कहा। स्वामी के धक्कों की स्पीड काफी बढ़ गयी। मैंने रस्तोगी का वीर्य अपने मुँह में भर रखा था जिससे मेरा मुँह फूल गया था। मुँह के कोरों से वीर्य छलक कर बाहर आ रहा था। बहुत सारा वीर्य डाला था उसने मेरे मुँह में। रस्तोगी मेरे ऊपर से हट गया। मेरे मम्मों पर अपने हाथ रखते हुए स्वामी मेरी चूत में धक्के मारने लगा। कुछ देर बाद वो नीचे झुक कर अपना सारा बोझ मेरे जिस्म पर डालते हुए मेरे मम्मों को अपने दाँतों से बुरी तरह काटने लगा। उसके जिस्म से वीर्य की तेज़ धार मेरी चूत में बहने लगी। स्वामी से चुदते हुए मैं भी दो बार अन्जाम तक पहुँची। पूरा वीर्य मेरी चूत में डाल कर वो उठा। मैं अपनी टाँगें फैलाये वहीं टेबल पर पड़ी पड़ी लंबी-लंबी साँसें ले रही थी। कुछ देर तक इसी तरह पड़े रहने के बाद रस्तोगी ने मुझे सहारा देकर उठाया।

 

 

 

“दिखा कि रस्तोगी के वीर्य को अभी तक मुँह में संभाल कर रखा है या नहीं।” स्वामी ने कहा। मैंने अपना मुँह खोल कर अंदर भरा हुआ वीर्य उन दोनों को दिखाया।

 

 

 

“ले… अब अपने मुँह से सारा वीर्य निकाल कर इस ग्लास में भर”, रस्तोगी ने कहा और मुझे एक खाली ग्लास पकड़ा दिया। अपने मुँह का सारा वीर्य उस ग्लास में डाल दिया। “चल अब अपने शौहर का वीर्य भी इस ग्लास में ले”। जावेद सोफ़े पर एक तरफ बैठा हुआ था। मुझे खड़ा कर के रस्तोगी ने जावेद की तरफ़ ढकेला। मेरी टाँगों में जोर नहीं बचा था और मैं नशे में चूर हो रही थी इसलिये मैं भरभरा कर जावेद के ऊपर गिर गयी। मैंने उसके लंड को चूस कर उसे फारिग कराया और उसका वीर्य अपने मुँह में इकट्ठा करके ग्लास में उढ़ेल दिया। स्वामी व्हिस्की की बोतल ले आया और उस ग्लास को भर दिया। फिर मेरा सिर पकड़ कर मुझे वो वीर्य और व्हिस्की का कॉकटेल पीने पर मजबूर किया। मेरी चूत से दोनों का वीर्य बहता हुआ फर्श पर टपक रहा था।

 

 

 

मैं अब उठ कर हाई-हील सैंडलों में दौड़ती और लड़खड़ाती हुई बाथरूम में गयी। नशे में मेरा सिर जोर से घूम रहा था। मेरी टाँगों से होते हुए दोनों का वीर्य नीचे की ओर बह रहा था। बाथरूम में जाकर जैसे ही अपना चेहरा आईने में देखा तो मुझे रोना आ गया। मेरा पूरा जिस्म, मेरे रेशमी बाल, सब कुछ वीर्य से सने हुए थे। मेरे मम्मों पर अनगिनत दाँतों के दाग थे। मैं अपने जिस्म से उनके वीर्य को साफ़ करने लगी लेकिन तभी दोनों बाथरूम में पहुँच गये और मुझे अपनी गोद में उठा लिया।

 

 

 

“प्लीज़ मुझे छोड़ दो! मुझे अपना जिस्म साफ़ करने दो! मुझे घिन्न आ रही है अपने जिस्म से”, मैं उनके आगे गिड़गिड़ायी।

 

 

 

“अरे मेरी जान! तुम तो और भी खूबसूरत लग रही हो इस हालत में… और अभी तो पूरी रात पड़ी है। कब तक अपने जिस्म को पोंछ-पोंछ कर आओगी हमारे पास।” रस्तोगी हँसने लगा। दोनों मुझे गोद में उठा कर बेडरूम में ले आये और उसी हालत में मुझे बेड पर पटक दिया। स्वामी बिस्तर पर नंगा लेट गया और मुझे अपनी ओर खींचा।

 

 

 

“आजा मेरे ऊपर”, स्वामी ने मुझे उसके लंड को अपने अंदर लेने का इशारा किया। मैंने अपनी कमर उठा कर उसके खड़े हुए लंड को अपनी चूत पर सैट किया। उसने अपने हाथों को आगे बढ़ा कर मेरे दोनों मम्मे थाम लिये। मैंने अपने चेहरे के सामने आये बालों को एक झटके से पीछे किया और अपनी कमर को उसके लंड पर धीरे-धीरे नीचे करने लगी। उसका मोटा लंड एक झटके से मेरी चूत का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हो गया। “आआऽऽऽहहहऽऽऽ उफफऽऽओहहऽऽऽ” मैं कराह उठी। एक बार उसके लंड से चुदाई हो जाने के बाद भी उसका लंड मेरी चूत में दाखिल होते वक्त मैं दर्द से छटपटा उठी। ऐसा लगता था शायद पिछली ठुकाई में मेरी चूत अंदर से छिल गयी थी। इसलिये उसका लंड वापस जैसे ही अंदर रगड़ता हुआ आगे बढ़ा, दर्द की एक तेज़ लहर पूरे जिस्म में समा गयी। मैंने अपने हाथ उसके सीने पर रख कर अपनी कमर को धीरे-धीरे नीचे किया। मेरा सिर नशे में बुरी तरह झूम रहा था और दिमाग पर नशे की जैसे एक धुँध सी छायी हुई थी।

 

 

 

रस्तोगी के वीर्य ने अब चेहरे पर और मम्मों पर सूख कर पपड़ी का रूप ले लिये था। मैं कुछ देर तक यूँ ही स्वामी के लंड पर बैठी अपनी उखड़ी हुई साँसों और अपने नशे को काबू में करने की कोशिश करने लगी तो पीछे से मेरी दोनों बगलों के नीचे से रस्तोगी ने अपने हाथ डाल कर मेरे जिस्म को जकड़ लिया और उसे ऊपर नीचे करना शुरू किया। धीरे-धीरे मैं खुद ही अपनी कमर को उसके लंड पर हिलाने लगी। अब दर्द कुछ कम हो गया था। अब मैं तेजी से स्वामी के लंड पर ऊपर नीचे हो रही थी।

 

 

 

अचानक स्वामी ने मेरे दोनों निप्पलों को अपनी मुठ्ठियों में भर कर अपनी ओर खींचा। मैं उसके खींचने के कारण उसके ऊपर झुकते-झुकते लेट ही गयी। उसने अब मुझे अपनी बाँहों में जकड़ कर अपने सीने पर दाब लिया। मेरे मम्मे उसके सीने में पिसे जा रहे थे। तभी पीछे से किसी की अँगुलियों की छु‍अन मेरे नितंबों के ऊपर हुई। मैं उसे देखने के लिये अपने सिर को पीछे की ओर मोड़ना चाहती थी लेकिन मेरी हरकत को भाँप कर स्वामी ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये और मेरे निचले होंठ को अपने मुँह में लेकर चूसने लगा। मैंने महसूस किया कि वो हाथ रस्तोगी का था। रस्तोगी मेरे माँसल चूतड़ों को अपने हाथ से सहला रहा था। कुछ ही देर में उसकी अँगुलियाँ सरकती हुई मेरी चूत पर धोंकनी की तरह चल रहे स्वामी के लंड के पास पहुँच गयीं। वो अपनी अँगुलियों को मेरी चूत से उफ़नते हुए रस से गीला कर मेरी गाँड के छेद पर फ़ेरने लगा। मैं उसकी नियत समझ कर छूटने के लिये छटपटाने लगी मगर स्वामी ने मुझे जोंक की तरह जकड़ रखा था। उन साँडों से मुझ जैसी नशे में धुत्त नाज़ुक कली कितनी देर लड़ सकती थी। मैंने कुछ ही देर में थक कर अपने जिस्म को ढीला छोड़ दिया।

 

 

 

रस्तोगी की पहले एक अँगुली मेरी गाँड के अंदर घुस कर काम रस से गीला करने लगी मगर जल्दी ही वो दो तीन अँगुलियाँ मेरी गाँड में ठूँसने लगा। मैं हर हमले पर अपनी कमर को उछाल देती मगर उस पर कोई असर नहीं होता। कुछ ही देर में मेरी गाँड को अच्छी तरह चूत के रस से गीला कर के रस्तोगी ने अपने लंड को वहाँ सटाया। स्वामी ने अपने दोनों हाथों से मेरे दोनों चूतड़ों को अलग करके रस्तोगी के लिये काम आसान कर दिया। मैंने पहले कभी गाँड चुदाई नहीं की थी, इसलिये घबराहट से मेरा दिल बैठने लगा।

 

 

 

रस्तोगी ने एक जोर के धक्के से अपने लंड को मेरी गाँड में घुसाने की कोशिश की मगर उसका लंड आधा इंच भी अंदर नहीं जा पाया। मैं दर्द से छटपटा उठी। रस्तोगी ने अब अपनी दो अँगुलियों से मेरी गाँड के छेद को फैला कर अपने लंड को उसमें ठूँसने की कोशिश की मगर इस बार भी उसका लंड रास्ता नहीं बना सका। इस नाकामयाबी से रस्तोगी झुँझला उठा। उसने लगभग चींखते हुए जावेद से कहा, “क्या टुकर-टुकर देख रहा है.... जा जल्दी से कोई क्रीम ले कर आ। लगता है तूने आज तक तेरी बीवी की ये सील नहीं तोड़ी। मैं तो इसकी गाँड सूखी ही मारना चाहता था पर साली बहुत टाईट है। मेरे लंड को पीस कर रख देगी।” रस्तोगी उत्तेजना में गंदी-गंदी बातें बड़बड़ा रहा था। जावेद ने पास के ड्रैसिंग टेबल से कोल्ड क्रीम की बोतल लाकर रस्तोगी को दी। रस्तोगी ने अपनी अँगुली से लगभग आधी शीशी क्रीम निकाल कर मेरे गाँड के छेद पर लगायी। फिर वो अपनी अँगुलियों से अंदर तक अच्छे से चीकना करने लगा। कुछ क्रीम उठा कर अपने लंड पर भी लगायी। इस बार जब उसने मेरी गाँड के छेद पर अपने लंड को रख कर धक्का दिया तो उसका लंड मेरी गाँड के छेद को फ़ाड़ता हुआ अंदर घुस गया। दर्द से मेरा जिस्म ऐंठने लगा। ऐसा लगा मानो कोई एक मोटी सलाख मेरी गाँड में डाल दी हो।

 

 

 

“आआआऽऽऽऽऊऊऊऊऽऽऽऽऽ ओहहऽऽऽऽ.. आआऽऽऽऽऽ.. ईईऽऽऽऽ ममऽऽऽमाँऽऽऽऽ”, मैं दर्द से छटपटा रही थी। दो तीन धक्के में ही उसका पूरा लंड मेरे पिछले छेद से अंदर घुस गया। जब तक उसका पूरा लंड मेरे शरीर में दाखिल नहीं हो गया तब तक स्वामी ने अपने धक्के बंद रखे और मेरे जिस्म को बुरी तरह अपने सीने पर जकड़ के रखा था। मुझे लगा कि मेरा शरीर सुन्न होता जा रहा है। लेकिन कुछ ही देर में वापस दर्द की तेज़ लहर ने पूरे जिस्म को जकड़ लिया। अब दोनों ने धक्के मारने शुरू कर दिये। हर धक्के के साथ मैं कसमसा उठती। दोनों के बड़े-बड़े लंड, ऐसा लग रहा था कि मेरे पेट की सारी अंतड़ियों को तोड़ कर रख देंगे। पंद्रह बीस मिनट तक दोनों के द्वारा मेरी ठुकायी चलती रही। फिर एक साथ दोनों ने मेरे दोनों छेदों को रस से भर दिया। रस्तोगी झड़ने के बाद मेरे जिस्म से हटा। मैं काफी देर तक स्वामी के जिस्म पर ही पसरी रही। उसका लंड नरम हो कर मेरी चूत से निकल चुका था। लेकिन मुझ में अब बिल्कुल भी ताकत नहीं बची थी। मुझे स्वामी ने अपने ऊपर से हटाया और अपनी बगल में लिटा लिया। मेरी आँखें बंद होती चली गयी। मैं थकान और नशे से नींद के आगोश में चली गयी। उसके बाद भी रात भर मेरे तीनों छेदों को आराम नहीं करने दिया गया। मुझे कईं बार कईं तरह से उन दोनों ने चोदा। मगर मैं नशे में चूर होकर बेसुध ही रही। एक दो बार दर्द से मेरी खुमारी जरूर टूटी लेकिन अगले ही पल वापस मैं नशे में बेसुध हो जाती। दोनों रात भर मेरे जिस्म को नोचते रहे। मेरे अंग-अंग को उन्होंने चोदा। मेरे मम्मों, बगलों और यहाँ तक कि मेरे पैरों और सैंडलों के बीच में भी अपने लौड़ों से रगड़ कर मुझे चोदा।

 

 

 

सुबह दोनों कपड़े पहन कर वापस चले गये। जावेद उन्हें होटल पर छोड़ आया। मैं उसी तरह बिस्तर पर बेसुध सी पड़ी हुई थी। सुबह ग्यारह बजे के आस पास मुझे थोड़ा होश आया तो जावेद को मैंने अपने पास बैठे हुए पाया। उसने सहारा देकर मुझे उठाया और मेरे सैंडल उतार कर मुझे बाथरूम तक पहुँचाया। मेरे पैर बुरी तरह काँप रहे थे। बाथरूम में शॉवर के नीचे मैं लगभग पंद्रह मिनट तक बैठी रही।

 

 

 

मैं एक लेडी डॉक्टर के पास भी हो आयी। लेडी डॉक्टर मेरी हालत देख कर समझी कि मेरे साथ कोई रेप जैसा हादसा हुआ है। मैंने भी उसे अपने कानफिडेंस में लेटे हुए कहा, “कल घर पर हसबैंड नहीं थे। चार आदमी जबरदस्ती घुस आये थे और उन्होंने मेरे साथ रात भर रेप किया।”

 

 

 

लेडी डॉक्टर ने पूछा कि मैंने पुलिस में एफ़-आई-आर दर्ज़ करवायी या नहीं तो मैंने उसको कहा, “मैं इस घटना का जिक्र करके बदनाम नहीं होना चाहती। मैंने अंधेरे में उनके चेहरे तो देखे नहीं थे तो फिर कैसे पहचानुँगी उन्हें..... इसलिये आप भी इसका जिक्र किसी से ना करें।”

 

 

 

डॉक्टर मेरी बातों से सहमत हो गयी मेरा मुआयना करके कुछ दवाइयाँ लिख दीं। मुझे पूरी तरह नॉर्मल होने में कईं दिन लग गये। मेरे मम्मों पर दाँतों के काले काले धब्बे तो महीने भर तक नज़र आते रहे। जावेद का काम हो गया था। उनके इलाईट कंपनी से वापस अच्छे संबंध हो गये। जावेद ने, जब तक मैं बिल्कुल ठीक नहीं हो गयी, तब तक मुझे पलकों पर बिठाये रखा। मुझे दो दिनों तक तो बिस्तर से ही उठने नहीं दिया। उसके मन में एक गिलटी फ़ीलिंग तो थी ही कि मेरी इस हालत की वजह वो और उनका बिज़नेस है।

 

 

 

कुछ ही दिनों में एक बहुत बड़ा कांट्रेक्ट हाथ लगा। उसके लिये जावेद को अमेरिका जाना पड़ा। वहाँ कस्टमर्स के साथ डीलिंग्स तय करनी थी और नये कस्टमर्स भी तलाश करने थे। उसे वहाँ करीब छः महीने लगने थे। मैंने इस दौरान उनके पेरेंट्स के साथ रहने की इच्छा ज़ाहिर कि। मैं अब मिस्टर ताहिर अज़ीज़ खान के बेटे की बीवी बन चुकी थी मगर अभी भी जब मैं उनके साथ अकेली होती तो मेरा मन मचलने लगता। मेरे जिस्म में एक सिहरन सी दौड़ने लगती। कहावत ही है कि लड़कियाँ अपनी पहली मोहब्बत कभी नहीं भूल पातीं।

 

 

 

ताहिर अज़ीज़ खान जी के ऑफिस में मेरी जगह अब उन्होंने एक ४५ साल की औरत, ज़ीनत को रख लिया था। नाम के बिल्कुल उलटी थी वो -- मोटी और कली सी। वो अब अब्बू की सेक्रेटरी थी। मैंने एक बार अब्बू को छेड़ते हुए कहा था, “क्या पूरी दुनिया में कोई ढंग की सेक्रेटरी आपको नहीं मिली?” तो उन्होंने हँस कर मेरी ओर देखते हुए एक आँख दबा कर कहा, “यही सही है। तुम्हारी जगह कोई दूसरी ले भी नहीं सकती और बाय द वे.... मेरा और कोई कुँवारा बेटा भी तो नहीं बचा ना।”

 

 

 

अभी दो महिने ही हुए थे कि मैंने ताहिर अज़ीज़ खान जी को कुछ परेशान देखा।

 

 

 

“क्या बात है अब्बू... आप कुछ परेशान हैं?” मैंने पूछा।

 

 

 

“शहनाज़! तुम कल से हफ़्ते भर के लिये ऑफिस आने लगो”, उन्होंने मेरी ओर देखते हुए पूछा, “तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं होगी ना अपने पुराने काम को संभालने में?”

 

 

 

“नहीं! लेकिन क्यों?” मैंने पूछा।

 

 

 

“अरे वो नयी सेक्रेटरी अकल के मामले में बिल्कुल खाली है। दस दिन बाद पैरिस में एक सैमिनार है हफ़्ते भर का। मुझे अपने सारे पेपर्स और नोट्स तैयार करने हैं जो कि तुम्हारे अलावा और कोई नहीं कर सकता। तुम जितनी जल्दी अपने काम में एक्सपर्ट हो गयी थीं, वैसी कोई दूसरी मिलना मुश्किल है।”

 

 

 

“लेकिन अब्बू… मैं वापस उस पोस्ट पर रेग्युलर काम नहीं कर सकती क्योंकि जावेद के आने पर मैं वापस मथुरा चली जाऊँगी।”

 

 

 

“कोई बात नहीं। तुम तो केवल मेरे सैमिनार के पेपर्स तैयार कर दो और मेरी सेक्रेटरी बन कर पैरिस में सैमिनार अटेंड कर लो। देखो इंकार मत करना। तुम्हें मेरे साथ सैमिनार अटेंड करना ही पड़ेगा। ज़ीनत के बस का नहीं है ये सब। इन सब सैमिनार में सेक्रेटरी स्मार्ट और सैक्सी होना बहुत जरूरी होता है, जो कि ज़ीनत है नहीं। यहाँ के छोटे-मोटे कामों के लिये ज़ीनत रहेगी।”

 

 

 

“ठीक है मैं कल से ऑफिस चलुँगी आपके साथ।” मैंने उन्हें छेड़ते हुए पूछा, “मुझे वापस स्कर्ट तो नहीं पहननी पड़ेगी ना?” मैंने अपनी राय सुना दी उन्हें। मैंने ये कहते हुए उनकी तरफ़ हल्के से अपनी एक आँख दबायी। वो मेरी बातों को सुन कर मुस्कुरा दिये।

 

 

 

“तुम्हारी जो मरज़ी हो, वो पहन लेना। कुछ नहीं पहनो तो भी ताहिर अज़ीज़ खान के बेटे की बीवी को लाइन मारने की हिम्मत किसी में नहीं होगी”, हम हँसते हुए अपने-अपने कमरों की ओर बढ़ गये। उस रात मुझे बहुत अच्छी नींद आयी। सपनों में मैं उस ऑफिस में बीते हर पल को याद करती रही।

 

 

 

मैं अगले दिन से ऑफिस जाने लगी। अब्बू के साथ कार में ही जाती और उनके साथ ही वापस आती। ऑफिस में भी अब सलवार कमीज़ या साड़ी में शालीनता से ही रहती। लेकिन जब केबिन में सिर्फ हम दोनों बचते तो मेरा मन मचलने लगता। मैंने महसूस किया था कि उस वक्त ताहिर अज़ीज़ खान जी भी असहज हो उठाते। जब मैं ऑफिस में बैठ कर कम्प्यूटर पर सारे नोट्स तैयार करती तो उनकी निगाहों की तपिश लगातार अपने जिस्म पर महसूस करती।

 

 

 

मैंने सारे पेपर्स तैयार कर लिये। चार दिन बाद मुझे उनके साथ पैरिस जाना था। एक दिन खाना खाने के बाद मैं और अब्बू टीवी देख रहे थे। अम्मी जल्दी सोने चली जाती हैं। कुछ देर बाद ताहिर अज़ीज़ खान जी ने कहा, “शहनाज़ पैरिस जाने की तैयारी करना शुरू कर दो। टिकट आ चुका है.... बस कुछ ही दिनों में फ्लाईट पकड़नी है।”

 

 

 

“मैं और क्या तैयारी करूँ। बस कुछ कपड़े रखने हैं।”

 

 

 

“ये कपड़े वहाँ नहीं चलेंगे”, उन्होंने कहा, “ओरगैना‌इज़िंग कंपनी ने सैमिनार का ड्रेस कोड रखा है और उसकी कॉपी अपने सारे केंडीडेट्स को भेजी है। उन्होंने ड्रेस कोड स्ट्रिकटली फोलो करने के लिये सभी कंपनियों के रेप्रिसेंटेटिव्स से रिक्वेस्ट की है। जिसमें तुम्हें…, यानी सेक्रेटरी को सैमिनार के वक्त लाँग स्कर्ट और ब्लाऊज़ में रहना पड़ेगा। शाम को डिनर और कॉकटेल के समय माइक्रो स्कर्ट और टाईट शर्ट पहननी पड़ेगी विदाऊट.... अंडरगार्मेंट्स” उन्होंने मेरी ओर देखा। मेरा मुँह उनकी बातों से खुला का खुला रह गया। “शाम को अंडरगार्मेंट्स पहनना अलाऊड नहीं है। दोपहर और ईवनिंग में पूल में टू पीस बिकिनी पहननी पड़ेगी और पैरों में हर समय हाई-हील्स पहने होने चाहिये.... कम से कम चार इंच हाई हील वाले।”

 

 

 

“हाई हील्स तो ठीक है लेकिन…?” मैंने थूक का घूँट निगल कर कहा, “मेरे पास तो इस तरह के सैक्सी ड्रेसेज़ हैं नहीं और आपके सामने मैं कैसे उन ड्रेसेज़ को पहन कर रहुँगी? ”

 

 

 

“क्यों क्या प्रॉब्लम है?”

 

 

 

“मैं आपकी बहू हूँ”, मैंने कहा।

 

 

 

“लेकिन वहाँ तुम मेरी सेक्रेटरी बन कर चलोगी!” ताहिर अज़ीज़ खान जी ने कहा।

 

 

 

“ठीक है सेक्रेटरी तो रहुँगी लेकिन इस रिश्ते को भी तो नहीं भुलाया जा सकता ना”, मैंने कहा।

 

 

 

“वहाँ देखने वाला ही कौन होगा। वहाँ हम दोनों को पहचानेगा ही कौन। वहाँ तुम केवल मेरी सेक्रेटरी होगी। एक सैक्सी और…”, मुझे ऊपर से नीचे तक देखते हुए आगे बोले,  “हॉट! तुम वहाँ हर वक्त मेरी पर्सनल नीड्स का ख्याल रखोगी जैसा कि कोई अच्छी सेक्रेटरी रखती है… ना कि जैसा कोई बहू अपने ससुर का रखती है।”

 

 

 

उनकी इस बात की गंभीरता को भाँप कर मैंने अपना सिर झुका लिया।

 

 

 

“तुम परेशान मत हो.... सारा अरेंजमेंट कंपनी करेगी! तुम कल मेरे साथ चल कर टेलर के पास अपना नाप दे आना। बाकी किस तरह के ड्रेस सिलवाने हैं और कितने सिलवाने हैं.... सब मेरा हेडेक है।”

 

 

 

अगले दिन मैं उनके साथ जाकर एक फेमस टेलर के पास अपना नाप दे आयी। जाने के दो दिन पहले ताहिर अज़ीज़ खान जी ने दो आदमियों के साथ एक बॉक्स भर कर कपड़े भिजवा दिये।

 

 

 

मैंने देखा कि उनमें हर तरह के कपड़े थे और हर ड्रेस के साथ मेल खाते हाई हील के सैंडल भी थे। कपड़े काफी कीमती थे। मैंने उन कपड़ों और सैंडलों पर एक नज़र डाल कर अपने बेडरूम में रख दिये। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी सास को वो एक्सपोज़िंग कपड़े दिखें। पता नहीं उसके बारे में वो कुछ भी सोच सकती थीं।

 

 

 

शाम को उनके वापस आने के बाद जब मैंने उन्हें अकेला पाया तो मैंने उनसे पूछा, “इतने कपड़े! सिर्फ मेरे लिये हैं?”

 

 

 

“और नहीं तो क्या! तुम वहाँ मेरी सेक्रेटरी होगी और मेरी सेक्रेटरी सबसे अलग दिखनी चाहिये। तुम हर रोज एक नये डिज़ाईन का ड्रेस पहनना। उन्हें भी तो पता चले हम इंडियंस कितने शौकीन हैं। तुमने पहन कर देखा उन्हें?”

 

 

 

“नहीं, मैंने अभी तक इन्हें ट्राई करके तो देखा ही नहीं।”

 

 

 

“कोई बात नहीं! आज रात खाना काने के बाद तुम्हारा ट्रायल लेते हैं।” फिर मुस्कुरा कर बोले, “अपनी सास को जल्दी सुला देना।”

 

 

 

रात को खाना खाने के बाद अम्मी सोने चली गयी। अब्बू ने खाना नहीं खाया। उन्होंने कहा कि वो खाने से पहले दो पेग व्हिस्की के लेना चाहते हैं। अम्मी तो इंतज़ार ना करके खुद खाना खाकर उन्हें मेरे हवाले कर के चली गयीं। मैंने सारा सामान सेंटर टेबल पर तैयार करके रख दिया। वो सोफ़े पर बैठ कर धीरे-धीरे ड्रिंक्स सिप करने लगे। वो इस काम को लंबा खींचना चाहते थे जिससे अम्मी गहरी नींद में सो जायें। उन्हें ड्रिंक करते देख मेरा भी ड्रिंक पीने का मन तो हुआ पर मैंने कभी अब्बू के सामने ड्रिंक नहीं की थी। मैं उनके पास बैठी उनके काम में हैल्प कर रही थी कुछ देर बाद उन्होंने पूछा, “तुम्हारी अम्मी सो गयीं? देखना तो सही।” मैं उठ कर उनके बेडरूम में जाकर एक बार सासू जी पर नज़र मार आयी। वो तब गहरी नींद में सो रही थी। मैं सामने के सोफ़े पर बैठने लगी तो उन्होंने मुझे अपने पास उसी सोफ़े पर बैठने का इशारा किया। मैं उठ कर उनके पास बैठ गयी।

 

 

 

उन्होंने कुछ देर तक मुझे निहारा और फिर कहा,  “जाओ शहनाज़… और एक-एक कर के सारे कपड़े मुझे पहन कर दिखाओ।” ये कहते हुए उन्होंने अपना ड्रिंक बनाया। मैं उठ कर अपने बेडरूम में चली गयी। बेडरूम में आकर बॉक्स खोल कर सारे कपड़ों को बिस्तर के ऊपर बिछा दिया। मैंने सबसे पहले एक ट्राऊज़र और शर्ट छाँटा। उसके साथ उसके साथ के हाई हील के सैंडल पहन कर कैट-वॉक करते हुए किसी मॉडल की तरह उनके सामने सोफ़े तक पहुँची और अपने हाथ कमर पर रख कर दो सेकेंड रुकी और फिर झुक कर उन्हें बो किया और धीरे से पीछे मुड़ कर उन्हें अपने पिछवाड़े का भी पूरा जायज़ा करने दिया और फिर मुड़कर पूछा, "ठीक है?"

 

 

 

उन्होंने मुस्कुरा कर कहा, “सैक्सी.. म्म्म्म…!”

 

 

 

मैं वापस अपने कमरे में आ गयी फिर दूसरे कपड़े पहन कर उनके सामने पहुँची..... फिर तीसरे.....। बनाने वाले ने बड़े ही खूबसूरत डिज़ाईन में सारे कपड़े सिले थे। जो रेडीमेड थे उन्हें भी काफी नाप तोल करके सेलेक्ट किया होगा क्योंकि कपड़े ऐसे लग रहे थे मानो मेरे लिये ही बने हों। जिस्म से ऐसे चिपक गये थे मानो मेरे जिस्म पर दूसरी चमड़ी चढ़ गयी हो।

 

 

 

ट्राऊज़र्स के बाद लाँग स्कर्ट्स और ब्लाऊज़ों की बारी आयी। ताहिर अज़ीज़ खान जी मेरे शो को दिल से इंजॉय कर रहे थे। हर कपड़े पर कुछ ना कुछ कमेंट पास करते जा रहे थे।

 

 

 

लाँग स्कर्ट्स के बाद माइक्रो स्कर्ट्स की बारी आयी। मैंने एक पहना तो मुझे काफी शरम आयी। स्कर्ट्स की लम्बाइ पैंटी के दो अंगुल नीचे तक थी। टॉप भी मेरी गोलाइयों के ठीक नीचे ही खत्म हो रही थी। टॉप्स के गले भी काफी डीप थे। मेरे आधे बूब्स सामने नज़र आ रहे थे। मैंने ब्रा और पैंटी के ऊपर ही उन्हें पहना और एक बार अपने जिस्म को सामने लगे फुल लेंथ आइने में देख कर शरमाती हुई उनके सामने पहुँची।

 

 

 

“नो नो.... तुम्हें पूरे ड्रेस-कोड को निभाना पड़ेगा”, उन्होंने अपने ग्लास से सिप करते हुए कहा, “नो अंदरगार्मेंट्स! ”

 

 

 

“मैं वहाँ उसी तरह पहन लुँगी.... यहाँ मुझे शरम आ रही है”, मैंने शरमाते हुए कहा।

 

 

 

“यहाँ मैं अकेला हूँ तो शरम आ रही है.... वहाँ तो सैंकड़ों लोग देखेंगे फिर?”

 

 

 

“अब्बू वहाँ तो सारी लड़कियाँ इसी ड्रेस में होंगीं.... इसलिये शरम नहीं लगेगी।”

 

 

 

“नहीं नहीं! तुम तो उसी तरह आओ! नहीं तो पता कैसे चलेगा इन कपड़ों में तुम कैसी लगोगी”, उन्होंने कहा तो मैं चुपचाप लौट आयी और अपनी ब्रा और पैंटी उतार कर हाई-हील सैंडलों में धीरे-धीरे चलते हुए वापस पहुँची। उनके सामने जाकर जैसे ही मैंने अपने हाथ कमर पर रखे तो उनकी आँखें बड़ी-बड़ी हो गयीं। उन्होंने शॉर्ट्स पहन रखी थी और उसमें से उनके लंड का उभार साफ़ दिखने लगा। उनका लंड मेरे एक्सपोज़र का मान करते हुए तन कर खड़ा हो गया। शॉर्ट्स के ऊपर से तंबू की तरह उभार नज़र आने लगा।

 

 

 

“सामने की ओर थोड़ा झुको”, उन्होंने मुझे कहा तो मैं सामने की ओर झुकी। मेरे टॉप के गले से मेरे पूरे उभार बाहर झाँकने लगे। पूरे मम्मे उनकी नजरों के सामने थे ।

 

 

 

“पीछे घूमो”, उन्होंने फिर कहा।

 

 

 

मैं धीरे-धीरे पीछे घूमी। मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे झुके होने के कारण पीछे घूमने पर छोटे से स्कर्ट के अंदर से मेरी चूत उनको नज़र आ गयी होगी। उन्होंने मेरी तारीफ़ करते हुए कहा, “बाय गॉड! तुम आग लगा दोगी सारे पैरिस में! ”

 

 

 

मुस्कुराते हुए मैं वापस बेड रूम में चली गयी। कुछ देर बाद एक के बाद एक, सारे स्कर्ट और टॉप ट्राई कर लिये। अब सिर्फ बिकिनी बची थी।

 

 

 

“अब्बू सारे कपड़े खत्म हो गये.... अब सिर्फ बिकिनियाँ ही बची हैं”, मैंने कहा।

 

 

 

“तो क्या! उन्हें भी पहन कर दिखाओ”, उन्होंने कसमसाते हुए अपने तने हुए लंड को सेट किया। इस तरह की हरकत करते हुए उनको मेरे सामने किसी तरह की शरम महसूस नहीं हो रही थी। काश कि मैंने भी उनकी तरह दो-तीन पैग व्हिस्की के पिये होते तो मैं भी और खुलकर और बेशर्म होकर ये शो इंजॉय करती।

 

 

 

मैंने वापस कमरे में जाकर पहली बिकिनी उठायी और उसे अपने जिस्म पर पहन कर देखा। बिकिनी सिर्फ ब्रा और पैंटी की तरह टू पीस थी। बाकी सारा जिस्म नंगा था। हर बिकिनी के रंग के साथ मेल खाते सैंडल भी थे। मैं वो बिकिनी और उसके साथ के हाई-हील सैंडल पहन कर चलती हुई ताहिर अज़ीज़ खान जी के पास आयी। मेरे लगभग नंगे जिस्म को देख कर ताहिर खान जी की जीभ होंठों पर फिरने लगी।

 

 

 

“मुझे तो अपने बेटे की किस्मत पर जलन हो रही है। ऐसी खूबसूरत हूर तो बस किसमत वालों को ही नसीब होती है”, उन्होंने मेरी तारीफ़ की। मैंने उनके सामने आकर उसी तरह झुक कर अपने मम्मों को उनकी आँखों के सामने किया और फिर एक हल्के झटके से मम्मों को हिलाया और घूम कर अपने नितंबों पर चिपकी पैंटी के भरपूर जलवे दिखाये। फिर मैं अंदर चली गयी।

 

 

 

एक के बाद एक बिकिनी ट्राई करने लगी। हर बिकिनी पहले वाली बिकिनी से ज्यादा छोटी थी। आखिरी बिकिनी तो बस निप्पल को ढकने के लिये दो इंच घेर के दो गोल आकर के कपड़े के टुकड़े थे। दोनों एक दूसरे से पतली डोर से बंधे थे। उन्हें निप्पल के ऊपर सेट करके मैंने डोर अपने पीछे बाँध ली। पैंटी के नाम पर एक छोटा सा एक ही रंग का तिकोना कपड़ा चूत को ढकने के लिये इलास्टिक से बंधा हुआ था। मैंने आइने में देखा। मैं पूरी तरह नंगी नज़र आ रही थी। हाइ हील सैंडलों में मेरी नंगी गाँड ऊपर की और ऊघड़ रही थी।

 

 

 

मैं वो पहन कर जब चलते हुए उनके सामने पहुँची तो उनके हाथ का ग्लास फ़िसल कर कार्पेट पर गिर पड़ा। मैं उनकी हालत देख कर हँस पड़ी। लेकिन तुरंत ही शरम से मेरा चेहरा लाल हो गया।

 

 

 

मैंने अब तक कईं गैर मर्दों के साथ में सब कुछ किया था मगर फिरोज़ भाई जान के साथ ही सैक्स को इंजॉय किया था। उनकी तरह इनके साथ भी मैं इंजॉय कर रही थी। मैं इस बार उनके कुछ ज्यादा ही पास पहुँच गयी। उनके सामने जाकर मैं अपना एक पैर सोफे पर उनकी टाँगों के बीच में रख कर मैं झुकी तो मेरे बड़े-बड़े बूब्स उनकी आँखों के सामने नाचने लगे। मेरे दोनों मम्मे उनसे बस एक हाथ की दूरी पर थे। वो अपने हाथों को उठा कर उन्हें छू सकते थे। मेरे सैंडल की आगे की टिप उनके शॉर्ट्स के ऊपर से उनके लंड को छू रही थी। मैंने अपने जिस्म को एक झटका दिया जिससे मेरे मम्मे बुरी तरह उछल उठे। फिर मैं पीछे मुड़कर अपने कमरे में जाने को हुई तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी गोद में खींचा। मैं लहरा कर उनकी गोद में गिर गयी। उनके होंठ मेरे होंठों से चिपक गये। उनके हाथ मेरी गोलाइयों को मसलने लगे। एक हाथ मेरे नंगे जिस्म पर फिरता हुआ नीचे टाँगों के जोड़ तक पहुँचा। उन्होंने मेरी चूत के ऊपर अपना हाथ रख कर पैंटी के ऊपर से ही उस जगह को मुठ्ठी में भर कर मसला। अब उनके हाथ मेरी ब्रा को मेरे जिस्म से अलग करना चाहते थे।

 

 

 

वो कुछ और करते कि उनका मोबाइल बज उठा। उनके ऑफिस के किसी आदमी का फोन था। वो किसी ऑफिशल काम के बारे में बात कर रहा था। मैं मौका देख कर उन कपड़ों को समेट कर वहाँ से भाग गयी। मैंने अपने कपड़े उतार कर वापस सलवार कमीज़ पहनी और सारे कपड़ों को समेट कर बॉक्स में रख दिया। मैं पूरी तरह तैयार होकर दस मिनट बाद बाहर आयी। तब तक ताहिर अज़ीज़ खान जी जा चुके थे। मैं टेबल से ड्रिंक्स का सारा सामान उठाने को झुकी तो मुझे सोफ़े पर एक गीला, गोल धब्बा नज़र आया। वो धब्बा उनके वीर्य से बना था। मैं सब समझ कर मुस्कुरा उठी।

 

 

 

मैंने अपने लिये एक डबल नीट पैग बनाया और उसे पीने के बाद मैं अपने कमरे में जाकर सो गयी। आज मेरे ससुर जी की रात खराब होनी थी और मैं आने वाले दिनों के बारे सोचती हुई सो गयी जब हफ़्ते भर के लिये पैरिस जैसी रंगीन जगह में हम दोनों को एक साथ रहना था।

 

 हम स्केड्यूल के हिसाब से फ्राँस के लिये निकल पड़े। पैरिस में हमारी तरह तकरीबन सौ कंपनी के रेप्रिसेंटेटिव आये थे। हमें एक शानदार रिज़ोर्ट-होटल में ठहराया गया। उस दिन शाम को कोई प्रोग्राम नहीं था तो हमें साईट-सींग के लिये ले जाया गया। वहाँ आईफल टॉवर के नीचे खड़े होकर हम दोनों कईं फोटो खिंचवाये। फोटोग्राफर्स ने हम दोनों को हसबैंड-वाईफ समझा। वो हम दोनों को कुछ इंटीमेट फोटो के लिये उकसाने लगे। ससुर जी ने मुझे देखा और मेरी राय माँगी। मैंने कुछ कहे बिना उनके सीने से लिपट कर अपनी रज़ामंदी जाता दी। हम दोनों ने एक दूसरे को चूमते हुए और लिपटे हुए कईं फोटो खिंचवाये। मैंने उनकी गोद में बैठ कर भी कईं फोटो खिंचवाये। ये सब फोटो उन्होंने छिपा कर रखने की मुझे तसल्ली दी। ये रिश्ता किसी भी तरह से इंडियन कलचर में एक्सेप्टेबल नहीं था।

 

 

 

अगले दिन सुबह से बहुत बिज़ी प्रोग्राम था। सुबह से ही मैं सैमिनार में बिज़ी रही। ताहिर अज़ीज़ खान जी, यानी मेरे ससुर जी, एक ब्लैक सूट जिस पर गोल्डन लाईनिंग थी, उसमें बहुत जच रहे थे। उन्हें देख कर किसी को अंदाज़ लगाना मुश्किल हो जाये कि उनके बेटों की निकाह भी हो चुके होंगे। वो खुद ४० साल से ज्यादा के नहीं लगते थे। जैसा कि मैंने पहले लिखा था कि निकाह से पहले से ही मैं उन पर मर मिटी थी। अगर मेरा जावेद से निकाह नहीं हुआ होता तो मैं तो उनकी मिस्ट्रैस बनकर रहने को भी तैयार थी। जावेद से मुलाकत कुछ और दिनों के बाद भी होती तो मैं अपनी वर्जिनिटी ताहिर अज़ीज़ खान जी पर निसार कर चुकी होती।

 

 

 

खैर वापस घटनाओं पर लौटा जाये। सुबह, ड्रेस कोड के अनुसार मैंने स्कर्ट-ब्लाऊज़ और साढ़े चार इंच ऊँची हील के सैंडल पहन रखे थे। १२ बजे के आस पास दो घांटे का ब्रेक मिलता था, जिसमें स्विमिंग और लंच करते थे। सब कुछ स्ट्रिक्ट टाईम टेबल के अनुसार किया जा रहा था। सुबह उठने से लेकर कब-कब क्या-क्या करना है, सब कुछ पहले से ही डिसायडिड था।

 

 

 

हमें अपने अपने कमरे में जाकर तैयार होकर स्विमिंग पूल पर मिलने के लिये कहा गया। मैंने एक छोटी सी टू पीस बिकिनी पहनी हुई थी। बिकिनी काफी छोटी सी थी। इसलिये मैंने उसके ऊपर एक शर्ट पहन ली थी। फिर उस बिकनी के साथ के हाई-हील सैंडल पहन कर मैं कमरे से बाहर निकल कर बगल वाले कमरे में, जिसमें ससुर जी रह रहे थे, उसमें चली गयी। ससुर जी कमरे में नहीं थे। मैंने इधर उधर नज़र दौड़ायी। बाथरूम से पानी बहने की आवाज सुनकर उस तरफ़ गयी तो देखा कि बाथरूम का दरवाजा आधा खुला हुआ था। सामने ताहिर अज़ीज़ खान जी पेशाब कर रहे थे। उन्होंने हाथ में अपना काला लंड संभाल रखा था। लंड आधा उत्तेजित हालत में था इसलिये काफी बड़ा दिख रहा था। मैं झट थोड़ा ओट में हो गयी जिससे कि उनकी नज़र अचानक मुझ पर नहीं पड़े और मैं वहाँ से उनको पेशाब करते हुए देखती रही। जैसे ही उन्होंने पेशाब ख़त्म करके अपने लंड को अंदर किया तो मैंने एक बनावटी खाँसी देते हुए उन्हें अपने आने की इत्तला दी। वो कपड़े ठीक करके बाहर निकले। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने नंगे जिस्म पर एक छोटा सा वी-शेप का स्विमिंग कास्ट्यूम पहन रखा था जिसमें से उनके लंड का उभार साफ़-साफ़ दिख रहा था। उन्होंने अपने लंड को ऊपर की ओर करके सेट कर रखा था।

 

 

 

उन्होंने मुझे बाँहों से पकड़ कर अपनी ओर खींचा तो मैं उनके नंगे जिस्म से लग गयी। उसी हालत में उन्होंने मेरे कंधे पर अपनी बाँह रख कर मुझे अपने से चिपका लिया। हम दोनों एक दूसरे के गले में हाथ डाले किसी नये शादीशुदा जोड़े की तरह स्विमिंग पूल तक पहुँचे।

 

 

 

यहाँ पर कोई शरम जैसी बात नहीं थी। बाकी लेडी सेक्रेटरिज़ मुझसे भी छोटे कपड़ों में थीं। उनके सामने तो मैं काफी डिसेंट लग रही थी। मैंने देखा कि सभी लड़कियाँ स्विमिंग करते वक्त भी अपने हाई-हील वाले सैंडल पहने हुए थीं। सारे मर्द छोटे स्विमिंग कास्ट्यूम पहने हुए नंगे जिस्म थे। उनके मांसल सीने देख कर किसी भी औरत का मन ललचा जाये। ताहिर अज़ीज़ खान जी इस उम्र में भी अपनी हैल्थ का बहुत खयाल रखते थे। रोज सुबह जिम जाने के कारण उनका जिस्म काफी कसा हुआ था। उनके सीने से लग कर मैं बहुत चहक रही थी। यहाँ देखने या टोकने वाला कोई नहीं था।

 

 

 

हम काफी देर तक स्विमिंग करते रहे। वहाँ हम कुछ जोड़े मिलकर एक बॉल से खेल रहे थे। वहीं पर जर्मनी से आये हुए हैमिल्टन और उसकी सैक्सी सेक्रेटरी साशा से मुलाकात हुई। हम काफी देर तक उनके साथ खेलते रहे। साशा ने एक बहुत ही छोटी सी ब्रा और पैंटी पहन रखी थी। वो उन कपड़ों और मेलखाते सैंडलों में बहुत ही सैक्सी लग रही थी। दूध के जैसी रंगत और सुनहरे बाल उसे किसी परी जैसा लुक दे रहे थे। उसका चेहरा बहुत ही खूबसूरत था और उसके बूब्स इतने सख्त थे कि लग रहा था उसने अपने सीने पर दो तरबूज बाँध रखे हों।

 

 

 

हैमिल्टन का कद काफी लंबा था, करीब छ: फुट और दो इंच। उसके पूरे जिस्म पर सुनहरे घने रोंये थे। सिर पर भी सुनहरे बाल थे। हल्की सी बेतरतीब बढ़ी दाढ़ी उसकी शख्सियत को और खूबसूरत बना रही थी। दोनों के बीच काफी नज़दीकी और बे-तकल्लुफी थी। साशा तो बे-झिझक उसको किस करती, उसके सीने पर अपने मम्मों को रगड़ती और कईं बार तो उसने हैमिल्टन के लंड को भी सब के सामने मसल दिया था। हैमिल्टन भी बीच-बीच में उसकी ब्रा के अंदर हाथ डाल कर साशा के मम्मों को मसल देता था। पैरिस में खुलेआम सैक्स का बोलबाला था। कोई अगर पब्लिक प्लेस में भी अपने साथी को नंगा कर देता और चुदाई करने लगता तो भी किसी की नज़र तक नहीं अटकती।

 

 

 

वहाँ स्विमिंग पूल पर ही कॉकटेल सर्व किया जा रहा था। मैंने एक ग्लास लिया और पास खड़े ताहिर अज़ीज़ खान जी के होंठों से लगा दिया। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने मेरी कमर को थाम कर मुझे अपने सीने से सटा लिया और मेरे हाथों से ग्लास में से कॉकटेल सिप करने लगे। उन्होंने एक सिप करने के बाद मेरे होंठों से ग्लास को सटा दिया। मैंने कभी उनके सामने शराब नहीं पी थी मगर उनके रिक्वेस्ट करने पर एक सिप उसमें से ली। शराब पीने की तो मैं निहायत शौकीन थी| अब उनके सामने पीने की शरम भी खुल गयी तो मैंने भी अपने लिये एक ग्लास ले लिया और फिर आकर उनसे चिपक गयी। मेरा नंगा जिस्म उनके जिस्म से रगड़ खा रहा था। दोनों के नंगे जिस्मों के एक दूसरे से रगड़ खाने की वजह से एक सिहरन सी पूरे जिस्म में फैली हुयी थी।

 

 

 

जब हमारे ग्लास खत्म हुए तो मैंने ग्लास पूल के पास जमीन पर रख दिये और उनकी बाँहों से निकल गयी। वो दूसरा ग्लास लेकर किसी से डिस्कशन करने लगे तो मैंने भी अपने लिये एक ग्लास और ले लिया। शराब तो वहाँ पानी की तरह पी जा रही थी तो मैं क्यों खुद को रोकती। नयी-नयी कॉकटेल टेस्ट करने का मौका था। तीसरा ड्रिंक पीने का बाद मुझे सुरूर सा छाने लगा तो मैं वापस स्विमिंग पूल में तैरने लगी। मुझे देख कर हैमिल्टन भी मेरे साथ तैरने लगा। जब मैं कुछ देर बाद दूसरे कोने पर पहुँची तो हैमिल्टन ने मेरे पास आकर मुझे खींच कर अपने सीने से लगा लिया।

 

 

 

“आय एनवी योर एंपलायर। व्हॉट ए सैक्सी डैमसल ही हैज़ फ़ोर ए सेक्रेटरी!” उसने कहा और मुझे खींच कर अपने जिस्म से कस कर सटा लिया। उसने अपने तपते होंठ मेरे होंठों पर रख दिये और अपनी जीभ को मेरे मुँह में डालने के लिये जोर लगाने लगा। मैं पहले-पहले तो अपने ऊपर हुए इस हमले से घबरा गयी। “ममममम” आवाज के साथ मैंने उसे ठेलने की कोशिश की मगर एक तो मैं थोड़े सुरूर में थी और वहाँ का माहौल ही कुछ ऐसा था कि मेरा एतराज़ कमज़ोर और लम्हाती ही रहा। कुछ ही देर में मैंने अपने होंठों के बीच उसकी जीभ को दाखिल होने के लिये जगह दे दी। उसकी जीभ मेरे मुँह के एक-एक कोने में घूमने लगी। मेरी जीभ के साथ वो जैसे बैले डाँस कर रहा था।

 

 

 

ये देख कर साशा भी ताहिर अज़ीज़ खान जी के पास सरक गयी और उनसे लिपट कर उन्हें चूमने लगी। मैंने उनकी ओर देखा तो साशा ने अपने अंगूठे को हिला कर मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया। हैमिल्टन के हाथों ने मेरे चूतड़ों को कस कर जकड़ रखा था। उसने मेरे नितंबों को कस कर अपने लंड पर दाब रखा था। उसके खड़े लंड का एहसास मुझे मिल रहा था।

 

 

 

“डज़ ही फ़क यू रेग्यूलरली?” हैमिल्टन ने मुझ से पूछा।

 

 

 

“शशऽऽ! ही इज़ नॉट ओनली मॉय एंपलायर.... ही इज़ मॉय फ़ादर इन-ला ठू… सो यू सी देयर इज़ अ डिस्टैंस टू बी मैनटेंड बिटवीन अस।”

 

 

 

“ओह फ़क ऑफ!” वो बोला, “इट्स शियर बुलशिट!”

 

 

 

“बिलीव मी.. इन इंडिया इनसेस्ट रिलेशनशिप आर इल-लिगल... दे आर बैंड बाय द सोसायटी!”

 

 

 

“इट इज़ नॉट इंडिया बेबी... यू आर इन पैरिस..... कैपिटल ऑफ फ्राँस। हेयर एवरी थिंग इज़ लिगल”, उसने मेरे एक मम्मे को मसलते हुए कहा, “हैव यू नेवर बीन टू एनी न्यूड बीचेज़ ऑफ़ फ्राँस। देयर यू विल फाईंड द होल फैमिली एंजॉयिंग फुल न्यूडिटी। गो ऑन.... इंजॉय बेबी… फ़क हिज़ ब्रेंस ऑऊट!” मैं खिलखिला कर वहाँ से हट गयी। कुछ देर बाद हम वापस कपड़े बदल कर सैमिनार में पहुँच गये। फिर शुरू हुई कुछ घंटों की बकबक। मैं अपने ससुर जी से सट कर बैठी थी। उनके जिस्म से उठ रही कोलोन की खुशबू मुझे मदहोश कर दे रही थी और शराब का हल्का-फुल्का सुरूर भी बरकरार था। पहले तो उन्होंने कुछ नोटिस नहीं किया लेकिन बाद में जब उनको मेरे दिल का हाल पता चला तो वो मेरे नितंबों और मेरी जाँघों को सहलाने लगे। मैंने पहले एक दो बार उनको रोकने की नाकाम कोशिश की लेकिन उनके नहीं मानने पर मैंने कोशिश छोड़ दी।

 

 

 

शाम को ड्रेस कोड के हिसाब से कमरे में आकर मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिये और फिर बिना किसी अंडर गार्मेंट्स के एक माइक्रो स्कर्ट और टाईट टॉप पहन ली। फिर बहुत ही पतली और ऊँची हील के स्ट्रैपी सैंडल पहन कर मैंने आईने में अपने को देखा। मेरे निप्पल टॉप के ऊपर से उभरे हुए दिख रहे थे। मैंने पहले घूम कर और फिर झुक कर अपने को देखा और फिर आईने के पास जा कर अपने को अच्छे से निहारा। मेरे सुडौल जिस्म का एक-एक कटाव, एक-एक उभार साफ़ दिख रहा था। मैं पीछे घूम कर आईने के आगे झुकी तो मैंने देखा कि झुकने के कारण स्कर्ट उठ जाती थी और मेरी बगैर पैंटी की नंगी चूत और गाँड साफ़ दिख रही थी। मैंने ड्रेस को खींच कर नीचे करने की कोशिश की लेकिन वो बिल्कुल भी नीचे नहीं सरकी। मैं उसी ड्रेस में बाहर आयी और ताहिर अज़ीज़ खान जी के कमरे में घुस गयी। मेरे ससुर जी उस वक्त तैयार हो रहे थे। उन्होंने दोबारा शेविंग की थी और एक टी-शर्ट और जींस में इतने हंडसम लग रहे थे कि क्या बयान करूँ।

 

 

 

“हाय हैंडसम! आज लगता है साशा की शामत आयी है। बहुत चिपक रही थी आपसे!” मैंने उन्हें छेड़ते हुए कहा।

 

 

 

“साशा? अरे जिसकी बगल में तुम जैसी हसीना हो तो उसे सौ साशा भी नहीं बहला सकती”, कह कर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मुझे ऊपर से नीचे तक कुछ देर तक निहारते ही रह गये। उनके होंठों से एक सीटी जैसी आवाज निकली, जैसी आवाज आवारा टाईप के मजनू निकाला करते हैं।

 

 

 

“मममम.. आज तो पैरिस जलकर राख हो जायेगा!” उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी तारीफ़ की।

 

 

 

“आप भी बस मेरी खिंचायी करते रहते हो!” मैं शरम से लाल हो गयी थी। उन्होंने अपने हाथ सामने की ओर फैला दिये तो मैं मुस्कुराते हुए उनके पास आ खड़ी हुई।

 

 

 

हम दोनों एक साथ हाल में एंटर हुये। वहाँ एक तरफ़ डाँस के लिये जगह छोड़ी हुई थी। बाकी जगह में टेबल कुर्सियाँ बिछी थीं। मैं सकुचाती हुई अपने ससुर जी की बाँहों में समाये हुए कमरे में घुसी। वहाँ का माहौल बहुत ही इरोटिक था। मद्धम रोशनी में चारों तरफ़ जोड़े बैठे हुए थे। सब अपने पार्टनर्स के साथ थे। सारे जोड़े सैक्स हरकतों में बिज़ी हो रहे थे। कोई किसिंग में बिज़ी था तो कोई अपने पार्टनर को सहला रहा था। किसी के हाथ पार्टनर्स के कपड़ों के नीचे घूम रहे थे तो कुछ अपने पार्टनर्स को नंगा भी कर चुके थे।

 

 

 

हम टेबल ढूँढते हुए आगे बढ़े तो एक टेबल से हैमिल्टन ने हाथ हिला कर हमें बुलाया। हम वहाँ पहुँचे। साशा हैमिल्टन की गोद में बैठी हुई थी। हैमिल्टन का एक हाथ उसके टॉप के नीचे घुसा हुआ उसकी छातियों को सहला रहा था। साशा के मम्मों के उभार बता रहे थे कि उन पर हैमिल्टन के हाथ फिर रहे थे। हमें देखते ही साशा हैमिल्टन की गोद से उठ गयी। हैमिल्टन ने मुझे अपनी गोद में खींच लिया और साशा ससुर जी की गोद में जा बैठी। हैमिल्टन ने मेरे बूब्स पर टॉप के ऊपर से हाथ फ़िराया।

 

 

 

“आई अगेन टेल यू स्वीटहार्ट… यू आर ठू सैक्सी टू ड्राईव ऐनीवन क्रेज़ी”, उसने कहा और मेरे हाथ में कॉकटेल का ग्लास पकड़ा कर टॉप के बाहर से मेरे मम्मों को मसलने लगा। मैंने ताहिर अज़ीज़ खान जी की तरफ़ देखा। वो मुझे हैमिल्टन से बूब्स मसलवाते हुए बड़ी गहरी नजरों से देख रहे थे। मैंने शरमा कर दूसरी ओर नजरें फ़ेर लीं। मैं अपना ड्रिंक पीते हुए बीच में बने डायस पर थिरक रहे जोड़ों को देखने लगी।

 

 

 

हम थोड़ी देर ऐसे ही बैठे अपने ड्रिंक सिप करते रहे। मेरा दूसरा ड्रिंक ख़त्म हुआ तो हैमिल्टन ने मुझे खींच कर उठाते हुए कहा, “कम ऑन स्वीटहार्ट! लेट्स डाँस!” मैंने ताहिर अज़ीज़ खान जी की तरफ़ एक नज़र देखा। उन्होंने सिर हिला कर अपनी रज़ामंदी दे दी। हम बीच सर्कल में डाँस करने लगे। डाँस फ़्लोर पर बहुत ही कम रोशनी थी। इसलिये डाँस तो कम चल रहा था और एक दूसरे को मसलना ज्यादा चल रहा था। कुछ पार्टनर्स बिल्कुल नंगे होकर डाँस कर रहे थे। सब शराब के नशे में चूर थे। मुझ पर भी दो ड्रिंक्स पीने के बाद खुमारी सवार थी।

 

 

 

हैमिल्टन भी मुझे अपने सीने में दबा कर मेरे टॉप के अंदर हाथ डाल कर मेरे बूब्स को जोर से मसलने लगा। फिर मेरे टॉप को ऊँचा करके मेरे बूब्स को नंगा कर दिया और अपने मुँह में मेरा एक निप्पल भर कर चूसने लगा। मैंने अपने आसपास नजरें दौड़ायीं। औरों की हालत तो मेरे से भी बुरी थी। ज्यादातर लड़कियाँ या तो टॉपलेस हो चुकी थीं या पूरी तरह ही नंगी हो गयी थीं। हमारे पास एक जोड़ा तो म्यूज़िक पर ही खड़े खड़े कमर हिला-हिला कर चुदाई में लीन था।

 

 

 

हैमिल्टन का दूसरा हाथ मेरी स्कर्ट के अंदर घुस कर मेरी टाँगों के जोड़ पर फिर रहा था। मैं अपनी बिना बालों वाली चिकनी चूत पर उसके हाथों का दबाव महसूस कर रही थी। मैंने अपनी टेबल की तरफ़ अपनी नजरें दौड़ायीं तो पाया कि साशा घुटनों के बल जमीन पर बैठ कर ताहिर अज़ीज़ खान जी का लंड अपने मुँह में भर कर चूस रही है। मैं भी अपने हाथ हैमिल्टन के लंड पर रख कर उसकी जींस के ऊपर से ही उसके लंड को सहलाने लगी। हैमिल्टन ने खुश हो कर अपनी जींस की ज़िप नीचे कर दी। मैंने अपना हाथ उसकी पैंट के अंदर डाल कर उसके लंड को पकड़ कर बाहर निकाला। मैं उसके लंड को अपने हाथों से सहलाने लगी। मेरी नजरें बराबर अपने ससुर जी पर टिकी हुई थी।

 

 

 

“लेट दैम इंजॉय एंड लेट अस डू द सेम”, हैमिल्टन ने मेरी नजरों को भाँपते हुए कहा। “कम-ऑन लेट्स गो टू सम केबिन फ़ोर अ क्विकी!”

 

 

 

मैं उसका इरादा समझ नहीं पायी और उसकी ओर देखा तो उसने बात क्लियर की, “देयर आर सम केबिन्स मेड फ़ोर कपल्स हू आर शाय टू फ़क इन द पब्लिक। कम ऑन लेट्स गो देयर फ़ोर अ फ़क!”

 

 

 

“नो.... नो! आय वोंट डू दैट”, मैंने एतराज करते हुए कहा, “मॉय फादर-इन-ला मे टेक इट अदरवाईज़!”

 

 

 

“हा! यू इंडियंस आर सो शाय! आय लव इंडियंस। लुक सैक्सी.... योर फ़ादर-इन-ला इज़ बिज़ी फ़किंग मॉय साशा!” उसने हमारी टेबल की तरफ़ इशारा किया। मैंने देखा साशा ताहिर अज़ीज़ खान जी की गोद में सिर्फ सैंडल पहने बिकुल नंगी बैठी थी। उसका चेहरा सामने की ओर था और वो टेबल पर अपने दोनों हाथों का सहारा लेकर अपनी कमर को उनके लंड पर ऊपर नीचे कर रही थी। ससुर जी के दोनों हाथ साशा के मम्मों को मसलने में मसरूफ थे।

 

 

 

हैमिल्टन मुझे खींचता हुआ दीवार के पास बने कुछ केबिनों में से एक में ले गया। मैं झिझक रही थी उसको इतना लिफ्ट देते हुए लेकिन उसने जबरदस्ती मुझे केबिन के अंदर खींच ही लिया। मुझे वहाँ रखी टेबल के पास खड़ी करके उसने मेरे हाथ टेबल पर टिका दिये। मेरे जिस्म से मेरे टॉप को नोच कर फ़ेंक दिया और मेरे बूब्स को पीछे की तरफ़ से पकड़ कर मुझे टेबल के ऊपर झुका दिया और मेरे स्कर्ट को खींच कर उतार दिया। मेरे कपड़े उसने उतार कर एक तरफ़ फ़ेंक दिये। अब मैं सिर्फ हाई-हील के सैंडल पहने बिल्कुल नंगी खड़ी थी। फिर वो भी जल्दी-जल्दी अपने सारे कपड़े उतार कर बिल्कुल नंगा हो गया। लाईट ऑन करके हमने एक दूसरे के नंगे जिस्म को निहारा। उसका लंड हल्का गुलाबी रंग का था जो कि उसके एक दम गोरे रंग से मेल खा रहा था। उसने दोबारा मुझे टेबल पर झुका दिया और पीछे से अपना लंड मेरी चूत पर लगा दिया। फिर मेरे बूब्स को जोर से पकड़ कर एक जोर का धक्का मारा और मेरे मुँह से “आआआऽऽहहहऽऽऽ” की आवाज के साथ उसका लंड मेरी चूत में घुस गया। उसका लंड कोई गैर मामूली बड़ा नहीं था। इसलिये उसे अपनी चूत में लेने में किसी तरह की कोई खास दिक्कत नहीं आयी।

 

 

 

वो पीछे से मुझे जोर-जोर से धक्के मारने लगा। कुछ देर तक इसी तरह मुझे चोदने के बाद वो सोफ़े पर बैठ गया और अपने लंड पर मुझ बिठा लिया और मेरी दोनों बगलों में अपने हाथ डाल कर मेरे हल्के जिस्म को अपने हाथों से अपने लंड पर ऊपर नीचे करने लगा। कुछ देर बाद मुझे खड़ा करके खुद भी खड़ा हो गया। फिर मेरी बाँहों को अपनी गर्दन के चारों ओर डाल कर मुझे जमीन से ऊपर उठा लिया। उसका लंड मेरी चूत में घुस गया। मैं खुद को गिरने से बचाने के लिये उसकी कमर के चारों ओर अपने पैरों का घेरा डाल दिया। इस तरह से अपने लंड पर मुझे बिठा कर वो अपने लंड को मेरी चूत में आगे पीछे करने लगा। मुझे अपने लंड पर बिठाये हुए इसी हालत में वो मुझे लेकर सोफ़े तक पहुँचा। फिर सोफ़े पर खुद लेट कर मुझे अपने लंड पर वापस बिठा लिया। मैं उसके लंड पर कूदने लगी। उसकी ठुकायी से साफ़ लग रहा था कि ये जर्मन चुदाई के मामले में तो अच्छे अच्छों को ट्रेनिंग दे सकता है। मुझे करीब-करीब एक घंटे तक उसने अलग अलग पोज़ में चोदा। मेरे मुँह में, मेरी गाँड में, मेरी चूत में, हर जगह उसने अपने लंड को रगड़ा। जब उसके लंड से फुहार छूटने को हुई तो उसने अपने लंड को मेरी चूत से निकाल कर मेरे मुँह में डाल दिया और ढेर सारा वीर्य मेरे मुँह में भर दिया। मैं उसके छूटने तक तीन बार झड़ चुकी थी। फिर मैं उसके वीर्य को छोटे-छोटे घूँटों में पी गयी।

 

 

 

फिर मैं लहरा कर नीचे जमीन पर गिर गयी और वहीं पड़े-पड़े लंबी-लंबी सांसें लेने लगी। हैमिल्टन के लंड से अभी भी हल्की हल्की वीर्य की पिचकारी निकल रही थी, जिसे वो मेरे मम्मों पर गिरा रहा था। मम्मों पर छलके हुए वीर्य को उसने मेरे टॉप से साफ़ किया। टॉप से उसने अपने वीर्य को कुछ इस तरह पोंछा कि जब मैंने दोबारा टॉप पहनी तो मेरे दोनों निप्पल के ऊपर दो बड़े-बड़े गीले धब्बे थे। टॉप मेरे दोनों निप्पल पर चिपक गयी थी और निप्पल बाहर से दिखने लगे थे।

 

 

 

कुछ देर बाद हम वहीं रेस्ट करके अपने कपड़े पहन कर बाहर आ गये। बाहर अपनी टेबल पर आकर देखा कि टेबल खाली थी। मैंने बैठते हुए इधर उधर नज़र दौड़ायी लेकिन साशा और ससुर जी कहीं नहीं दिखे। हैमिल्टन ने अपनी कुर्सी पर बैठ कर मुझे अपनी गोद में खींच लिया। मैंने उसकी गोद में बैठ कर उसके गले में अपनी बाँहों का हार डाल दिया और हम दोनों एक दूसरे को चूमने लगे। आस पास सारे जोड़े सैक्स में ही लीन दिखे। किसी को किसी की फ़िक्र नहीं थी। कुछ तो वहीं पूरे नंगे हो कर चुदाई में लगे हुए थे। वेस्टर्न कल्चर में तो ये एक मामुली सी बात थी। तभी वेटर डिनर और वाईन सर्व कर गया। हैमिल्टन की गोद में बैठे-बैठे हमने डिनर लिया। हम एक दूसरे को खिलाते रहे। हैमिल्टन का लंड वापस मेरे नितंबों के नीचे खड़ा हो रहा था। उसने मुझे उठाया और मेरी चूत पर लंड को सेट करके वापस अपनी गोद में बिठा लिया। इस बार हम दोनों ने किसी तरह की उछल कूद नहीं की। मैं उसके लंड को अपनी चूत में लेकर डिनर करने में व्यस्त हो गयी। वो भी डिनर ले रहा था।

 

 

 

थोड़ी देर बाद ताहिर अज़ीज़ खान जी साशा को बाँहों में लिये इधर आते हुए दिखे। मैं झट से हैमिल्टन कि गोद से उतर कर अपनी सीट पर बैठ गयी और वाईन सिप करने लगी। आखिर हम इंडियंस कितने भी एडवांस्ड हो जायें, कुछ तो शरम बची ही रहती है। हैमिल्टन ने अपने लंड को अंदर करने की कोई कोशिश नहीं की।

 

 

 

साशा और ससुर जी आकर अपनी अपनी सीट पर बैठ गये। हम दोनों एक दूसरे से नजरें नहीं मिला पा रहे थे। हैमिल्टन और साशा चुहल बाजी करते रहे। हैमिल्टन ने खींच कर साशा को अपने लंड पर बिठा लिया। साशा ने भी एक झटके से अपनी टॉप उतार दी और हैमिल्टन के लंड की सवारी करने लगी।

 

 

 

लेकिन हम दोनों चुपचाप अपने अपने ख्यालों में खोये खाना खाते रहे और बीच-बीच में चोर निगाहों से अपने सामने चल रही ब्लू फ़िल्म का भी मज़ा लेते रहे। सामने उन दोनों की चुदाई देखते हुए अक्सर हम दोनों की निगाहें टकरा जाती तो मैं शरमा कर और ससुर जी मुस्कुरा कर अपनी निगाहें हटा लेते।

 

 

 

खाना खाकर हम दोनों ने उन दोनों से विदा ली। मैं अपने ससुर जी की बाँहों में अपनी बांहें डाल कर अपने रूम की तरफ़ बढ़ी। मुझे काफी सुरूर महसूस हो रहा था क्योंकि दोपहर से धीरे-धीरे करके कम से कम चार-पाँच कॉकटेल और तीन वाईन के ग्लास पी चुकी थी। ऊपर से महफिल का माहौल भी इतना उत्तेजक था।

 

 

 

“मैं साशा के साथ किसी नये प्रॉजेक्ट के बारे में डिसकस करने पास के एक केबिन में गया था। तुमको बता नहीं पाया क्योंकि तुम कहीं मिली नहीं। पता नहीं भीड़ में तुम कहाँ हैमिल्टन के साथ डाँस कर रही थीं।”

 

 

 

उनके मुँह से ये बात सुनकर मुझे बहुत राहत मिली कि उनको नहीं पता चल पाया कि उसी दौरान मैं भी पास के ही किसी केबिन में हैमिल्टन के साथ चुदाई में लीन थी। हम दोनों के अलग-अलग रूम थे। मैंने अपने कमरे के सामने पहुँच कर उन्हें गुड नाईट कहा और कमरे की तरफ़ बढ़ने लगी।

 

 

 

“कहाँ जा रही हो। आज मेरे कमरे में ही सो जाओ ना”, ससुर जी ने कहा। उनका इरादा साफ़ था। आज बर्फ़ पिघल रही थी लेकिन मुझे भी अपना डेस्प्रेशन नहीं दिखाना था। इसलिये मैंने उनकी तरफ़ देख कर अपनी नजरें झुका लीं और कदम अपने कमरे की तरफ़ बढ़ाये।

 

 

 

“अच्छा ठीक है तुम अपने कमरे में चलो। मैं अभी आता हूँ..... कपड़े चेंज मत करना!” उन्होंने मुझसे कहा।

 

 

 

“क्यों क्या हुआ?” मैंने पूछा।

 

 

 

“नहीं कुछ नहीं! तुम इन कपड़ों में बहुत खूबसूरत लग रही हो.... तुम्हें इन कपड़ों में कुछ देर तक देखना चाहता हूँ!”

 

 

 

“क्यों इतनी देर देख कर भी मन नहीं भरा क्या?” मैंने उनकी तरफ़ मुस्कुरा कर देखा। “अब्बू जान... अपने मन को कंट्रोल में रखिये। अब मैं आपके बेटे की बीवी हूँ”, कहते हुए मैं हंसती हुई कमरे में चली गयी। अंदर आकर मैंने अपने टॉप और स्कर्ट को उतार दिया और बाथरूम में जा कर चेहरा धोया। जिस्म पर सिर्फ तौलिया लपेटे बाथरूम से बाहर आकर मैंने ड्रैसिंग टेबल के सामने खड़े होकर अपने टॉवल को हटा दिया। मेरा नंगा जिस्म रोशनी में चमक उठा। मैं सिर्फ हाई-हील के सैंडल पहने हुए खड़ी हुई अपने नंगे जिस्म को निहार रही थी। निकाह के बाद कितने लोगों से मैं चुदाई कर चुकी थी। इस जिस्म में कुछ ऐसी ही कशिश थी कि हर कोई खिंचा चला आता था। मैंने उसी हालत में खड़े होकर डियोड्रेंट लगाया और हल्का मेक-अप किया। अपने बालों में कंघी कर ही रही थी कि डोर बेल बजी।

 

 

 

“कौन है?”

 

 

 

“मैं हूँ... दरवाजा खोलो”, बाहर से ससुर जी की आवाज आयी।

 

 

 

मैंने झट अपने शाम को पहने हुए कपड़ों को वापस पहना और दरवाजे को खोल दिया। उन्होंने मुझसे अलग होने से पहले उन्हीं कपड़ों में रहने को कहा था। अब दोनों निप्पल के ऊपर टॉप पर लगा धब्बा सूख गया था लेकिन धब्बा साफ़ दिख रहा था कि वहाँ कुछ लगाया गया था। ताहिर अज़ीज़ खान जी अंदर आये। उन्होंने शायद अपने कमरे में जाकर भी एक दो पेग लगाये थे। उनके चाल में हल्की लड़खड़ाहट थी। कमरे में आकर वो बिस्तर पर बैठ गये।

 

 

 

“आओ मेरे पास”, उन्होंने मुझे बुलाया। मैं धीरे-धीरे हाई-हील सैंडलों में मटकते हुए चल के उनके पास पहुँची। उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाल कर एक खूबसूरत सा लॉकेट निकाल कर मुझे पहना दिया।

 

 

 

“वॉव! कितना खूबसूरत है!” मैंने खुश होकर कहा “किसके लिये है ये?”

 

 

 

“तुम्हें पसंद है?” मैंने हामी में सिर हिलाया। “ये इस खूबसूरत गले के लिये ही है!” कहकर उन्होंने मेरे गले को चूम लिया।

 

 

 

“उम्म बहुत सुंदर है ये!” मैंने लॉकेट को अपने हाथों से उठाकर निहारते हुए कहा।

 

 

 

“मुझे भी तो पता चले कि तुम कितनी खुश हो। खुश हो भी या…” मैं झट से उनकी गोद में बैठ गयी और उनके गले में अपनी बाँहों का हार डाल कर उनके होंठों पर अपने होंठ सटा दिये। मैंने उनको एक डीप किस दिया। जब हम दोनों अलग हुए तो उन्होंने मुझे उठाया।

 

 

 

“स्टीरियो पर कोई सैक्सी गाना लगाओ”, उन्होंने कहा तो मैंने स्टीरियो ऑन कर दिया। वोल्युम को तेज़ रखने के लिये कहने पर मैंने वोल्युम को काफी तेज़ कर दिया।

 

 

 

“अब तुम नाचो!” उन्होंने कहा। मैं चुपचाप खड़ी रही। मैं असमंजस में थी। समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिये।

 

 

 

“तुम बहुत अच्छा नाचती हो! मैंने कईं बार देखा है तुम्हें नाचते हुए।”

 

 

 

“लेकिन यहाँ?”

 

 

 

“क्यों यहाँ क्या प्रॉब्लम है? मैं देखना चाहता हूँ तुम्हारे जिस्म की थिरकन।”

 

 

 

मैं धीरे-धीरे वेस्टर्न म्युज़िक पर थिरकने लगी। अंदरूनी कपड़े नहीं होने के कारण मेरे मम्मे उछल रहे थे और मेरा ध्यान डाँस पर कम और अपनी उस मिनी स्कर्ट पर था कि नाचते हुए मेरी चूत उनकी नजरों के सामने ना जाये।

 

 

 

“अपने उन दोनों मम्मों को जोर से हिलाओ। खूब शानदार हैं ये दोनों बूब्स तुम्हारे!” मैं उनकी पसंद का खयाल रखते हुए अपने मम्मों को हिलाने लगी।

 

 

 

“अब नाचते-नाचते अपने कपड़े उतार दो! अपने सैक्सी सैंडल छोड़कर बाकी सारे कपड़े उतार देना। स्ट्रिपटीज़ जानती हो?” उन्होंने मुझसे पूछा।

 

 

 

“हाँ!” मैं उनकी बातों से हैरान हो रही थी। उन पर कुछ तो शराब का और कुछ खुले आज़ाद माहौल का नशा चढ़ा हुआ था।

 

 

 

“चलो मेरे सामने स्ट्रिपटीज़ करो”, कहते हुए उन्होंने अपने गाऊन को खोल कर अलग कर दिया। गाऊन के नीचे वो बिल्कुल नंगे थे। मैं नाचना छोड़ कर मुँह फ़ाड़े उनके लंड को देख रही थी।

 

 

 

“अब्बू जान.. ये सब ठीक नहीं है!” मैंने उनसे कहा।

 

 

 

“क्या ठीक नहीं है?”

 

 

 

“यही जो आप कर रहे हैं या करना चाहते हैं।”

 

 

 

“क्यों.. इसमें क्या बुराई है। तुम ही तो निकाह के पहले से ही मुझ से चुदवाना चाहती थी!” उनके मुँह से इस तरह की गंदी बातें सुन कर मैं शरम से गड़ गयी।

 

 

 

“जी…जी वो.. उस समय की बात और थी! तब मैं आपकी सेक्रेटरी थी।”

 

 

 

“तो?”

 

 

 

“आज मैं आपके बेटे की बीवी हूँ।“

 

 

 

“लेकिन पहले तू मेरी सेक्रेटरी है। यहाँ पर तू मेरी सेक्रेटरी बन कर आयी है… मेरे बेटे की बहू नहीं! और सेक्रेटरी का काम होता है अपने एंपलायर को खुश रखना। देखा नहीं यहाँ मौजूद दूसरी सेक्रेटरियों को!”

 

 

 

“क्या हो गया है आज आपको?” मैंने थूक निगलते हुए कहा।

 

 

 

“मोहब्बत! तुझे आज जी भर कर मोहब्बत करना चाहता हूँ।” आज ससुर जी के मुँह से इस तरह की बातें सुनकर अजीब सा लग रहा था। ताहिर अज़ीज़ खान जी हमेशा से ही एक सोबर और मर्यादित आदमी रहे हैं। मैंने जब निकाह से पहले इतनी कोशिश की थी उन्हें सिड्यूस करने की, तब भी नहीं हिले थे अपने असूलों से। अगर वो चाहते तो मेरी सील तोड़ने का क्रेडिट मैं उन्हीं को देती। मैं तो चाहती ही थी उनकी मिस्ट्रेस बनना। मगर उनके ऊँचे ख्यालातों ने मेरी एक नहीं चलने दी थी। लेकिन वो ऊँचे असूलों का पुतला आज कैसे सैक्स के दलदल में गोते खा रहा है। थोड़ी बहुत चुहल बाजी, थोड़ा लिपटना, थोड़ा मसलना ये सब तो मैं भी पसंद करती थी क्योंकि उन्हें मैं हमेशा ही मन से चाहती थी। मगर उनके साथ सैक्स? मैं असमंजस में फ़ँस गयी थी। शराब का नशा तो मुझे भी था पर इतना भी नहीं था। समझ में नहीं आ रहा था कि आज वो कैसे अपना अहौदा, अपनी मर्यादा, हम दोनों के बीच का रिश्ता, सब भूल कर इस तरह की बातें कर रहे हैं।

 

 

 

“अब्बू आपने आज बहुत पी रखी है! आप आज अपने कंट्रोल में नहीं हो! आप यहीं रेस्ट करो.... मैं दूसरे कमरे में जाती हूँ।” मैंने दरवाजे की तरफ़ अपने कदम बढ़ाये ही थे कि उनकी कड़कती आवाज से मेरे कदम वहीं रुक गये। “खबरदार… अगर एक भी कदम आगे बढ़ाया तो! जैसा कहता हूँ वैसा कर.... नहीं तो आज मैं तेरा रेप करने से भी नहीं चूकुँगा।”

 

 

 

“अब्बू क्या हो गया आज आपको! हम दोनों का रिश्ता बदनाम हो जायेगा। अगर किसी को पता चल गया तो लोग क्या कहेंगे।”

 

 

 

“तू उसकी चिंता मत कर! किसी को पता ही नहीं चलेगा। यहाँ अपने वतन से दूर हमें जानने वाला है ही कौन। और तू रिश्तों की दुहाई मत दे। एक आदमी और एक औरत में बस एक ही रिश्ता हो सकता है और वो है हवस का रिश्ता। जब तक यहाँ रहेंगे..... हम दोनों साथ रहेंगे। अपने घर जा कर तू भले ही वापस मुझसे पर्दा कर लेना।”

 

 

 

“ऐसा कैसे हो सकता है? हम दोनों के बीच एक बार जिस्म का रिश्ता हो जाने के बाद आप क्या सोचते हैं कि कभी वापस नॉर्मल हो सकेगा?”

 

 

 

“तू जब तक यहाँ है, भूल जा कि तो मेरे बेटे की बीवी है। भूल जा कि मैं तेरा ससुर हूँ। तू बस मेरी सेक्रेटरी है। अगर तेरा निकाह मेरे बेटे से नहीं हुआ होता तो हम यहाँ क्या करते?”

 

 

 

“फिर तो बात दूसरी ही होती!” मैंने कहा।

 

 

 

“तू समझ कि अब भी वही बात है। तू केवल मेरी सेक्रेटरी है। देखा नहीं.... सारी सेक्रेटरिज़ अपने बॉस के साथ कैसे खुल्लम खुल्ला सैक्स कर रही थीं।”

 

 

 

लेकिन मैं अभी भी झिझक नहीं छोड़ पा रही थी। ताहिर अज़ीज़ खान जी उठे और कमरे में बने मिनी बार से व्हिस्की की एक बोतल लेकर उन्होंने एक ग्लास में डाली और मेरे होंठों से लगा दी। “ये ले... तेरी झिझक इससे कम होगी और नशे में तुझे मज़ा भी ज्यादा आयेगा।” मेरी धड़कनें तेज़ चल रही थीं और इस हालात में मुझे इसकी सख्त जरूरत थी। मैंने दो घूँट में ही वो तगड़ा पैग खाली कर दिया। वो कमरे में कुर्सी-टेबल खिसका कर जगह बनाने लगे। इतने में मैंने वो बोतल ही उठा ली और दो-तीन घूँट व्हिस्की के सिप किये। मैं चाहती थी कि मुझे इतना नशा हो जाये कि मैं खुलकर बिना किसी झिझक के उनका साथ दे सकूँ। ससुर जी ने फिर मुझे खींच कर बीच में खड़ा कर दिया। अंदर कुछ नहीं पहना होने के कारण मेरे बूब्स बुरी तरह इधर-उधर हिल रहे थे। फिर वो मेरे हाथों को अपने हाथ में थाम कर थिरकने लगे। मैं भी एक हाथ में बोतल पकड़े धीरे-धीरे उनका साथ देती हुई डाँस करने लगी।

 

 

 

कुछ ही देर में मुझ पर नशा हावी होने लगा और मैं मूड में आ गयी और पूरे जोश के साथ मैं म्युज़िक पर थिरकने लगी। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने एक झटके में अपने जिस्म पर पहने गाऊन को अलग किया। वो अंदर कुछ भी नहीं पहने हुए थे। वो पूरी तरह नंगे हो गये थे। अपने गाऊन को वहीं छोड़ कर वो वापस जाकर बेड पर बैठ गये। अब मैंने भी झिझक छोड़ कर खुद को समय के हवाले कर दिया और कमरे के बीच में थिरकने लगी।

 

 

 

“मेरी ओर झुक कर अपनी छातियों को हिलाओ”, ताहिर अज़ीज़ खान जी ने कहा। मैंने वैसा ही किया। उन्होंने अब मुझे टॉप उतारने के लिये इशारा किया। उनके सामने नंगी होने का ये पहला मौका था। मैं झिझकते हुए अपने हाथों से अपनी टॉप को पकड़ कर ऊँचा करने लगी। जैसे-जैसे टॉप ऊँचा होता जा रहा था, मेरे बेशकीमती खजाने के दोनों रत्न बाहर निकलते जा रहे थे। मैंने अपनी टॉप को निकाल कर अपने हाथों से पकड़ कर एक बार सिर के ऊपर हवा में घुमाया और फिर उसे ताहिर अज़ीज़ खान जी की तरफ़ फ़ेंक दिया। टॉप सीधा जा कर उनकी गोद में गिरा। ताहिर अज़ीज़ खान जी उसे उठा कर कुछ देर तक सूँघते और चूमते रहे। मैं टॉपलेस हालत में थिरक रही थी और बीच-बीच में बोतल से व्हिस्की सिप कर रही थी। थोड़ी-थोड़ी देर में अपने बूब्स को एक झटका देती तो दोनों बूब्स उछल उठते। मैं डाँस करते-करते ताहिर अज़ीज़ खान जी के पास पहुँची और उनके होंठों के सामने अपने दोनों बूब्स को थिरकाने लगी। मैंने अपने एक मम्मे को अपने हाथों से थाम कर ऊँचा किया। फिर निप्पल को अपनी अँगुलियों से खींच कर उनके होंठों के पास ले गयी। जैसे ही ताहिर अज़ीज़ खान जी ने अपने होंठ खोल कर मेरे बूब्स पर झपटा मारा तो मैं किसी मछली की तरह उनकी पकड़ से निकल गयी। इतने दिनों की आस आज पूरी हो रही थी। ताहिर अज़ीज़ खान जी को तरसाने में खूब मज़ा आ रहा था।

 

 ताहिर अज़ीज़ खान जी का लंड उनकी घनी झाँटों के बीच खड़ा हुआ झटके खा रहा था। मैंने उसे एक बार अपनी मुठ्ठी में लेकर उसे ऊपर से नीचे तक सहलाया और फिर छोड़ दिया। मेरी इस हरकत से उनके लंड के ऊपर एक बूँद प्री-कम चमकने लगा। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने अपने सूखते हुए होंठों पर अपनी जीभ फ़िरा कर मुझे स्कर्ट उतारने के लिये इशारा किया। मैंने स्कर्ट के इलास्टिक में अपनी अँगुलियाँ डाल कर उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें मेरी स्कर्ट से चिपकी हुई थीं। वो उतावले हुए जा रहे थे। मैंने उन्हें कुछ और परेशान करने का सोचा। मैंने अपनी स्कर्ट थोड़ी सी ही खिसकायी जिससे मेरी चूत अभी भी नंगी नहीं हुई थी। थिरकते हुए मैं फिर उन्हें चिढ़ाने के लिये उनके नज़दीक गयी और अपनी एक टाँग उठा कर अपना पैर उनकी गोद में रख दिया और उनके खड़े लंड को अपने सैंडल के तलुवे और ऐड़ियों से सहलाने लगी। उनके लंड का प्री-कम छलक कर मेरे पैरों के नाखुनों और सैंडल की पट्टियों पर गिर पड़ा। फिर मैं थिरकते हुए उनसे दूर हटी और मैंने उनकी तरफ़ अपनी पीठ कर ली और अपनी स्कर्ट को धीरे-धीरे नीचे कर दिया। वो मेरी मोटी-मोटी गाँड को ललचायी नजरों से देख रहे थे। मैं अब खड़े होकर अपने जिस्म को म्युज़िक पर थिरकाने लगी। कुछ देर बाद मैं धीरे-धीरे सामने की ओर मुड़ी। मेरी नंगी चूत अब उनके सामने थी। वो एक टक मेरी सिलकी चिकनी चूत को निहार रहे थे।

 

 

 

अब तो उन्हें अपने ऊपर कंट्रोल करना मुश्किल हो गया। वो उठे और मुझे बाँहों में लेकर मेरे साथ कमर हिलाने लगे। वो मेरे पीछे से सटे हुए थे। हमारे नंगे जिस्म एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे। मेरी चूत गीली हो गयी थी। उनका लंड मेरे दोनों नितंबों के बीच जगह तलाश कर रहा था। उनके हाथ मेरे जिस्म पर फ़िसल रहे थे। सामने आदमकद आईने में मैंने हम दोनों के अक्स को एक दूसरे से गुंथे हुए देखा तो उत्तेजना और बढ़ गयी। उन्होंने मुझे आईने में देखते हुए देखा तो मुस्कुरा कर मेरी दोनों बगलों में अपने हाथ डाल कर सामने मेरे मम्मों को सहलाने लगे। मैं अपने सुंदर मम्मों को ताहिर अज़ीज़ खान जी के हाथों से मसले जाते देख रही थी। मेरी पीठ उनके सीने से लगी हुई थी। मैंने अपना सिर पीछे की ओर कर के उनके कंधे पर रख दिया। साढ़े-चार इंच ऊँची हील के सैंडल पहने होने से मेरा कद उनके कद से मेल खा रहा था। उनके हाथ मेरे दोनों बूब्स को बुरी तरह मसल रहे थे। आईने में हमारा ये पोज़ बड़ा ही सैक्सी लग रहा था। उन्होंने मेरे दोनों निप्पल अपनी अँगुलियों से पकड़ कर आगे की तरफ खींचे। मेरे दोनों निप्पल खिंचाव के कारण लंबे-लंबे हो गये थे। उनके मसलने के कारण दोनों बूब्स की रंगत सफ़ेद से गुलाबी हो गयी थी। उनकी गरम साँसें मैं अपनी गर्दन पर इधर से उधर फिरते हुए महसूस कर रही थी। उनके होंठ मेरी गर्दन के पीछे, जहाँ से मेरे बाल शुरू हो रहे थे, वहाँ जा कर चिपक गये। फिर उन्होंने मेरी गर्दन पर हल्के से दाँत गड़ाये। उनके होंठ मेरी गर्दन पर घूमते हुए मेरे बाँय कान तक आये। वो मेरे बाँय कान के ऊपर अपने होंठ फिराने लगे। औरत का कान एक जबरदस्त उत्तेजक हिस्सा होता है। मैं उनकी हरकतों से उत्तेजित हो गयी। मैंने अपने हाथ में पकड़ी व्हिस्की की बोतल को टाँगों के बीच अपनी चूत पर सख्ती से दाब रखी थी। मेरे मुँह से उत्तेजना में टूटे हुए शब्द निकल रहे थे। मैंने अपने होंठों को दाँतों में दबा रखा था, फिर भी पता नहीं किस कोने से मेरे मुँह से “आआऽऽऽहहऽऽऽ ममऽऽऽऽ ऊऊऽऽऽहहऽऽऽ” की आवाजें निकल रही थीं। फिर उन्होंने कान पर अपनी जीभ फ़िराते हुए कान के निचले हिस्से को अपने मुँह में भर लिया और हल्के-हल्के से उसे दाँत से काटने लगे। मेरे हाथ से बोतल नीचे छूट गयी और मैंने उनके सिर को अपने हाथों से थाम लिया। हमारे जिस्म संगीत की धुन पर एक दूसरे से सटे हुए इस तरह से थिरक रहे थे कि मानो दो नहीं एक ही जिस्म हों। उन्होंने मुझे अपनी ओर घुमाया और मेरे बूब्स पर अपने होंठ रख कर मेरे निप्पल को चूसने लगे। इसी तरह की हरकतों की ख्वाहिश तो तब से मेरे मन में थी जब से मैंने उन्हें पहली बार देखा था। मुझे उनके साथ पैरिस आने का न्यौता कबूल करते समय ही पता था कि इस टूर में हम दोनों के बीच किस तरह का रिश्ता जन्म लेने वाला है। मैं उसके लिये शुरू से ही उतावली थी। मैं भी उनको अपनी ओर से पूरा मज़ा देना चाहती थी। मैं भी उनकी छातियों पर झुक कर उनके छोटे-छोटे निप्पलों को अपने दाँतों से कुरेदने लगी। मैंने अपनी जीभ से उनके निप्पलों को सहलाना शुरू किया तो उत्तेजना से उनके निप्पल भी खड़े हो गये। मैं उनके बालों से भरे सीने को सहला रही थी। मैंने अपने दाँतों को उनके सीने में गड़ा कर जगह-जगह अपने दाँतों के निशान छोड़ दिये। मैंने कुछ देर तक उनके निप्पल से खेलने के बाद अपने होंठ नीचे की ओर ले जाते हुए उनकी नाभी में अपनी जीभ घुसा दी और उनकी नाभी को अपनी जीभ से चाटने लगी। वो मेरे खुले बालों में अपनी अँगुलियाँ फ़िरा रहे थे। फिर मैं घुटनों के बल उनके सामने बैठ गयी और उनके लंड को अपने हाथों में लेकर निहारने लगी। मैंने मुस्कुरा कर उनकी ओर देखा। उनके खतना लंड का गोल-मटोल टोपा गुब्बारे की तरह फूला हुआ था। मैंने उसकी टिप पर अपने होंठ लगा दिये। एक छोटा सा किस लेकर अपने चेहरे के सामने उनके लंड को सहलाने लगी। उनके लंड को अपने मुँह में लेने की इच्छा तो हो रही थी लेकिन मैं उनके रिक्वेस्ट करने का इंतज़ार कर रही थी। मैं उनके सामने ये नहीं शो करना चाहती थी कि मैं पहले से ही कितना खेली खायी हुई हूँ।

 

 

 

“इसे मुँह में लेकर प्यार करो!”

 

 

 

“ऊँऽऽ नहीं ये गंदा है।”  मैंने लंड को अपने से दूर करने का नाटक किया, “छी! इससे तो पेशाब भी किया जाता है। इसे मुँह में कैसे लूँ?”

 

 

 

“तूने अभी तक जावेद के लंड को मुँह में नहीं लिया क्या?”

 

 

 

“नहीं वो ऐसी गंदी हर्कतें नहीं करते हैं।”

 

 

 

“ये गंदा नहीं होता है.... एक बार तो लेकर देख! ठीक उसी तरह जैसे चोकोबार आईसक्रीम को मुँह में लेकर चाटती हो।” असलियत में तो मैं उस लंड को मुँह में लेने के लिये इतनी बेकरार थी की अगर उसमें से तो पेशाब भी निकल रहा होता तो मैं उसे आब-ए-ज़मज़म समझ कर पी जाती पर फिर भी मैं जानबूझ कर झिझकते हुए अपनी जीभ निकाल कर उनके लंड के टोपे पर फिराने लगी। मेरे बाल खुले होने की वजह से उनको देखने में परेशानी हो रही थी। इसलिये उन्होंने मेरे बालों को पकड़ कर जूड़े के रूप में बाँध दिया। फिर मेरे चेहरे को पकड़ कर अपने लंड को मेरी ओर ठेलने लगे। मैंने उनकी हरकत के इख्तयार में अपना मुँह खोल दिया। उनका लंड आधा अंदर जा कर मेरे गले के दर में फंस गया।

 

 

 

“बसऽऽ और नहीं जायेगा!” मैंने कहना चाहा मगर मुँह से बस, “ऊँऽऽऽ ऊँऽऽऽ” जैसी आवाज निकली। इसलिये मैंने उनके लंड को अपने मुँह में लिये-लिये ही उन्हें इशारा किया। वो अपने लंड को अब आगे पीछे करने लगे। मैं उनके लंड को अपने मुँह से चोद रही थी और साथ-साथ उनके लंड पर अपनी जीभ भी फ़िरा रही थी।

 

 

 

“पूरा ले! मज़ा नहीं आ रहा है! पूरा अंदर जाये बिना मज़ा नहीं आयेगा।” उन्होंने अपने लंड को बाहर खींचा।

 

 

 

“इतना बड़ा लंड पूरा कैसे जायेगा? मेरा मुँह मेरी चूत जैसा तो है नहीं कि कितना भी लंबा और मोटा हो सब अंदर ले लेगा!” मैंने कहा।

 

 

 

उन्होंने मुझे उठाया और बिस्तर पर ले जाकर लिटा दिया। मैं पीठ के बल लेट गयी। अब उन्होंने मेरे जिस्म को कंधों से पकड़ कर बिस्तर से बाहर की तरफ़ खींचा। अब मेरा सिर बिस्तर से नीचे लटकने लगा था। “हाँ ये ठीक है.... अब अपने सिर को बिस्तर से नीचे लटकाते हुए अपने मुँह को खोल!” वो बोले। मैंने वैसा ही किया। इस पोज़िशन में मेरा मुँह और गले का छेद एक सीध में हो गये थे। ससुर जी अब मेरे मुँह में अपने लंड को डालते हुए मुझसे बोले, “एक जोर की साँस खींच अंदर!” मैंने वैसा ही किया। वो अपने लंड को अंदर ठेलते चले गये। उनका मोटा लंड सरसराता हुआ गले के अंदर घुसता चला गया। पहले तो उबकायी जैसी आयी। लेकिन उनका लंड फंसा होने के कारण कुछ नहीं हुआ। उनका लंड अब पूरा अंदर घुस चुका था। उनके लंड के नीचे लटकते दोनों गेंद अब मेरी नाक को दाब रहे थे। एक सेकेंड इस हालत में रख कर उन्होंने वापस अपने लंड को बाहर खींचा। उनके लंड ने जैसे ही गले को खाली किया, मैंने अपने फ़ेफ़ड़ों में जमी हवा खाली की और वापस साँस लेकर उनके अगले धक्के का इंतज़ार करने लगी। उन्होंने झुक कर मेरे दोनों मम्मों को अपनी मुठ्ठी में भर लिया और उन्हें मसलते हुए वापस अपने लंड को जड़ तक मेरे मुँह में ठेल दिया। फिर एक के बाद एक, धक्के मारने लगे। मैंने अपनी साँसें उनके धक्कों के साथ एडजस्ट कर ली थी। हर धक्के के साथ मेरे मम्मों को वो बुरी तरह मसलते जा रहे थे और साथ-साथ मेरे निप्पलों को भी उमेठ देते। जैसे ही वो मेरे निप्पलों को पकड़ कर खींचते, मेरा पूरा जिस्म कमान की तरह ऊपर की ओर उठ जाता। काफी देर तक यूँ ही मुँह में ठेलने के बाद उन्होंने अपना लंड बाहर निकाल लिया। और ज्यादा देर तक चूसने से हो सकता है मुँह में ही निकल जाता। उनका लंड मेरे थूक से गीला हो गया था और चमक रहा था। उनके उठते ही मैं भी उठ बैठी। उन्होंने मुझे बिस्तर से उतार कर वापस अपने आगोश में ले लिया। मैंने उनके सिर को अपने हाथों से थाम कर उनके होंठों पर अपने होंठ सख्ती से दाब दिये। मेरी जीभ उनके मुँह में घुस कर उनकी जीभ से खेलने लगी। साढ़े-चार इंच ऊँची ऐड़ी के सैंडल पहने होने के बावजूद मुझे अपनी ऐड़ियों को और ऊपर करना पड़ा जिससे मेरा कद उनके कद के कुछ हद तक बराबर हो जाये। मेरे सैंडलों के ऐड़ियाँ अब ज़मीन से ऊपर उठी हुई थी और मेरे पंजे मुड़े हुए थे। फिर मैंने अपने दोनों मम्मों को हाथों से उठा कर उनके सीने पर इस तरह रखा कि उनके निप्पलों को मेरे निप्पल छूने लगे। उनके निप्पल भी मेरी हरकत से एक दम कड़े हो गये थे। मेरे निप्पल तो पहले से ही उत्तेजना में तन चुके थे। मैंने अपने निप्पल से उनके निप्पल को सहलाना शुरू किया। उन्होंने मेरे नितंबों को सख्ती से पकड़ कर अपने लंड पर खींचा।

 

 

 

“मममऽऽऽ शहनाज़ मीऽऽऽऽ ऊँमऽऽऽऽ। तुम बहुत सैक्सी हो। अब अफ़सोस हो रहा है कि तुम्हें इतने दिनों तक मैंने छुआ क्यों नहीं। ओफफ‍ओहहऽऽऽ तुम तो मुझ पागल कर डालोगी। आआआऽऽऽहहहहऽऽऽ हाँऽऽऽ ऐसे हीऽऽऽ” वो अपने लंड को मेरी चूत के ऊपर रगड़ रहे थे। कुछ देर तक हमारे एक दूसरे के जिस्म को रगड़ने के बाद उन्होंने मुझे बिस्तर के पास ले जाकर मेरे एक पैर को उठा कर बिस्तर के ऊपर रख दिया। अब घुटनों के बल बैठने की उनकी बारी थी। वो मेरी टाँगों के पास बैठ कर बिस्तर पर रखे मेरे पैर और उसके सैंडल की पट्टियों पर अपनी जीभ फिराने लगे। मुझे ऊँची हील वाले सैक्सी सैंडल पहनना बहुत अच्छा लगता है, इसलिये मैं हरदम सैंडल पहने रहती हूँ। ज्यादातर मरदों की तरह शायद उन्हें भी हाई-हील सैंडल निहायत पसंद थे, इसलिये ताहिर अज़ीज़ खान जी अपने जीभ मेरे पंजों, पैरों और सैंडलों पर फिराने लगे। फिर उनकी जीभ मेरी टाँगों और जाँघों से होती हुई मेरी टाँगों के जोड़ पर घूमने लगी। उनकी जीभ मेरे घुटने पर से धीरे-धीरे आगे बढ़ती हुई मेरी टाँगों के जोड़ तक पहुँची। उन्होंने अपनी जीभ से मेरी चिकनी चूत को ऊपर से चाटना शुरू किया। वो अपने हाथों से मेरी चूत की फाँकों को अलग करके मेरी चूत के भीतर अपनी जीभ डालना चाहते थे।

 

 

 

“नहीं! ऐसे नहीं!” कहकर मैंने उनके हाथों को अपने जिस्म से हटा दिया और मैंने खुद एक हाथ की अँगुलियों से अपनी चूत को खोल कर दूसरे हाथ से उनके सिर को थाम कर अपनी चूत से सटा दिया। “लो अब चाटो इसे!”

 

 

 

उनकी जीभ किसी छोटे लंड की तरह मेरी चूत के अंदर बाहर होने लगी। शराब के नशे में मैं बहुत उत्तेजित हो गयी थी। मैं उनके बालों को अपनी मुठ्ठी में पकड़ कर उन्हें खींच रही थी, मानो उन्हें उखाड़ ही देना चाहती थी। दूसरे हाथों की अँगुलियों से मैंने अपनी चूत को फैला रखा था और साथ-साथ एक अँगुली से अपनी क्लीटोरिस को सहला रही थी। मैंने सामने आईने में देखा तो हम दोनों की हालत को देख कर अपने ऊपर कंट्रोल नहीं कर पायी और मेरे जिस्म से लावा बह निकला। मैंने सख्ती से दूसरे हाथों की मुठ्ठी में उनके बालों को पकड़े हुए उनके सिर को अपनी चूत में दाब रखा था। उनकी जीभ मेरी चूत से बहती हुई रस धारा को अपने अंदर समा लेने में मसरूफ हो गयी। काफी देर तक इसी तरह चूसवाते हुए जब मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गया तो मैंने उनके सिर को अपनी चूत से खींच कर अलग किया। उनके सिर के कईं बाल टूट कर मेरी मुठ्ठी में आ गये थे। उनके होंठ और ठुड्डी मेरे रस से चमक रहे थे। “ऊऊहहऽऽ ताआऽऽहिर!” अब मैंने वासना और शराब के नशे में अपने खिताब में चेंज लाते हुए उन्हें ऊपर अपनी ओर खींचा। वो खड़े हो कर मुझ से लिपट गये और मेरे होंठों पर अपने होंठ रख कर मेरे होंठों को अपने मुँह में खींच लिया और उन्हें बुरी तरह चूसने लगे। मैं नहीं जानती थी कि उधर भी इतनी ज्यादा आग लगी हुई है। उन्होंने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी। मुँह में अजीब सा टेस्ट समा गया। मैंने ज़िंदगी में पहली बार अपनी चूत के रस का स्वाद चखा। मैंने उनके चेहरे पर लगे अपने रस को चाट कर साफ़ किया।

 

 

 

उन्होंने थिरकते हुए बिस्तर के साईड में रखी फ्रेंच वाईन की बोतल उठा ली। उसके कॉर्क को खोल कर उन्होंने उसमें से एक घूँट लगाया। फिर मैंने भी एक घूँट लगाया और फिर उन्होंने मुझे अपने सामने खड़ा कर दिया। फिर उस बोत्तल से मेरे एक मम्मे पर धीरे-धीरे वाईन डालने लगे। उन्होंने अपने होंठ मेरे निप्पल के ऊपर रख दिये। रेड वाईन मेरे बूब्स से फ़िसलती हुई मेरे निप्पल के ऊपर से होती हुई उनके मुँह में जा रही थी। बहुत ही एग्ज़ोटिक सीन था वो। फिर वो उस बोतल को ऊपर करके मेरे सिर पर वाईन उढ़ेलने लगे। साथ-साथ मेरे चेहरे से, मेरे कानों से और मेरे बालों से टपकती हुई वाईन को पीते जा रहे थे। मैं वाईन में नहा रही थी और उनकी जीभ मेरे पूरे जिस्म पर दौड़ रही थी। मैं उनकी हरकतों से पागल हुई जा रही थी। इस तरह से मुझे आज तक किसी ने प्यार नहीं क्या था। इतना तो साफ़ दिख रहा था कि मेरे ससुर जी सैक्स के मामले में तो सबसे अनोखे खिलाड़ी थे। जब बोतल आधी से ज्यादा खाली हो गयी तो उन्होंने बोतल मुझे पकड़ा दी और मेरे पूरे जिस्म को चाटने लगे। मैं बोतल से घूँट पीने लगी और वो मेरा जिस्म चाटने लगे। मेरा पूरा जिस्म वाईन और उनकी लार से चिपचिपा हो गया था। उन्होंने एक झटके में मुझे अपनी बाँहों में उठा लिया और अपनी बाँहों में उठाये हुए बाथरूम में ले गये। इस उम्र में भी इतनी ताकत थी कि मुझको उठाकर बाथरूम ले जाते वक्त एक बार भी उनकी साँस नहीं फ़ूली। बाथरूम में बाथ-टब में दोनों घुस गये और एक दूसरे को मसल-मसल कर नहलाने लगे। नहाते वक्त भी मेरे पैरों में सैंडल मौजूद थे। नहाने के साथ-साथ हम एक दूसरे को छेड़ते जा रहे थे। सैक्स के इतने रूप मैंने सिर्फ तसव्वुर में ही सोचे थे। आज ससुर जी ने मेरे पूरे वजूद पर अपना हक जमा दिया। वहीं पर बाथ-टब में बैठे-बैठे उन्होंने मुझे टब का सहारा लेकर घुटने के बल झुकाया और पीछे की तरफ़ से मेरी चूत और मेरी गाँड के छेद पर अपनी जीभ फिराने लगे।

 

 

 

“ऊऊऊऽऽऽहहहऽऽऽऽ! ताआऽऽऽहिर! जाआऽऽऽन ये क्या कर रहे हो? छीऽऽऽ नहीईं वहाँ जीऽऽभ सेऽऽऽ मत चाटो! नऽऽऽहींऽऽऽ हाँऽऽऽऽ और अंदर.... और अंदर।” मैं उत्तेजना में जोर-जोर से चींखने लगी। ससुर जी ने मेरी गाँड के छेद को अपनी अँगुलियों से फैला कर उसके अंदर भी एक बार जीभ डाल दी। मेरी चूत में आग लगी हुई थी। मैं उत्तेजना और नशे में अपने ही हाथों से अपने मम्मों को बुरी तरह मसल रही थी।

 

 

 

“बस-बस! और नहीं.. अब मेरी प्यास बुझा दो। मेरी चूत जल रही है.... इसे अपने लंड से ठंडा कर दो। अब मुझे अपने लंड से चोद दो। अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती। ये आपने क्या कर डाला..... मेरे पूरे जिस्म में आग जल रही है। प्लीऽऽऽऽज़ और नहीं.... ” मैं तड़प रही थी। उन्होंने वापस टब से बाहर निकल कर मुझे अपनी बाँहों में उठाया और गीले जिस्म में ही कमरे में वापस आये।

 

 

 

उन्होंने मुझे उसी हालत में बिस्तर पेर लिटा दिया। वो मुझे लिटा कर उठने को हुए तो मैंने झट से उनकी गर्दन में अपनी बांहें डाल दीं, जिससे वो मुझसे दूर नहीं जा सकें। अब इंच भर की दूरी भी बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी बाँहों को अपनी गर्दन से अलग किया और अपने लंड पर बोतल में बची हुई वाईन से कुछ बूँद रेड वाईन डाल कर मुझसे कहा, “अब इसे चूसो!” मैंने वैस ही किया। मुझे वाईन से भीगा उनका लंड बहुत ही टेस्टी लगा। मैं वापस उनके लंड को मुँह में लेकर चूसने लगी। उन्होंने अब उस बोतल से बची हुई वाईन धीरे-धीरे अपने लंड पर उढ़ेलनी शुरू की। मैं उनके लंड और उनके टट्टों पर गिरती हुई वाईन को पी रही थी। कुछ देर बाद जब मैं पुरी वाईन पी चुकी तो उन्होंने मुझे लिटा दिया और मेरी टांगें अपने कंधों पर रख दीं। फिर उन्होंने मेरी कमर के नीचे एक तकिया लगा कर मेरी चूत की फाँकों को अलग किया। मैं उनके लंड के दाखिल होने का इंतज़ार करने लगी। उनके लंड को मैं अपनी चूत के ऊपर सटे हुए महसूस कर रही थी। अब तो मैं इतने नशे में थी कि मैंने आँखें बंद करके अपने आप को इस दुनिया से काट लिया था। नशे और वासना में चूर मैं दुनिया के सारे रिश्तों को और सारी मर्यादाओं को भूल कर बस अपने ससुर जी का, अपने बॉस का, अपने ताहिर जानू के लंड को अपनी चूत में घुसते हुए महसूस करना चाहती थी। अब वो सिर्फ, और सिर्फ मेरे आशिक थे। उनसे बस एक ही रिश्ता था; जो रिश्ता किसी मर्द और औरत के बीच जिस्मों के मिलन से बनता है। मैं उनके लंड से अपनी चूत की दीवारों को रगड़ना चाहती थी। सब कुछ एक जन्नती एहसास दे रहा था। उन्होंने मेरी चूत की फाँकों को अलग करके अपने लंड को मेरी चूत के छेद पर रखा। “अब बता मेरी जान..... कितनी प्यास है तेरे अंदर? मेरे लंड को कितना चाहती है?” ताहिर अज़ीज़ खान जी ने अपने लंड को चूत के ऊपर रगड़ते हुए पूछा।

 

 

 

“आआऽऽऽहहऽऽऽ क्या करते हो.... ऊँममऽऽऽ अंदर घुसा दो इसे!” मैंने अपने सूखे होंठों पर जीभ फ़ेरी।

 

 

 

“मैं तो तुम्हारा ससुर हूँ...... क्या ये मुनासिब है?”

 

 

 

“ऊऊऽऽहहऽऽऽ राऽऽज!! ताऽऽऽहिर मेरी जाऽऽऽन मेराऽऽ इंतहान मत लोऽऽऽ। ऊँम्म डाल दो इसे..... अपने बेटे की बीवी की चूत फाड़ दो अपने लंड से..... कब से प्यासी हूँ तुम्हारे इस लंड के लिये.... ओ‍ओहहह कितने दिनों से ये आग जल रही थी। मैं तो शुरू से तुम्हारी बनना चाहती थी। ओऽऽऽहहऽऽऽ तुम कितने पत्थर दिल होऽऽऽऽ! कितना तरसया मुझे.... आज भी तरसा रहे हो!” मैंने उनके लंड को अपने हाथों से पकड़ कर अपनी चूत की ओर ठेला मगर उन्होंने मेरी कोशिश को नाकाम कर दिया। मेरी चूत का मुँह लंड के एहसास से लाल हो कर खुल गया था जिससे उनके लंड को किसी तरह की परेशानी ना हो। मेरी चूत से काम-रस झाग बनके निकल कर मेरे चूतड़ों के कटाव के बीच से बहता हुआ बिस्तर की ओर जा रहा था। मेरी चूत का मुँह पानी से उफ़न रहा था। “अंदर कर दूँ???”

 

 

 

“हाँ ऊऊहह हाँऽऽऽ”

 

 

 

“मेरे लंड पर किसी तरह का कोई कंडोम नहीं है। मेरा वीर्य अपनी कोख में लेने की इच्छा है क्या?”

 

 

 

“हाँऽऽ ऊऊहह माँ... हाँऽऽ मेरी चूत को भर दो अपने वीर्य सेऽऽऽ! डाल दो अपना बीज मेरी कोख में!” मैं तड़प रही थी। पूरा जिस्म पसीने से तरबतर हो रहा था। मेरी आँखें उत्तेजना से उलट गयी थीं और मेरे होंठ खुल गये थे। मैं अपने सूखे होंठों पर अपनी जीभ चला कर गीला कर रही थी।

 

 

 

“फिर तुम्हारी कोख में मेरा बच्चा आ जायेगा!!”

 

 

 

“हाँऽऽ हाँऽऽऽ मुझे बना दो प्रेगनेंट। अब बस करोऽऽऽ। मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ.... और मत सताओ! मत तड़पाओ मुझे!” मैंने अपनी दोनों टाँगें बिस्तर पर जितना हो सकता था फैला लीं, “देखो तुम्हारे बेटे की दुल्हन तुम्हारे सामने अपनी चूत खोल कर लेटी तुमसे गिड़गिड़ा रही है कि उसकी चूत को फाड़ डालो। रगड़ दो उसके नाज़ुक जिस्म को। मसल डालो मेरे इन मम्मों को.... जिन पर मुझे नाज़ है! ये सब आपके छूने.... आपकी मोहब्बत के लिये तड़प रहे हैं।” मैं बहकने लगी थी। अब वो मेरी मिन्नतों पर पसीज गये और अपनी अँगुलियों से मेरी क्लिटोरिस को मसलते हुए अपने लंड को अंदर करने लगे। मैं अपने हाथों से उनकी छातियों को मसल रही थी और उनके लंड को अपने चूत की दीवारों को रगड़ते हुए अंदर दाखिल होते महसूस कर रही थी।

 

 

 

“हाँऽऽ मेरे ताहिर! इस लुत्फ का मुझे जन्मों से इंतज़ार था। तुम इतने नासमझ क्यों हो! मेरे दिल को समझने में इतनी देर क्यों कर दी!”

 

 

 

उन्होंने वापस मेरी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। उनके दोनों हाथ अब मेरे दोनों बूब्स पर थे। दोनों हाथ मेरी छातियों को जोर-जोर से मसल रहे थे और वो मेरे निप्पलों को अँगुलियों से मसल रहे थे। मेरी चूत बुरी तरह से गीली हो रही थी इसलिये उनके लंड को दाखिल होने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई। उनका लंड पूरी तरह मेरी चूत में समा गया था। फिर उन्होंने धीरे-धीरे अपने लंड को पूरी तरह से बाहर खींच कर वापस एक धक्के में अंदर कर दिया। अब उन्होंने मेरी टाँगें अपने कंधों से उतार दीं और मेरे ऊपर लेट गये और मुझे अपनी बाँहों में भर कर मेरे होंठों को चूमने लगे। सिर्फ उनकी कमर ऊपर-नीचे हो रही थी। मेरी टाँगें दोनों ओर फ़ैली हुई थीं। कुछ ही देर में मैं उत्तेजित होकर उनके हर धक्के का अपनी कमर को उनकी तरफ़ उठा कर और उछाल कर वेलकम करने लगी। मैं भी नीचे की ओर से पूरे जोश में धक्के लगा रही थी। एयर कंडिशनर की ठंडक में भी हम दोनों पसीने-पसीने हो रहे थे। कमरे में सिर्फ एयर कंडिशनर की हमिंग के अलावा हमारी “ऊऊऽऽहहऽऽ ओ‍ओऽऽहहऽऽ” की आवाज गूँज रही थी। साथ में हर धक्के पर “फ़च फ़च” की आवाज आती थी। हमारे होंठ एक दूसरे से सिले हुए थे। हमारी जीभ एक दूसरे के मुँह में घूम रही थी। मैंने अपने पाँव उठा कर उनकी कमर को चारों ओर से जकड़ लिया। काफी देर तक इसी तरह चोदने के बाद वो उठे और मुझे बिस्तर के किनारे खींच कर आधी-लेटी हालत में लिटा कर मेरी टाँगों के बीच खड़े होकर मुझे चोदने लगे। उनके हर धक्के के साथ पूरा बिस्तर हिलने लगता था। मेरी चूत से दो बार पानी की बौंछार हो चुकी थी। कुछ देर तक और चोदने के बाद उन्होंने अपने लंड को पूरी जड़ तक मेरी चूत के अंदर डाल कर मेरे दोनों मम्मों को अपनी मुठ्ठी में भर कर इतनी बुरी तरह मसला कि मेरी तो जान ही निकल गयी। “ले! ले मेरा बीज..... मेरा वीर्य अपने पेट में भर ले। ले-ले मेरे बच्चे को अपने पेट में। अब नौ महीने बाद मुझसे शिकायत नहीं करना।” उन्होंने मेरे होंठों के पास बड़बड़ाते हुए मेरी चूत में अपना वीर्य डाल दिया। मैंने उनके नितंबों में अपने नाखून गड़ा कर अपनी चूत को जितना हो सकता ऊपर उठा दिया और मेरा भी रस उनके लंड को भिगोते हुए निकल पड़ा। दोनों खल्लास होकर एक दूसरे की बगल में लेट गये। हम कुछ देर तक यूँ ही लंबी-लंबी साँसें लेते रहे। फिर उन्होंने करवट लेकर अपना एक पैर मेरे जिस्म के ऊपर चढ़ा दिया और मेरे मम्मों से खेलते हुए बोले, “ओ‍ओऽऽफफऽऽ शहनाज़ तुम भी गजब की चीज़ हो। मुझे पूरी तरह थका दिया मुझे।”

 

 

 

“अच्छा?”

 

 

 

“इसी तरह अगर अक्सर चलता रहा तो बहुत जल्दी ही मुझे दवाई लेनी पड़ेगी.... ताकत की।”

 

 

 

“मजाक मत करो! अगर दवाई की किसी को जरूरत है तो मुझे, जिससे कहीं प्रेगमेंट ना हो जाऊँ।”

 

 

 

हम दोनों वापस एक दूसरे से लिपट गये और उस दिन सारी रात एक दूसरे से खेलते हुए गुजर गयी। उन्होंने उस दिन मुझे रात में कईं बार अलग-अलग तरीके से चोदा।

 

 

 

सुबह उठने की इच्छा नहीं हो रही थी। पूरा जिस्म टूट रहा था। आज हैमिल्टन और साशा भी हमारे साथ मिल गये। हैमिल्टन मौका खोज रहा था मेरे साथ चुदाई का। लेकिन अब मैं ताहिर अज़ीज़ खान जी के ही रंगों में रंग चुकी थी। मेरा रोमरोम अब इस नये साथ को तरस रहा था। उस दिन भी वैसी ही चुहल बाजी चलती रही। मैंने स्विमिंग पूल पर अपनी सबसे छोटी बिकिनी पहनी थी। मेरा आशिक तो उसे देखते ही अपने होश खो बैठा। हैमिल्टन के होंठ फ़ड़क उठे थे। हैमिल्टन ने पूल के अंदर ही मेरे जिस्म को मसला। शाम को हम डाँस फ़्लोर पर गये तो मैं नशे में झूम सी रही थी। उस दिन शाम को भी हैमिल्टन के उकसाने पर मैंने काफी ड्रिंक कर रखी थी। डाँस फ़्लोर पर कुछ देर हैमिल्टन के साथ रहने के बाद ताहिर अज़ीज़ खान जी ने मुझे अपने पास खींच लिया। साशा भी उनके जिस्म से चिपकी हुई थी। हम दोनों को अपनी दोनों बाजुओं में कैद करके ताहिर अज़ीज़ खान जी थिरक रहे थे। हैमिल्टन टेबल पर बैठा हम तीनों को देखते हुए मुस्कुराता हुआ अपनी कॉकटेल सिप कर रहा था। हम दोनों ने ताहिर अज़ीज़ खान जी की हालत सैंडविच जैसी कर दी थी। मैं उनके सामने सटी हुई थी तो साशा उनकी पीठ से चिपकी हुई थी। हम दोनों ने उनके जिस्म से शर्ट नोच कर फ़ेंक दी थी। ऊन्होंने भी हम दोनों को टॉपलेस कर दिया था। हम अपने मम्मों और अपने सख्त निप्पलों को उनके जिस्म पर रगड़ रही थीं। कुछ देर बाद हैमिल्टन भी स्टेज पर आ गया। उसके साथ कोई और लड़की थी। ये देख कर साशा हम से अलग होकर हैमिल्टन के पास चली गयी। जैसे ही हम दोनों अकेले हुए, ताहिर अज़ीज़ खान जी ने अपने तपते होंठ मेरे होंठों पर रख कर एक गहरा चुंब्बन लिया। “आज तो तुम स्विमिंग पूल पर गजब ढा रही थीं।”

 

 

 

“अच्छा? मिस्टर ताहिर अज़ीज़ खान - एक स्टड ऐसा कह रहा है! जिसपर यहाँ कईं लड़कियों की आँखें गड़ी हुई हैं। जनाब ..जवानी में तो आपका घर से निकलना मुश्किल रहता होगा?”

 

 

 

“शैतान मेरी खिंचायी कर रही है!” ताहिर अज़ीज़ खान जी मुझे अपनी बाँहों में लिये-लिये स्टेज के साईड में चले गये। “चलो यहाँ बहुत भीड़ है। स्विमिंग पूल पर चलते हैं.... अभी पूल खाली होगा।”

 

 

 

“लेकिन पहले बिकिनी की ब्रा तो ले लूँ।”

 

 

 

“उसकी क्या जरूरत?” वो बोले। मैंने उनकी तरफ़ देखा तो वो बोले, “आज मूनलाईट में न्यूड स्विमिंग करेंगे। बस तुम और मैं।”

 

 

 

उनकी प्लैनिंग सुनते ही उत्तेजना में मेरा रोम-रोम थिरक उठा। मैंने कुछ कहा नहीं बस चुपचाप ताहिर अज़ीज़ खान जी का सहारा लेकर उनकी कमर में हाथ डाले मैं नशे में लड़खड़ाती हुई उनके साथ हो ली। हम लोगों से बचते हुए कमरे से बाहर आ गये। स्विमिंग पूल का नज़ारा बहुत ही दिलखुश था। हल्की रोशनी में पानी का रंग नीला लग रहा था। तब शाम के नौ बज रहे थे, इसलिये स्विमिंग पूल पर कोई नहीं था और शायद इसलिये रोशनी कम कर दी गयी थी। ऊपर पूरा चाँद ठंडी रोशनी बिखेर रहा था। हम दोनों वहाँ पूल के नज़दीक पहुँच कर कुछ देर तक एक दूसरे को निहारते रहे फिर हम दोनोंने एक दूसरे के कपड़े उतारने शुरू किये। मैंने ड्रेस कोड के मुताबिक पैंटी नहीं पहन रखी थी। इसलिये जैसे ही वो मेरी स्कर्ट को खींचने लगे मैंने उन्हें रोका। “प्लीऽऽऽज़! इसे नहीं। किसी ने देख लिया तो?”

 

 

 

“यहाँ कोई नहीं आयेगा और किसे परवाह है? देखा नहीं हॉल में सब नंगे नाच रहे थे।” कहते हुए उन्होंने मेरी स्कर्ट खींच दी और मेरे सैंडलों के अलावा मुझे बिल्कुल नंगी कर दिया और खुद भी बिल्कुल नंगे हो गये। सबसे पहले ताहिर अज़ीज़ खान जी पूल में दाखिल हुए। मैं वो हाई-हील के सैंडल पहने नशे में किनारे खड़ी झूम सी रही थी तो उन्होंने मुझे हाथ पकड़ कर अंदर खींच लिया। मैं खिलखिला कर हँस पड़ी। मैंने अपनी हाथों में पानी भर कर उनके चेहरे पर फ़ेंका। तो वो मुझे पकड़ने के लिये मेरे पीछे तैरने लगे। हम दोनों काफी देर तक चुहल बाजी करते रहे और एक दूसरे के जिस्म से खेलते रहे। हम दोनों कसके एक दूसरे से लिपट जाते और एक दूसरे के जिस्म को चूमने लगते। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने मेरे जिस्म का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा जहाँ उनके होंठों ने छुआ ना हुआ हो। मैंने स्विमिंग पूल के किनारे को पकड़ कर अपने आप को स्टैडी किया। ताहिर अज़ीज़ खान जी पीछे से मेरे जिस्म से लिपट कर मेरे गीले मम्मों को मसल रहे थे। मैं अपनी गर्दन पीछे घूमा कर उनके होंठों को अपने दाँतों से काट रही थी। उनका लंड मेरे दोनों चूतड़ों के बीच सटा हुआ था। मैंने अपने एक हाथ से उनके लंड को थाम कर देखा। लंड पूरी तरह तना हुआ था। “आ जाओ जान! पानी भी मेरे जिस्म की आग को बुझा नहीं पा रहा है। जब तक तुम मेरे जिस्म को शांत नहीं करोगे, मैं ऐसे ही फुँकती रहुँगी।” मैंने उनके बालों को अपनी मुठ्ठी में भर कर अपनी तरफ़ मोड़ा और उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया।

 

 

 

“तुम बहुत ही गरम हो और शराब पी कर नशे में तुम और भी नशीली हो जाती हो!”

 

 

 

उस जगह पर पानी कम था। उन्होंने पानी में खड़े होकर मुझे उठा कर स्विमिंग पूल के ऊपर बिठा दिया। मेरी टाँगें पूल के किनारे पर झूल रही थीं। वो अपने दोनों हाथों से मेरी टाँगों को फैला कर मेरी टाँगों के बीच आ गये। मैंने अपनी टाँगें उठा कर उनके कंधों पर रख दी। इससे मेरी चूत ऊपर उठकर उनके चेहरे के सामने हो गयी। उन्होंने मेरी चूत पर अपने होंठ टिका दिये और अपनी जीभ को चूत के ऊपर फिराने लगे।

 

 

 

“आआऽऽहहहऽऽऽ ममऽऽआआआ ऊँऊँऽऽऽऽऽ आआऽऽऽ” मैंने उनके सिर को अपने एक हाथ से पकड़ा और दूसरे हाथ को जमीन पर रखते हुए उनके सिर को अपनी चूत पर दबा दिया। वो अपनी जीभ को मेरी चूत के अंदर डाल कर उसे आगे पीछे करने लगे। मैंने उत्तेजना में अपने दोनों हाथों से ताहिर अज़ीज़ खान जी को पकड़ लिया और अपनी कमर को उनके मुँह की तरफ़ ठेलने लगी। उन्होंने मेरे दोनों चूतड़ों पर अपनी अँगुलियाँ गड़ा दीं और मेरी क्लिटोरिस को अपने दाँतों के बीच दबा कर हल्के-हल्के से कुतरने लगे। वो इस हालत में पीछे हटे तो मैं उनको पकड़े-पकड़े ही वापस स्विमिंग पूल में उतर गयी। मैंने अपनी टाँगों को कैंची की तरह उनके जिस्म को चारों ओर से जकड़ लिया था। फिर उनके सिर को थामे हुए अपनी टाँगों को हल्का सा लूज़ करते हुए उनके जिस्म पर फ़िसलती हुई नीचे की ओर खिसकी। जैसे ही मैंने अपने जिस्म पर उनके लंड की रगड़ महसूस की तो अपने हाथों से उनके लंड को अपनी चूत पर सेट करके वापस अपने जिस्म को कुछ नीचे गिराया। उनका लंड मेरी चूत के दरवाजे को खोलता हुआ अंदर घुसता चला गया। उन्होंने मेरी पीठ को स्विमिंग पूल के किनारे से सटा दिया मैंने अपने हाथों से पीछे की ओर स्विमिंग पूल के किनारे का सहारा लेकर अपने जिस्म को सहारा दिया। वैसे मुझे सहारे की ज्यादा जरूरत नहीं थी क्योंकि मेरी टाँगों ने उनके जिस्म को इस तरह जकड़ रखा था कि वो मेरी इच्छा के बिना हिल भी नहीं पा रहे थे। उन्होंने जोर-जोर से धक्के देना शुरू किया।

 

 

 

“आआऽऽहहऽऽऽ आआऽऽहहऽऽऽ ताहिर.... ताऽऽहिर..... हाँआँऽऽऽऽ हाँआँऽऽ और जोर सेऽऽऽऽ ममऽऽऽ मज़ाऽऽऽऽ आ गयाऽऽऽ ऊऊफफऽऽऽ जोरों सेऽऽऽ ऊँऊँऽऽआआऽऽऽ....” मैंने अपनी बाँहों का हार उनके गले में डाल दिया और उनके होंठों से अपने होंठ चिपका दिये। मैं उनके होंठों को कुतर रही थी।

 

 

 

“ले! ले ले! अंदर लेले अंदर! पूरा..... आआऽऽहहऽऽऽ क्याऽऽऽ चीज़ है ऊँऽऽ”, कहते हुए उन्होंने मुझे सख्ती से अपनी बाँहों में जकड़ लिया और अपने रस की धार मेरी चूत में बहाना शुरू किया। मैंने इस मामले में भी उनसे हार नहीं मानी। मेरा रस भी उनके रस से मिलने निकल पड़ा। हम दोनों अपने जिस्म को दूसरे के जिस्म में समा देने के लिये जी तोड़ कोशिश करने लगे। दोनों एक दूसरे से इस तरह लिपट रहे थे कि पानी से भाप उठना ही बाकी रह गया था। हम दोनों झड़ कर स्विमिंग पूल में कुछ देर तक मछलियों की तरह अठखेलियाँ करते रहे। उसके बाद हमने पानी से निकल कर एक दूसरे के जिस्म को साथ के बाथरूम में जाकर पोंछा और फिर हम अपने कमरे में वापस लौट गये। खाना कमरे में ही मंगा कर खाया। ताहिर अज़ीज़ खान जी कुछ ज्यादा ही रोमैंटिक हो रहे थे। उन्होंने मुझे अपनी गोद में बिठा कर अपने हाथों से खिलाया।

 

 

 

अगले दिन हैमिल्टन और साशा पीछे ही पड़ गये और हम दोनों को अलग नहीं छोड़ा। हमने उनके साथ ही ग्रुप सैक्स का मज़ा लिया। हम जितने भी दिन वहाँ ठहरे, हमने खूब इंजॉय किया। ससुर जी से छिपा कर अगर मौका मिलता तो मैं कॉनफ्रेंस में मौजूद दूसरे मर्दों से चुदवाने से नहीं चूकती थी। मैं भी क्या करती। माहौल ही ऐसा था। दिन भर शराब और हर तरफ नंगापन और चुदाई.... मैं खुद को रोक नहीं पाती थी। अलग- अलग देशों के मर्दों के तरह-तरह के छोटे, लंबे, मोटे लंड, हर तरफ दिखायी देते थे।

 

 ऐसे ही एक शाम मैं नशे में स्टेज पर डाँस कर रही थी। बहुत ही उत्तेजक और तेज़ म्यूज़िक चल रहा था और स्टेज नाचने वाले लोगों से खचाखच भरा हुआ था। सभी नंग-धड़ंग हालत में झूम रहे थे और बहुत से तो पूरे नंगे थे और कईं जोड़े चुदाई में भी लगे थे। ताहिर अज़ीज़ खान जी पहले तो वहीं मौजूद मेरे पास ही डाँस रहे थे पर जब डाँस खत्म हुआ तो वो कहीं दिखायी नहीं दिये। हर तरफ कितने ही जोड़े नंगे होकर चुदाई में मसरूफ थे। सशा और हैमिल्टन भी चुदाई का मज़ा ले रहे थे और मेरी चूत भट्ठी की तरह जल रही थी। मेरे जिस्म पर सिर्फ छोटी सी स्कर्ट थी और मेरे मम्मे पूरे नंगे थे क्योंकि डाँस करते वक्त मेरे जिस्म से भी किसी ने मेरा टॉप खींच दिया था और अब उस टॉप के मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी। डी-जे ने नया म्यूज़िक चालू किया तो मैं नशे में लड़खड़ाती हुई स्टेज से उतरी और उन नंगे लोगों की भीड़ में ससुर जी को खोजने लगी और अचानक हाई-हील सैंडल में मेरा संतुलन बिगड़ गया और मैं गिरने लगी तो किसी के मजबूत हाथ ने मुझे थाम लिया और गिरने से रोका। मैंने देखा एक हट्टा-कट्टा आफ्रिकी काला आदमी मेरे पीछे से मुझे थामे मुस्कुरा रहा था। मुझे अपने चूतड़ों के बीच कुछ ठोस चीज़ चुभती हुई महसूस हुई पर अगले ही पल मुझे एहसास हुआ कि वो और कुछ नहीं बल्कि उसका हलब्बी लंड था।

 

 

 

“थैंक यू सो मच!” मैंने संभलते हुए उसकी तरफ मुड़कर कहा।

 

 

 

“मॉय प्लेज़र.... ” वो मुस्कुराता हुआ बोला। मैं अभी भी उसकी मजबूत बाँह की गिरफ़्त में थी और उसके इतनी करीब थी कि उसका लंड मेरी नाभी के ऊपर चुभ रहा था। मेरी नज़र उसके काले लंड पर पड़ी तो मेरी आँखें फटी रह गयीं और मन-ही-मन में मैं सिसक उठी। इतना बड़ा लंड तो मैंने ज़िंदगी में नहीं देखा था। ऐसा लग रहा था किसी घोड़े का लंड हो और वो आदमी स्वयं भी बहुत ही ताकतवर और हट्टाकट्टा था। वो इतना लंबा था कि मेरे साढ़े-चार-पाँच इंच ऊँची हील के सैंडलों के बावजूद उसका लंड मेरी नाभी के ऊपर था।

 

 

 

वो शायद मेरी हालत समझ गया ओर बोला, “इट सीम्स यू लाइक मॉय टूल... हाऊ अबाऊट ए ड्रिंक विद मी एंड देन यू कैन ट्राय..... ”

 

 

 

उसकी बात पुरी होने के पहले ही मैं बोल पड़ी, “ऊँहह! आय... एक्चुअली आय एम लुकिंग फ़ोर मॉय बॉस....!” लेकिन मैंने उससे दूर होने की कोशिश नहीं की। मेरा हाथ खुद-ब-खुद ही उसके हलब्बी लंड की तरफ बढ़ गया। पता नहीं मुझे क्या हो गया था। मुझे तो जैसे उसके लंड ने हिप्नोटाइज़ कर लिया था।

 

 

 

“कम ऑन ब्यूटीफुल.... योर बॉस मस्ट बी फकिंग सम कंट सम व्हेयर.... यू शुड एंजॉय ठू.... ” ये कहते हुए उसने अपने लंड पर रखे मेरे हाथ को और दबा दिया। मेरी हथेली में उसके लंड की मोटाई समा नहीं रही थी। इतना मोटा घोड़े जैसा लंड अपनी चूत में लेने के ख्याल से मैं सिहर उठी और मेरी चूत का पानी तो जैसे चूत की गर्मी से भाप बन कर निकलने लगा।

 

 

 

वो मुझे सहारा दे कर बार के करीब ले गया और दो ड्रिंक्स ऑर्डर किये। फिर उसने मुझे कमर से पकड़ कर उछालते हुए ऊँचे बार-स्टूल पर इस तरह बिठा दिया जैसे मैं कोई रबड़ की गुड़िया होऊँ। हमने एक दूसरे को अपना इंट्रोडक्शन दिया। उसका नाम ओरिजी था और वो नाईजीरिया का रहने वाला था। हम ड्रिंक पीने लगे और मैं बैठे-बैठे ही नशे में झूमती हुई उसकी बातों पर खिलखिला कर हँस रही थी। वो मेरी तारिफ किये जा रहा था जैसे “यू अर सो सैक्सी.... इफ़ आय वर योर बॉस.... आय वुड नॉट लीव यू फोर अ मोमेंट,” वगैरह-वगैरह। मुझे तो अपनी किस्मत पर फख्र हो रहा था, मानो मुझे उस गैर-मामुली लंड के रूप में कोहीनूर हिरा मिल गया हो और मैं उससे चुदने के लिये लालियत हो रही थी। वो मेरे बहुत नज़दीक बैठा था और हमारे हाथ एक-दूसरे के जिस्मों को बीच-बीच में सहला रहे थे। मैं भी उसके गठीले जिस्म और राक्षसी लंड की तारीफ कर रही थी। जब मैंने उसे बताया कि मैंने पहले कभी इतना बड़ा लंड किसी इंसान का नहीं देखा तो वो बोला, “डोंट वरी.... मॉय बिग कॉक इज़ ऐट योर सर्विस ऐज़ लाँग ऐज़ यू वाँट!”

 

 

 

अचानक मैंने देखा कि वो हाथ हिला कर किसी को इशारा कर रहा है। फिर मैंने एक और लंबे चौड़े काले आदमी को हमारी तरफ आते हुए देखा। वो ओरिजी की तरह बिल्कुल नंगा नहीं था बल्कि शॉर्ट्स पहने हुए था। वो पास आया तो मुझे एहसास हुआ कि वो ओरिजी से ऊँचा और वैसा ही हट्टा-कट्टा था। उसके गले में सोने की मोटी सी चेन झूल रही थी। उन्होंने अपनी भाषा में कुछ मज़ाक किया और फिर ओरिजी ने मेरा तार्रुफ कराया। “शहनाज़! दिस इज़ माइकल... मॉय फ्रेंड फ्रॉम केन्या.... एंड माईक, दिस इज़ ब्यूटिफुल शहनाज़ ....।”

 

 

 

माइकल ने मुस्कुराते हुए मेरे गालों पर एक चुंबन दिया और मेरे मम्मों पर अपना बड़ा सा हाथ रख कर उन्हें दबा दिया। “वॉव.... यू र सो सैक्सी.... ऑय विश आय वाज़ ऐज़ लक्की ऐज़ ओरिजी टू हैव योर कंपनी टू-नाईट!” मेरे हाथ में ओरिजी के लंड को दखते हुए उसने आह भर कर कहा।

 

 

 

“कम ऑन मॉय मैन.... जॉयन अस फोर अ ड्रिंक.... वी कैन आल हैव फन टूगेदर!” ओरिजी ने आँख मारते हुए कहा। मेरा दिल उत्तेजना में जोर-जोर से धड़कने लगा पर मुझे उस समय पूरा यकीन नहीं था कि क्या सचमुच ‘फन’ से उसका मतलब चुदाई से है। मैं मन ही मन दुआ करने लगी कि उसके कहने का मतलब यही हो और माईक का लंड भी ओरिजी जैसा ही हो और मुझे आज की रात दो-दो काले आदमियों के मोटे-तगड़े लौड़ों से चुदवाने को मिले।

 

 

 

माइक भी एक बार-स्टूल हमारे पास खींच कर उस पर बैठ गया और तीनों के लिये ड्रिंक ऑर्डर किया। “ओह नॉट फॉर मी... ऑय हैव बीन ड्रिंकिंग होल इवनिंग..... एंड ऑय एम आलरेडी टू-मच ड्रंक.... ” मैंने मना करते हुए कहा।

 

 

 

“कम ऑन ब्यूटीफुल..... हैव फन..... योर सैक्सी बॉडी इज़ मोर इंटॉक्सीकेटिंग दैन ऑल द लिकर यू कैन ड्रिंक...” वो बोला और उसने अपना शॉर्ट्स उतार दिया और बिकुल नंगा हो गया। मेरी तो साँस ही हलक में अटक गयी क्योंकि उसका लंड तो ओरिजी के लंड से भी ज्यादा भयानक था। ओरिजी का लंड ही एक फुट के लगभग था और माईक का लंड तो उससे भी दो-तीन इंच लंबा और मोटा भी था। जहाँ एक तरफ मेरी चूत में उत्तेजना की लहरें उठ रही थीं वहीं मेरे दिल में अंजाना सा डर भी था कि क्या मेरी चूत में ये लौड़े दाखिल हो पायेंगे। ये दोनों हब्शी, आदमी थे या जानवर क्योंकि उनके लौड़ों का नाप इंसानी तो नहीं था।

 

 

 

उसने जो ड्रिंक ऑर्डर किया था, वो काफी स्ट्राँग था पर था बहुत लजीज़। मैंने दो तीन बड़े सिप लेकर ग्लास सामने रख दिया। मैंने खुद को उस माहौल के हवाले करके बिना किसी झिझक के ऐय्याशियों में डूब जाने का फैसला कर लिया। उस समय मुझे ससुर जी की भी परवाह नहीं थी। ऐसा मौका मुझे फिर कभी मिलने वाला नहीं था। खुदा की नेमत मानकर मैं तो बस सारी हदें तोड़ कर उन दो काले आदमियों के साथ रात भर किसी भी तरह की रंगरलियों के लिये लालियत थी।

 

 

 

मैंने भी अपने चूतड़ उचका कर अपनी मिनी-स्कर्ट टाँगों के नीचे खिसका दी जिसे माईक ने मेरे पैरों से खींच कर एक तरफ उछाल दिया। अब मैं भी सिर्फ हाई-हील सैंडल पहने उन दोनों की तरह बिल्कुल नंगी थी। उनके अज़ीम लौड़ों को निहारते हुए जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने जल्दी से अपने ड्रिंक के दो घूँट पिये और स्टूल से नीचे कूद कर उन दोनों की टाँगों के बीच में घुटने मोड़ कर बैठ गयी और अपने दोनों हाथों में उनके लौड़े थाम लिये। उनके लौड़ों के इर्द-गिर्द मैं अपने हाथ पूरे लपेट नहीं पा रही थी। मैंने कुछ पल दोनों लौड़ों को सहलाया और फिर मुँह खोल कर ओरिजी के लंड के सुपाड़े के इर्द-गिर्द अपने थरथराते होंठ चिपका दिये और उसके सुराख को मैं अपनी जीभ से कुरेदने लगी। मैं वासना के आवेश में बिल्कुल बेहया और अंधी हो गयी थी।

 

 

 

“गॉड! दिस इज़ गो‍इंग टू बी ए डे टू रिमेंबर,” कहते हुए मैंने ओरिजी के लंड का मोटा सुपाड़ा अपने मुँह में भर लिया। मुझे यकीन नहीं था कि मैं उसका दानवी लंड अपने मुँह में ले पाऊँगी लेकिन जब उसका सुपाड़ा मेरे मुँह में दाखिल हुआ तो मुझे अपने जबड़े के लचीलेपन का एहसास हुआ। उसके लंड को ज़्यादा से ज़्यादा अंदर समा लेने के लिये मेरा मुँह चौड़ा खुल गया। अपने मुँह में अंदर धंसते हुए उसके लंड पर अपनी जीभ फिराते हुए मैंने उसके सुपाड़े को गले तक निगल लिया।

 

 

 

“बेऽऽऽबीईईऽऽ!” वो जोर से सिसका और अपने चूतड़ जोर से हिलाते हुए अपना लंड मेरे गले में और अंदर तक ठाँस दिया। इतने पर भी उसका आधे से ज्यादा लंड मेरे मुँह के बाहर था और मेरी दोनों हथेलियाँ लंड के उस हिस्से पर कसी हुई थीं। मैंने अपने गले में थूक गर्राते हुए अपने मुँह से उसके लंड को बाहर निकाला और फिर अपना सिर घुमा कर अपना चेहारा माइक के लंड की तरफ किया। मैं अब अपने होंठ उसके लंड पर चिपका कर उसके हबशी लंड की लंबाई पर फिराती हुई चूसने लगी और फिर होंठ नीचे ले जा कर उसके टट्टे चूसने लगी। उसके टट्टों पर उगे बालों में से पेशाब जैसी तीखी बदबू आ रही थी पर उससे नफ़रत होने की बजाय मेरी वासना और भड़क उठी। पहले मैंने उसके एक टट्टे को अपने मुँह में लेकर चूसा और फिर दूसरे टट्टे को पूरा अपने मुँह में ले कर टॉफी की तरह चूसा।

 

 

 

इसी तरह अदल-बदल कर मैं बारी-बारी से उनके भयानक लौड़े और टट्टे चूसने लगी। मेरी चुलचुलाहट पूरे परवान पर थी और मैं उनके काले मुसल्ली लौड़ों का वीर्य चखने के लिये मचलने लगी थी। “ओह शिट, दिस इज़ अमेज़िंग!” एक दो पल के लिये उनके लौड़ों से अपने होंठ हटा कर मैं सिसकी। “ऑय लव दीज़ कॉक्स... सो बिग... सो थिक.... सो फकिंग ब्लैक... यम्मी!”

 

 

 

“कीप सकिंग! यू स्लट!” माइक ने गुर्राते हुए चाबुक की तरह अपना लौड़ा मेरे गलों पर थपेड़ा ।

 

 

 

मैंने फिर लपकते हुए माइक का काला भुसण्ड अपने मुँह में भर लिया। ओरिजी भी मेरे चेहरे के एक तरफ खड़ा अपना लंड सहलाने लगा क्योंकि अब मैं पूरी शिद्दत से सिर्फ माइक का लौड़ा चूसने में लगी थी। मैं अपनी पूरी काबिलियत से उसके लंड की टोपी अपने गले तक ठाँस कर लंड चूस रही थी और मेरी राल दरिया कि तरह उसके लंड की रॉड पर और मेरे होंथों से मेरे मम्मों पर झरने की तरह बह रही थी। वो दोनों भी मुझसे रंडी जैसा ही सुलूक कर रहे थे और गालियाँ बकने लगे थे। इस समय उत्तेजना में मैं इतनी बेपरवाह और पागल हो गयी थी कि मुझमें और कोठे की राँड में कोइ फर्क नहीं था।

 

 

 

“टेक माय कॉक डाऊन... यू बिच! टेक ऑल माय कॉक!” माइक मेरा सिर पकड़ कर अपने कुल्हे चलाने लगा। लेकिन मैं उसका वो अज़ीम लौड़ा और अंदर नहीं ले सकती थी। पहले ही उसके लंड की फूली हुई टोपी मेरे गले में ठसाठस भरी थी।

 

 

 

“पुश ऑल योर कॉक इन हर थ्रोट!” ओरिजी ने उसे उकसाया। ओरिजी खुद भी अपना लंड मुठिया रहा था।

 

 

 

माइक भी ताव में आ गया और मेरे बालों में अपनी अंगुलियाँ फंसाते हुए मेरे सिर को पीछे से अपने दोनों हाथों में और भी जोर से जकड़ कर अपने लंड को इस कदर झटके से अंदर ठेला कि उसके लंड का सुपाड़ा मेरा गला चीरते हुए मेरे हलक के नीचे उतर गया। मेरी तो साँस ही रुक गयी और मैं छटपटाने लगी लेकिन माइक पर तो जैसे भूत ही सवार था। बेरहमी से जोर-जोर के धक्के मारता हुआ वो पूरा लंड मेरे मुँह ओर हलक में उतारने पर अमादा था। साँस ना ले पाने की वजह से मेरा चेहरा लाल हो गया तो उसने अपना लौड़ा बाहर खींचा। खाँसते हुए गाढ़े थूक का थक्का सा मेरे गले से बाहर उगल पढ़ा।

 

 

 

मैंने साँस ली ही थी कि एक बार फिर मुझे उसकी मुठ्ठियाँ अपनी गर्दन के पीछे बालों पर कसती महसूस हुईं और उसने गालियाँ देते हुए अपना लंड फिर एक ही झटके में मेरे हलक में ठाँस दिया। दो तीन धक्कों में ही उसने पुरा लंड अंदर घुसा दिया। मेरे होंठ अब उसके लंड की जड़ में चिपके थे और मेरी नाक उसकी झाँटों में धँसी हुई थी। फैल कर बाहर को निकली मेरी आँखों से आँसू बहने लगे थे लेकिन मैंने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की। इस दुर्दशा के बावजूद अपने पतन और नीचता का एहसास मेरी चुदास भड़का रहा था। मेरे जिस्म का पोर-पोर अल्लाह-ताला का शुक्रगुज़ार था कि मुझे एक नहीं बल्कि एक साथ दो-दो मुस्टंडे हब्शी लौड़े नसीब हुए। मैं तो ऐसे मोटे लंबे लौड़े को पूरा अपने मुँह में ले कर चूस पाने की काबिलियात पर ही मन ही मन इतरा रही थी। उसका लौड़ा अपने हलक में चूसते हुए साँसे रुकने से अगर मेरी जान भी निकल जाती तो मुझे गम ना होता।

 

 

 

मेरे गले से गोंगियाने की दबी-दबी आवाज़ें निकल रही थीं। माइक के बैल जैसे टट्टे मेरी थुड्डी पर चपटें मार रहे थे। दोनों काले हब्शियों के मुँह से लगातार मस्ती भरी आँहें और गालियाँ फूट रही थीं... “स्लट... फकिंग कॉक सकर! यू हॉर्नी इंडियन बिच! सो फकिंग गुड!” उनकी गालियाँ सुनकर मेरा जोश भी बढ़ता जा रहा था और अब मैं उस लंड की क्रीम चखने के लिये बेकरार होने लगी थी। मुझे ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा और कुछ ही देर में माइक का जिस्म अकड़ता हुआ महसूस हुआ और उसने मेरे बाल खींचते हुए अपने चुतड़ पुरी ताकत से आगे ठेल दिये। उसका लौड़ा पत्थर की तरह सख्त हो कर मेरे हलक में धँस कर धड़कने लगा। फिर उसके लंड में से उसका वीर्य तूफानी दरिया की तरह उमड़-उमड़ कर मेरे हलक में बहने लगा। मैं भी पूरे जोश से उसक वीर्य पीने लगी। उसका वीर्य भी उसके लौड़े के नाप की तरह बेशुमार था। मैंने पहले कभी इतना सारा वीर्य नहीं पीया था। गाढ़ा वीर्य लगातार उसके लंड में से फूट रहा था और मैं उसका मुकाबला नहीं कर पा रही थी। उसका गाढ़ा वीर्य मेरे मुँह में इस कदर भर गया कि मेरे गाल फूल गये और मेरे होंठों से वीर्य बुदबुदाता हुआ बहर निकलने लगा। मैंने अपने एक हाथ को अपने मुँह के नीचे ले जा कर वो वीर्य अपने चुल्लु में भर लिया।

 

 

 

इस दौरान मैं ओरिजी को तो भूल ही गयी थी लेकिन उसकी मस्ती भरी कराहें मेरे कानों में पड़ी तो मैंने देखा कि उसका लंड स्टील के रॉड की तरह सख्त था और उसका फुला हुआ काला सुपाड़ा बहुत ही भयानक लग रहा था। उसकी हालत से मुझे ज़ाहिर हो गया कि उसका वीर्य भी छूटने को था। मुझे थोड़ी मायूसी हुई क्योंकि उस विशाल लौड़े को अपने मुँह में चूस कर उसका रसपान करने का मौका मेरे हाथ से निकल गया था। अचानक बिना सोचे ही मैं चींख पड़ी, “नोऽऽऽ! डोंट कम... डोंट वेस्ट... ऑय वाँट टू ड्रिंक योर क्रीम!

 

 

 

पता नहीं उसने पहले से ही सोच रखा था या मेरी गुहार सुनकर उसने ऐसा किया लेकिन अगले ही पल उसने मेरी कॉकटेल का आधा भरा लंबा ग्लास उठा कर अपने लंड के आगे कर दिया और उसमें अपने वीर्य की पिचकारी छोड़ दी। मैं हैरत में थी कि ये दोनों इंसान थे या जानवर। इतना वीर्य किसी इंसान के टट्टों में कैसे हो सकता है। वो ग्लास कॉकटेल से सिर्फ आधा भरा था और अब उसके ऊपर बाकी ग्लास ओरिजी के दही जैसे गाढ़े वीर्य से लबालब भर गया था और उसके लंड में से अभी भी वीर्य फूट रहा था।

 

 

 

“दिस बिच इज़ अमेज़िंग मैन! शी इज़ सो क्रेज़ी फॉर कम!” मुझे मेरे चुल्लू में भरे वीर्य को जीभ से चाटते देख कर माइक हंसते हुए बोला।

 

 

 

“टेक दिस ग्लास... यू फिलथी स्लट एंड ड्रिंक दिस कॉकटेल!” ओरिजी ने वो ग्लास मेरे आगे किया! मैंने झपट कर वो ग्लास अपने होंठों से लगा लिया और उसका माखनिया वीर्य पीने लगी। थोड़ा सा पीने के बाद मैंने दो उंगलियों से वो गाढ़ा वीर्य कॉकटेल के साथ मिलाया और फिर गटागट पी गयी। ऐसा स्वाद और ऐसी लज़्ज़त कि मैं बयान नहीं कर सकती।

 

 

 

“लुक ऐट दैट! हर कंट इज़ लीकिंग लाइक ए टैप!” ओरिजी बोला तो मैंने नीचे देखा। मेरी चूत से रस टपक-टपक कर मेरे सैंडलों के बीच में ज़मीन पर इकट्ठा हो गया था।

 

 

 

“येस ऑय एम ए होर... फक मी प्लीज़... राइट नॉव...!” मैंने उन दोनों के लौड़े हाथ में ले कर हिलाये जो अभी भी काफी सख्त थे। मेरा सिर नशे और उत्तेजना में घूम रहा था और मैं उनसे चुदने के लिये बेकरार थी। चुदास से मैं पागल हुई जा रही थी।

 

 

 

“श्योर बेब! लैट अस गो टू मॉय रूम!”

 

 

 

“ऑय एम टू ड्रंक टू वॉक! फक मी हि‍अर! नॉव... प्लीज़!” मैं गिड़गिड़ाने लगी और वहीं पसर गयी। सच में मैं नशे में धुत्त थी और दो कदम चल पाने के भी काबिल नहीं थी।

 

 

 

“ऑय कैन पिक यू अप!” ओरिजी ने बड़ी आसानी से मुझे रबड़ की गुड़िया की तरह अपनी गोद में उठा लिया और वो दोनों मुझे लेकर अपने कमरे की ओर चल पड़े।  हम तीनों ही मादरजात नंगे थे। मैंने अपनी बाँहें उसकी गर्दन में लपेटी हुई थीं। मुझे कुछ भी होश नहीं था और मैं उसकी गोद में भी बड़बड़ाती जा रही थी, “फक मी... चोदो मुझे... जस्ट फक मी नॉव!” मुझे अब अपनी ज़ुबान पर बस नहीं था और मैं इंगलिश और हिंदी दोनों ज़ुबानों में बोल रही थी।

 

 

 

दोनों मेरी तड़प देख कर हँस रहे थे। “जस्ट वेट बिच! वी विल फक यू लाइक द स्लट यू आर!”

 

 

 

“वी विल फक यू ऑल नाइट... अन्टिल यू कैंट वॉक!” उनके फिकरे सुनकर मेरी आग और भड़क रही थी और मैं ओरिजी कि गोद में छटपटाने लगी।

 

 

 

उनका कमरा ग्यारहवीं मंज़िल पर था। जब हम लिफ्ट में पहुँचे तो ओरिजी ने मुझे गोद से उतारा और माइक ने मुझे अपनी बाँहों में थाम लिया। ऊँची ऐड़ी के सैंडलों के बावजूद मैं उसकी छाती तक ही पहुँच पा रही थी। उसने मेरी कमर लिफ्ट की दीवार से चिपका दी और मेरे चूतड़ों को पकड़ कर दीवार के सहारे खूँटे की तरह मुझे उठा दिया और मुझे चूमने और सहलाने लगा। मैंने भी मस्ती में अपनी टाँगें उसकी कमर पर कैंची की तरह कस दीं और उससे चिपक गयी। जब लिफ्ट का दरवाज़ा खुला तो माइक  मुझे वैसे ही उठाये हुए अपने कमरे तक ले गया।

 

 

 

कमरे में पहुँचते ही उसने मुझे बिस्तर पर पटक दिया। सिर्फ सैंडल पहने बिल्कुल नंगी मैं उनके बिस्तर पर टाँगें फैलाये चुदने के लिये तड़प रही थी। अपनी भीगी चूत पर हाथ फिराते हुए मैंने फिर से गुहार की, “प्लीज़ फक मी नॉव! ऑय वांट योर कॉक्स! फक मी लाइक योर बिच!” उनके भयानक हब्शी लौड़ों से चुदने की हवस में मैं इतनी गिर गयी थी कि मैं गिड़गिड़ाते हुए उनसे चुदने की भीख माँग रही थी। मेरे अंदर कोई शरम या गैरत नाम की चीज़ बाकी नहीं रह गयी थी।

 

 

 

“लुक ऐट हर माइक! शी इज़ सो हंगरी फ़ोर आवर ब्लैक कॉक्स!” मेरी हालत पर ओरिज़ी हंसते हुए बोला।

 

 

 

“प्लीज़... ऑय विल डू एनीथिंग यू वांट! जस्ट फक मी!” मैं तड़पते हुए फिर से गिड़गिड़ाने लगी।

 

 

 

एक ग्लास पानी और दो अलग-अलग रंग की गोलियाँ मेरी तरफ बढ़ाते हुए माइक बोला, “ओके स्लट! टेक दीज़ टेबलेट्स.... दैन ओनली यू विल बी एबल टू इम्जॉय एंड हैंडल दीज़ ग्रैंड कॉक्स!”

 

 

 

मैंने बे-हिचक वो दोनों गोलियाँ पानी के साथ निगल लीं! मैं नशे में चूर थी लेकिन इतना तो मैं समझ सकती थी कि ये कोई नशीली ड्रग की गोलियाँ हैं लेकिन उस समय तो उनके हलब्बी लौड़ों से चुदने के बदले में मैं ज़हर भी हंसते-हंसते पी जाती।

 

 

 

“गुड गर्ल! नॉव गैट ऑन योर नीज़ एंड सक दीज़ बिग कॉक्स बैक टू लाइफ!” दोनों अपने लौड़े झुलाते हुए मुझे ललचाने लगे। हालांकि मेरी चुत इस समय उनके लौड़ों के लिये बिलबिला रही थी लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था। उनके लौड़ों के लिये मैं बिस्तर से जैसे ही उतरी तो वहीं लुढ़क गयी। “ओहो!” वो दोनों हंसे तो मैं भी उनके साथ अपनी हालत पर खिलखिला कर हंस पड़ी। एक तो बेहिसाब पी हुई शराब का नशा और साथ में पाँच इंच उँची ऐड़ी के सैंडल। नशीली गोलियों का भी असर होने लगा था शायद । हकिकत में तो अपनी हवस में मैं कितनी नीचे गिर गयी थी लेकिन उस समय मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं बादलों में उड़ रही हूँ! सारा माहौल गुलाबी-गुलाबी सा महसूस हो रहा था।

 

 

 

मैं नागीन की तरह सरकते हुए उन दोनों के पास पहुँची और उनके लौड़ों को अपने हाथों लेकर सहलाने लगी। मेरे मुँह में फिर पानी भर आया और मैं बारी-बारी से उनके लौड़े चूसने और मुठियाने लगी। कुछ ही देर में उनके लौड़े फौलद की तरह सख्त हो गये और वो दोनों बेरहमी से बारी-बारी से मेरे हलक में अपने लौड़े ठूँसते हुए धक्के मार रहे थे।

 

 

 

“ ऑय थिंक शी नीड्स टू बी फक्ड नॉव!” माइक बोला।

 

 

 

“यै! टाइम टू शो हर द मैजिक ऑफ ब्लैक कॉक्स!” मेरे मुँह में से अपना मूसल लौड़ा निकालते हुए ओरिजी बोला। मेरी ठुड्डी से राल नीचे टपक रही थी और उनके लौड़े भी मेरे थूक से तरबतर सने हुए दमक रहे थे।

 

 

 

“येस! येस! ऊऊहह... येस... प्लीज़... ओरिजी... फक मी... काले लौड़े.... मेरी चूत... प्लीज़... योर बिग कॉक्स... चोदो... !” नशे और उत्तेजना में मेरी ज़ुबान बहक रही थी। मुझे होश नहीं था कि मैं क्या बोल रही थी। बस इतनी उम्मीद कर रही कि मेरे अल्फाज़ों का मतलब वो शायद मुझसे बेहतर समझ पा रहे होंगे।

 

 

 

दोनों ने अपनी ज़ुबान में एक दूसरे से कुछ कहा और फिर हंसते हुए हाथ उठा कर हवा में एक दूसरे को ताली दी।

 

 ओरिजी ने मुझे मेरे पैरों पर खड़ा किया तो मैं भी नशे में अपनी बाँहें उठा कर उसकी गर्दन में डाल कर उससे सट गयी। मेरी कमर में अपनी बाँहें डाले हुए वो मुझे ढकेलते हुए पीछे एक डेस्क तक ले गया और मेरे चूतड़ डेस्क के किनारे टिका कर मुझे पीछे झुका दिया। अपनी एक बाँह उसकी गर्दन से निकाल कर मुझे सहारे के लिये अपना हाथ डेस्क पर पीछे टिकाना पड़ा। मैं डेस्क के किनारे चूतड टिकाये टाँगें लटका कर बैठी थी। मेरे हाई हील के सैंडलों और ज़मीन के बीच करीब एक फुट का फाँसला था। डेस्क की ऊँचाई बिल्कुल ठीक थी क्योंकि ओरिजी का शानदार लौड़ा बिल्कुल मेरी चूत के लेवल पर था।

 

 

 

मैंने नज़रें उठा कर ओरिजी की वासना भरी आँखों में देखा और फिर थोड़ी दूर खड़े माइक को देखा। उसके चेहरे पर भी कमीनी सी मुस्कान थी। मुझे एहसास हो गया कि आज की रात मेरे लिये बहुत ही यादगार बनने वाली है। ओरिजी ने मुझे डेस्क पर धक्का दे कर पीछे लिटा दिया और मेरी टाँगें चौड़ी करके मेरी चूत पर अपने लौड़े का सेब जैसा सुपाड़ा रगड़ने लगा। अपनी चूत में ऐसी आग, ऐसी तड़प मैंने पहले कभी महसुस नहीं की थी। उसका लंड अंदर लेने के लिये मेरी चूत तड़प रही थी लेकिन वो मेरी चूत पर अपने लंड का टोपा रगड़-रगड़ कर मुझे तड़पा रहा था। मुझ से रहा नहीं गया तो मैं दाँत भींच कर तड़पते हुए चिल्ला पड़ी। “ऊँऊँहह! इज़ दैट ऑल यू कैन डू विद इट? भेनचोद! पुट इट इन मी! चोद मुझे... बिग मैन! फक मी! अल्लाह के लिये! फक मी गुड!” मैंने अपनी टाँगें उसकी कमर पर कस दीं।

 

 

 

“आर यू रैडी बिच!” ओरिजी बोला।

 

 

 

“येस्स! हरीऽऽऽ अप बॉस्टर्ड!” मैं बेहयाई से अपने चूतड़ उचकाते हुए दहाड़ी। मैंने अपनी चूत में उसके लंड का मोटा सुपाड़ा घुसता हुआ महसूस किया। ओरिजी ने भी कोई नरमी नहीं बरती और पुरी बेरहमी से अपना मोटा सुपाड़ा एक झटके में अंडर ठाँस दिया। मेरी तो साँस ही रुक गयी। दर्द से तड़प कर मेरी बहुत जोर से चींख निकल गयी। “आआआआईईईईईईईई मरऽऽऽऽ गयीऽऽऽऽ!” मुझे लगा जैसे उसका लंड मुझे चीर ही डालेगा। “नोऽऽऽऽऽ... प्लीईऽऽऽज़ऽऽ! स्टॉप!” मैं दर्द से बुरी तरह बिलबिला रही थी। इस कहानी का मूल शीर्षक "मैं हसीना गज़ब की है!"

 

 

 

“बिच इज़ सो टाइट!” ओरिजी जोर लगाते हुए फुफकारा। मुझे तब एहसास हुआ कि अभी तो सिर्फ सुपाड़ा ही मेरी चूत में दाखिल हुआ था। ओरिजी का लौड़ा बरछे की तरह मेरी चूत चीरते हुए अंदर घुसने लगा तो मैं दर्द के मारे फिर चींखने चिल्लाने लगी। इतना दर्द तो पहली बार अपनी सील तुड़वाते हुए भी नहीं हुआ था। मेरे चींखने - चिल्लाने का ओरिजी पर कुछ असर नहीं हुआ और उसने बेरहमी से पुरी ताकत लगाकर अपना लंड झटके से चूत की गहराइयों में ढकेल दिया। मुझे तो चूत के चिथड़े उड़ते महसूस होने लगे। उसके लंड का सुपाड़ा अब मेरे गर्भाशय पर धक्के मार रहा था। “आआहहह स्टॉपऽऽऽ हराऽऽऽमीऽऽऽ यू आर टियरिंग मी अप!” दर्द की लहरें मेरे पूरे जिस्म में दौड़ने लगीं। मेरे पसीने छूट गये और दिमाग सुन्न पड़ गया। इस कहानी की लेखिका शहनाज़ खान है।

 

 

 

“लुक ऐट हर कंट! शी टुक द होल डिक! शी इज़ ए फकिंग हॉट बिच!” मेरे कानों में माइक के चहकने की आवाज़ आयी तो मुझे पता चला कि ओरिजी का पुरा लंड मेरी छिनाल चूत में दाखिल हो चुका है।

 

 

 

“शी इज़ अमेज़िंग मैन! नॉट मैनी वुमन कैन टेक अ कॉक दैट साइज़!” ओरिजी हाँफते हुए बोला। इतनी तकलीफ के बावजूद मैं अपनी तारीफ सुनकर मन ही मन इठला गयी। अपनी चूत की काबिलयत पर मेरा रोम-रोम फख्र से भर गया। ज़िंदगी में पहली बार मेरी चूत किसी लौड़े से इस कदर ठसाठस भरी थी । अचानक मुझे उस दर्द में मज़ा आने लगा और मेरी चींखें अब सुबकियों और सिसकियों में तबदील होने लगीं थीं। दर्द तो अब भी बहुत था पर अब उसमें मिठास सी घुल गयी थी और मेरी चूत उस हब्शी लौड़े पर कसमसाने लगी।

 

 

 

“येस्स! फक मी प्लीज़! ऑय लव योर बिग कॉक!” मैं फुसफुसायी और अपनी एक टाँग मोड़ कर अपना एक सैंडल उस डेस्क के कोने पर टिका दिया और दूसरी टाँग उसकी कमर में लपेट दी!

 

 

 

“यू आर अ हॉरनी स्लट!” ओरिजी हंसा और फिर दनादन धक्के लगाने लगा। करीब आधे से ज्यादा लौड़ा बाहर खींच-खींच कर बेरहमी से अंदर ठोक रहा था। “ओ‍ओहहह ओहह टू बिग... प्लीज़... मर गयी... येस्स...!” जानवरों की तरह बेरहमी से चुदते हुए मुझे भी निहायत मज़ा आने लगा था। अपना हाई हील सैंडल किसी तरह डेस्क के किनारे पर टिकाये मैं उसके धक्के झेलते हुए खुद भी अपने चूतड़ हिलाते डुलाते लगातार “ओह! ओह! ओह! ऊँह! आह! आँह!” आलाप रही थी। उसके हथोड़े जैसे लौड़े पर चिपकी हुई मेरी चूत बार-बार पानी छोड़ने लगी। अपने चूतड़ों पर उसके बैल जैसे टट्टों के थपेड़े मेरी चुदास में इज़ाफा कर रहे थे और मैं नशे में मस्ती से सिसकते, चींखते हुए अपने मम्मे अपने हाथों से भींचते हुए मज़े ले रही थी। इस कहानी का मूल शीर्षक "मैं हसीना गज़ब की है!"

 

 

 

“डू यू थिंक शी कैन टेक मी इन हर शिट पाईप!” माइक की आवाज़ एक बार फिर मेरे कानों में पड़ी। अपनी मस्ती में उसे तो भूल ही गयी थी। “व्हॉय नॉट! लैट्स डू इट! फक हर इन बोथ होल्स टूगेदर! ऑय एम श्योर हर ऐस-होल विल लव योर बिग कॉक!” ओरिजी बोलते हुए मुझ पर झुक गया और मुझे चूमते हुए मेरी कमर में अपनी बाँहें डाल कर मेरी चूत में अपना लौड़ा गड़ाये हुए ही मुझे गोद में उठा लिया। एक तो नशे में धुत्त और साथ ही इतनी मस्त चुदाई की धुन्न में मैं उनकी बातों की तरफ ज्यादा तवज्जो नहीं दे रही थी इसलिये उनके ज़ालिम इरादे एक दम से समझ नहीं पायी। इस कहानी की लेखिका शहनाज़ खान है।

 

 

 

खुद-ब-खुद मेरी बाँहें भी उसकी गर्दन में और दोनों टाँगें कैंची की तरह उसकी कमर में कस गयीं। ओरिजी ने खड़े-खड़े ही मेरे चूतड़ों को पकड़ कर अपने लौड़े पर मुझे चार-पाँच बार ऊपर नीचे उछालते हुए चोदा। फिर वो वैसे ही मुझे गोद में लिये हुए और चूत में लौड़ा गड़ाये हुए अचानक से कार्पेट पर नीचे बैठते हुए लेट गया। उसकी इस अचानक हरकत से मैं चिहुंक उठी। अब मैं उसके ऊपर थी और वो मेरी पतली कमर अपने बड़े हाथों में पकड़े हुए था और मेरे मम्मे उसके चेहरे के ऊपर लटकते हुए झूल रहे थे। इस पोज़िशन में उसका तमाम लौड़ा मेरी गरम चूत में खचाखच धंस गया।

 

 

 

“व्हॉट से मैन? हॉव डज़ हर एसहोल लुक?” ओरिजी ने नीचे से अपने चूतड़ ऊपर उछालते हुए माइक से पूछा तो मेरे हलक से जोरदार आह निकल गयी।

 

 

 

“ब्यूटीफुल.... रियल जेम!” माइक बोलते हुए मेरे पीछे झुक गया और मेरे चूतड़ों पर हाथ फिराने लगा, “शी विल लव मॉय कॉक इन हर एस होल!” उसकी बात सुनकर मेरी तो साँस ही रुक गयी और एक ठंडी सी लहर मेरे जिस्म में दौड़ गयी। “नोऽऽऽऽऽऽऽ प्लीऽऽऽज़ नहीं!” मैं जोर से चींख पड़ी। मुझे वही रात याद आ गयी जब रस्तोगी और चिन्नास्वामी ने अपने मोटे-मोटे लौड़े एक साथ मेरी चूत और गाँड में पेल-पेल कर पूरी रात बेरहमी से मेरी दोहरी चुदाई करके मेरा बैंड बजा दिया था। ओरिजी और माईक के हब्शी लौड़ों के सामने तो रस्तोगी और चिन्नास्वामी के लौड़े तो बिल्कुल चूहे जैसे थे। मैं मानती हूँ कि कुछ देर पहले मैं इन हब्शियों के भुसण्ड लौड़ों से चुदने के लिये मरी जा रही थी लेकिन इतने बड़े लौड़े से गाँड मरवाने का तो मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी। ये दोनों मरदूद तो एक साथ मेरी चूत और गाँड मारने की सोच रहे थे। इस कहानी का मूल शीर्षक "मैं हसीना गज़ब की है!"

 

 

 

“डोंट वरी बेब! यू विल लव इट एंड थैंक अस फोर वंडरफुल एक्सपीरीयंस!” माइक हंसते हुए बोला और मेरे चूतड़ों पर अपने भुसण्ड लौड़े का सुपाड़ा फिराने लगा।

 

 

 

“नो! नो! आँआँहहह!! नहींऽऽऽऽ! प्लीज़ऽऽऽऽ! ऊँऊँममऽऽ! यू विल स्प्लिट मी! चिठड़े हो जायेंगे मेरे! ऊऊऊईईईई!! यू आर ठू बिग!” मैं गिड़गिड़ाते हुए रोने लगी लेकिन साथ-साथ मेरे मुँह से सिसकारियाँ भी नकल रही थी। इस कहानी की लेखिका शह नाज़-खान है।

 

 

 

“कम ऑन मैन! दिस स्लट कैन टेक ऑल द कॉक वी कैन गिव हर! शी इज़ फकिंग मॉय कॉक इन हर कंट लाइक अ बिच इन हीट!” ओरिजी ने माइक को फिर उकसाया। ओरिजी गलत नहीं कह रहा था। वाकय में मैं तो अपने चूतड़ हिला-हिला कर ओरिजी के लौड़े का मज़ा ले रही थी। ओरिजी अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर मेरी चुत में अपना लौड़ा नीचे से ठोक ही रहा था और उसने कस कर मेरी कमर भी पकड़ी हुई थी। इस वजह से मैं उठ भी नहीं सकती थी और सच कहूँ तो शायद मैंने उठने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि मेरी बे-गैरत चूत तो उस हब्शी लौड़े की चुदाई का जम कर मज़ा ले रही थी और कईं बार झड़ चुकी थी।

 

 

 

मेरा खौफ, मेरा गिड़गिड़ाना तो शायद ऊपरी ही था क्योंकि माइक को रोकने के लिये जिस्मानी तौर पर मैं कोई खास कोशिश नहीं कर रही थी। अपने साथ ज़िल्लत भरा रंडियों जैसा सलूक और बे-रहम दर्द भरी चुदाई में मुझे इस कदर मज़ा आ रहा था कि मैं उन जानवरों जैसे लौड़ों की हवस में कुछ भी सहने और कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थी। नशे की बदहवासी और उन लौड़ों से चुदने की हवस में कुछ सोचने-समझने की ताकत बाकी नहीं रह गयी थी। बस किसी राँड कुत्तिया की तरह मैं अपनी गंदी चुदासी हवस पर अमल कर रही थी।

 

 

 

ओरिजी ने मेरी कमर में अपनी बाँहें डाल कर कस के पकड़ ली और नीचे से अपने चूतड़ उचका कर मेरी ठंसाठस भरी चूत में अपना लौड़ा मेरी आँतड़ियों तक ठोक दिया। पीछे से माइक ने भी मुझे बड़ी बेरहमी से जकड़ रखा था और मैं पूरी तरह उन दोनों गिरफ्त में थी। अगले ही पल मुझे अपनी गाँड के छेद पर उसके लंड के मोटे सुपाड़े का प्रेशर महसूस हुआ। मेरी गाँड का छेद माइक के लौड़े के लिये बिल्कुल मुनासिब नहीं था और माइक को अपना लौड़ा मेरी सूखी गाँड में घुसाने में दिक्कत हो रही थी। लेकिन उसने हार नहीं मानी और पूरी ताकत से उसने अपने लंड का सुपाड़ा मेरे छोटे से छेद पर दबाना ज़ारी रखा और आखिर में उसे कामयाबी मिल ही गयी। उसका सुपाड़ा  मेरी सूखी गाँड में अंदर घुसना शुरू हुआ तो दर्द से मेरी जान निकल गयी। मैं छटपटाते हुए चिल्लाने लगी। “आआआआआँआँऊँऊँऽऽऽ हाऽऽयय खुदाऽऽ केऽऽऽ लिये! प्लीज़ऽऽऽ स्टॉऽऽपऽऽ... नहींऽऽऽ।” मेरी चींख कमरे में गूँज उठी। मुझे लगा जैसे उसके लौड़े ने मुझे दो हिस्सों में चीर दिया हो। दर्द की इंतहाई ने मेरे होश उड़ा दिये और मैं दर्द भरी सुबकियों के साथ घुटी-घुटी सी साँसें लेने लगी।

 

 

 

“स्टॉप इट.... रुक जाओ.... प्लीज़.... यू आर किलिंग मी...  नोऽऽऽ...” मैं भर्राई आवाज़ में मिन्नतें करने लगी लेकिन मेरी सुबकियों और दर्द भरी कराहों में मेरी आवाज़ शायद ही सुनायी दे रही थी। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन उन दोनों को मेरी हालत पर ज़रा भी तरस नहीं आ रहा था।

 

 

 

मैं तो बेहाल होकर नीचे ओरिजी के सिने पर ढेर हो गयी। ओरिजी ने नीचे से धक्के मारने बंद कर दिये थे पर उसका घोड़े जैसा एक फुट लंबा खतरनाक लौड़ा पूरा का पुरा मेरी चूत में गढ़ा हुआ था। अब मेरे मम्मे ओरिजी के जिस्म पर दबे हुए थे और शायद मेरी छटपटाहट कंट्रोल करने के लिये उसने अपनी बाँहें मेरी कमर के पीछे कस दीं और माइक को पूरा लौड़ा मेरी बेचारी गाँड में ठेलने के लिये उकसाने लगा। माइक ने कुछ पल तो अपना गेंद जैसा सुपाड़ा मेरी गाँड में जमाये रखा और फिर धक्का देते हुए जोर लगाकर अपना खंबे जैसा फौलादी लौड़ा मेरी कसी हुई संकरी गाँड में घुसेड़ना शुरू किया। उसने पूरी बेरहमी से जोर लगाकर मेरी गाँड की नाज़ुक दीवारों को घिसकर झुलसाते हुए अपना वहशी लौड़ा जड़ तक मेरी गाँड की दर्द से बिलबिलाती गहराइयों में गाड़ ही दिया।

 

 

 

उन वहशी दरिंदों के बीच में सैंडविच की तरह दबी हुई मैं कराहने और चिल्लाने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी। “ऊँऊँऊँऽऽऽआआआँईईईऽऽऽऽ!... बहन के लौड़ों...मार डाला साले... मेरी गाँड फाड़ डाली.... हायऽऽऽ मेरे अल्लाह.... आँआँईईईई!” अपने नाखुन ओरिजी के कंधों के पास कार्पेट में गड़ा कर खरोंचते हुए मैं जोर-जोर से चिल्लाने चींखने लगी और मेरे मुँह से अनाप-शनाप गालियाँ निकलने लगीं! इससे पहले इस तरह के गंदे अल्फाज़ और गालियाँ मैंने सिर्फ सुनी पढ़ीं ही थीं। वो तो खुशकिस्मती से मैंने इतनी दारू पी रखी थी और उन दोनों हब्शियों ने मुझे नशीली गोलियाँ भी खिल दीं थीं। नशे में चूर होने की वजह से ही मैं किसी तरह ये दर्द झेल पा रही थी नहीं तो यकीनन दम तोड़ चुकी होती।

 

 

 

“होली शिट! ऑय कैंट बिलीव दिस! दिस स्लट टुक मॉय फुल कॉक इन हर ऐस! शी इज़ सो टाईट... हर ऐस फील्स सो... सो फकिंग गुड! नेवर वाज़ एबल टू फक एन ऐस बिफोर... नो गर्ल कुड एवर टेक इट!” माइक हाँफते हुए बड़बड़ाया। इस कहानी का मूल शीर्षक "मैं हसीना गज़ब की है!"

 

 

 

“गो ऑन माइक! फक हर ऐस रियली गुड एंड हार्ड...! लाइक यू ऑय हैव नेवर फक्ड एनी ऐस बिफोर....आलवेज़ वांटेड टू.... टुडे ऑय एम गोना फक हर ऐस ठू!”

 

 

 

कोई ताज्जुब की बात नहीं थी कि उन हब्शियों ने पहले कभी किसी की गाँड नहीं मारी थी। कोई रंडी भी उनके खौफनाक लौड़ों से गाँड मरवाने की हिम्मत नहीं करेगी और चूत चुदवाने में भी सौ बार सोचेगी! वो तो मैं ही उनके हैरत-अंगेज़ लौड़े देखकर अपनी निहायत हवस के आगे बेबस पड़ गयी थी और बदहवासी में इस वहशियाना चुदाई में शरीक हो गयी। कुछ देर पहले मैं उनके लौड़ों से चुदने के लिये मरी जा रही थी और कोई भी कीमत अदा करने को तैयार थी और खुद को दुनिया की सबसे खुशकिस्मत औरत समझ कर खुदा का शुक्रिया अदा कर रही थी। लेकिन गाँड में इतना बड़ा लौड़ा घुसे होने से अब दर्द के मारे मेरी जान निकली जा रही थी। इतना दर्द तो मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं झेला था। उधर चूत में भी उतना ही बड़ा लौड़ा ठुका हुआ था और मुझे अपनी चूत और गाँड एक होती महसुस हो रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे दोनों लौड़े मेरे अंदर एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे।इस कहानी की लेखिका शह नाज़-खान है।

 

 

 

ओरिजी की बात सुनकर माइक ने हंसते हुए कुछ कहा जो मैं अपनी चींखों की वजह से सुन नहीं सकी। अगले ही पल मुझे माइक का लौड़ा अपनी गाँड में धीरे से बाहर फिसलता हुआ महसूस हुआ। मेरी गाँड की सूखी दीवारें फैल कर उसके बाहर खिंचते हुए लौड़े पर जकड़ी जा रही थीं और मैं फिर एक बार दर्द से बिलबिला उठी। जब उसके लौड़े का मोटा सुपाड़ा ही मेरी गाँड के अंदर रह गया तो उसने एक ही झटके में जोर से पूरा लौड़ा एक बार फिर मेरी कसी हुई गाँड में ठोक दिया। इसी तरह माइक ने चार-पाँच बार अपना लौड़ा मेरी गाँड में अंदर बाहर ठोका। हर बार दर्द से तड़प कर मेरी चींखें निकल जाती थीं।

 

 

 

“हे मैन! लेट्स गो! दिस बिच इज़ रैडी फोर डबल-फकिंग ऑफ हर लाइफ!” माइक हाँफते हुए ओरिजी से बोला और अगले ही पल ओरिजी का लौड़ा भी मेरी चूत में हिलता हुआ महसूस हुआ।

 

 

 

“ओहहह... यू...यू आर गोइंग टू... टू किल मी बिटवीन यू...! आआआईईईऽऽऽ!” मैं तड़प कर कराह उठी। ओरिजी अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर जोर-जोर से मेरी चूत में ठोकने लगा और मेरे पीछे माइक का लौड़ा भी मेरी गाँड की गहराइयों में धक्के मारने लगा। मैं दर्द से लगातर कराहने और सुबकने लगी और मुझे एक बार फिर अपनी ज़िल्लत और तकलीफ में अजीब सा मज़ा आने लगा। दोनों बहुत ही बेरहमी से एक साथ अपने फौलादी लौड़े मेरी चूत और गाँड में अंदर-बाहर पेल रहे थे। । इतने मोटे-मोटे खुंखार लौड़ों की दोहरी वहशियाना चुदाई से मेरी हवस एक बार फिर भड़क उठी और मेरे दर्द और तकलीफ के एहसास पर हावी हो गयी। मेरी चूत और गाँड दोनों हद से ज्यादा इस कदर फैली हुई थीं कि ऐसा लग रहा था जैसे दोनों मिल कर एक हो गयी हों। दर्द इतना भयानक था कि मैं बयान नहीं कर सकती लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों- यही बेतहाशा दर्द मेरी मस्ती को बढ़ा रहा था। जब भी दर्दनाक लहर मेरे जिस्म में फूटती तो साथ ही मस्ती भरी मिठी सी लहर भी तमाम जिस्म में दौड़ जाती। दर्द ओर मस्ती के दोनों एहसास जैसे पिघल कर एक साथ धड़कते और फिर जुदा होते और फिर एक बार दोनों एहसास आपस में पिघल कर मिल जाते। बहुत ही हैरत अंगेज़ एहसास था और मैंने खुद को उस दोहरी वहशियाना चुदाई के हवाले कर दिया। कुल मिलाकर मेरी चुदास भड़क उठी थी और मेरी दर्द और मस्ती भरी मिलीजुली चींखें पूरे कमरे में गूँज रही थीं। इस कहानी की लेखिका शह नाज़-खान है।

 

 

 

मेरी आग इतनी भड़क चुकी थी कि मुझे लगा कि चुदाई में कभी इससे ज्यादा मज़ा मिलना मुमकिन नहीं था। मेरी थरथराती चूत ओरिजी के लौड़े को जकड़ कर चसक रही थी और माइक के लंबे -लंबे गाँड-फाड़ू धक्के झेलते हुए मेरे चूतड़ थिरकने लगे थे। उन दोनों के बीच दबी होने की वजह से मैं ज्यादा हिलडुल नहीं सकती थी लेकिन मस्ती में फिर भी अपने चूतड़ जोर -जोर से हिलाते हुए मज़े लेने लगी। अपनी गाँड में माइक के लौड़े के झटकों के जवाब में मैं अपने चुतड़ पीछे ठेल रही थी तो साथ ही अपनी चूत नीचे गड़ाते हुए नीचे से ओरिजी के लौड़े के धक्के झेल रही थी।

 

 

 

“ऊऊऊहहह... फक! दिस इज़ अमेज़िंग! चोदो! जोर-जोर से! हरामियों! बास्टर्ड्स! आआआँआँईईईईई,” मैं चींखते हुए झड़ने लगी। मेरा जिस्म ऐंठ कर बुरी तरह झनझना गया और मस्ती से मैं बेहोश होते-होते रह गयी। ज़िंदगी में मैं कभी इस कदर नहीं झड़ी थी। ऐसा लगा जैसा मेरी जिस्म में निहायत मस्ती भरा एटम बम फट गया हो जो मेरी जान ही ले लेगा।

 

 

 

उन दोनों ने बेदर्दी से मेरी चुदाई ज़री रखी। दोनों एक लय में मुझे चोद रहे थे। एक लौड़ा अंदर ठोकता तो दूसरा लौड़ा बाहर निकलता। “ऑय लव इट! लव इट! ओहह येससऽऽऽ! चोदो! जोर सेऽऽ! हार्डरऽऽ!” मेरे मुँह से सिसकरियों के साथ-साथ वाहियात अलफाज़ फूटने लगे। उन दोनों के बीच में सैंडविच बन कर अपनी गाँड और चूत में एक साथ उनके जानवरों जैसे मोटे-मोटे लौड़ों से चुदवाते हुए मुझे फक़त जन्नत में होने का एहसास हो रहा था। पूरा कमरा हमारी चुदाई की आवाज़ों और मेरी सिसकियों, कराहों, चींखों से गूँज रहा था। उन दोनों लौड़ों में मैं कोई फर्क नहीं कर पा रही थी। मेरी चूत का दाना इस कदर फूल कर कड़क हो गया था जैसे उसमें से लंड की तरह वीर्य फूट पड़ेगा। इतना खालिस, पाकिज़ा और तसल्ली भरा कमाल का मज़ा मैंने ज़िंदगी में पहले कभी महसुस नहीं किया था। मेरी चूत बार-बार झड़ रही थी जैसे कि रिकोर्ड कायम करना हो!इस कहानी की लेखिका शह नाज़-खान है।

 

 

 

“ऊँहह... ऊँहह ! फकऽऽ! बिच!” वे दोनों हाँफते और गुर्राते हुए पूरे जोश में मुझे दनादन चोद रहे थे। उनके लौड़े अगर घोड़ों जैसे थे तो उनमें ताकत भी घोड़ों वाली ही थी। मैं भी लगातार जोर-जोर से कराह रही थी “ओहहह! आआआह! ऊँऊँआआआ! ऊँहहह! फक मी! फक मी! ऑय... ऑय... ऑय.... कमिंग अगेन! ओहहह! येस्स्स! आआह! आआह! हार्डर! मार डालो! फाड़ डालो! आआआआईईईई! हाऽऽय! फक मी!” उनके हाँफने और गुर्राने की आवाज़ें मेरी कराहों और चींखों में दब कर रह गयी थीं। जब भी मेरी चूत अपना रस छोड़ती तो मैं और जोर से चिल्ला पड़ती थी।

 

 

 

मुझे ओरिजी के धक्के अचानक पहले से ज्यादा जोरदार होते हुए महसूस हुए और साथ ही उसका जिस्म भी ऐंठता हुआ महसूस हुआ। उसने मेरी कमर में अपनी बाँहें और भी जोर से कस दीं और अपने चूतड़ उठा कर अपना तमाम लौड़ा बुरी तरह से मेरी चूत में ऊपर तक ठाँस दिया। उसका लौड़ा बिल्कुल पत्थर की तरह सख्त था। “टेक इट... बिच... मॉय कम!” ठिनठिनाते हुए उसने मेरी चूत में उबलता हुआ वीर्य छोड़ना शुरू कर दिया।

 

 

 

“आआआँईई  येस्सऽऽऽऽ ओहहह ओंओंओं! कीप... कीप कमिंग!” मैं भी चींख पड़ी। मेरी चूत उसके पत्थर जैसे लंड पर कस गयी और उसे निचोड़ते हुए मोम की तरह पिघलते हुए झड़ने लगी। अपना लंड जोर-जोर से मेरी चूत में चोदते हुए वो लगातार अपने वीर्य की पिचकारियाँ मेरी चूत में दागने लगा।

 

 

 

इसी दौरान मेरी गाँड में माइक के धक्कों की लय भी गड़बड़ा गयी। “मैन.. ओह मैन...” अपने जबड़े भींचते हुए माइक चिल्लाया और पीछे सेर मेरे कंधों में अपने हाथ गड़ाते हुए एक जोरदार शॉट लगाकर पूरा लंड अंदर ठाँस दिया। उसका पौलादी लौड़ा मुझे अपनी आंतड़ियों में फूलता हुआ महसूस हुआ। अगले ही पल गरम-गरम वीर्य सैलाब की तरह मेरी गाँड और आँतड़ियों में फूट-फूट कर बहने लगा। इस कहानी का मूल शीर्षक "मैं हसीना गज़ब की है!"

 

 

 

ओरिजी का लौड़ा मेरी चूत में इस कदर झड़ रहा था कि मेरी चूत और बच्चेदानी में बाढ़ सी आ गयी। मेरी चूत की गहराइयों में उसके वीर्य की हर पिचकारी के साथ थोड़ा वीर्य मेरे चूत-रस के साथ मिलकर मेरी चूत में से झाग बनकर बहते हुए ओरिजी की जाँघों को भिगोने लगा। उसी तरह माइक का लौड़ा मेरी गाँड में लगातार झड़-झड़ कर सैलाब की तरह गरम-गरम वीर्य बहा रहा था। मेरी गाँड उसके मोटे लौड़े पर इस कदर जकड़ी हुई थी कि वीर्य बाहर नहीं बह सकता था। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि किसी इंसानी लौड़े से दोबारा इतनी जल्दी इतना ससारा वीर्य भी झड़ सकता है! अभी घंटे भर पहले ही तो इन दोनों लौड़ों ने मेरे मुँह में वीर्य का सैलाबी दरिया बहाया था।

 

 

 

उनके साथ-साथ मैं भी इस दौरान बार-बार ऐंठती और कुलबुलाती और थरथराती हुई झड़े जा रही थी। मेरी चूत और गाँड की दीवारें धड़कती और सिकुड़ती हुई उनके लौड़ों पर जकड़ रही थीं। उस वक्त अपनी कुचली छिली हुई चूत और गाँड में भरे हुए उनके फुट-फुट भर लंबे लौड़े और उनमें से गरम-गरम वीर्य के उमड़ते सैलाबों के अलावा मुझे और कुछ होश, कुछ एहसास नहीं था। ये मेरी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन और अनोखा एहसास था। इससे बेहतर कोई एहसास मुमकिन ही नहीं था। मेरा दिमाग में मस्ती भरे बम फट रहे थे। मैं तो सिर से पैर तक बिल्कुल निहाल हो गयी थी। इस कहानी की लेखिका शह नाज़-खान है।

 

 

 

उन दोनों के लौड़ों का झड़ना बंद हुआ लेकिन उनके लौड़ों के साइज़ और अकड़ाहट में मुझे कोई फर्क महसूस नहीं हुआ। माइक ने जब अपना लौड़ा बाहर खींचा तो उसका सुपाड़ा मेरी गाँड के छेद को बेदर्दी से फैलाते हुए अपने साथ बाहर खींचता हुआ निकला। मेरे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गयी और मैं “ओहहहह” करके सिसक पड़ी। ओरिजी ने मुझे अपने ऊपर से हटाते हुए अपना लौड़ा मेरी चूत में से खींचा तो मैं वहीं ज़मीन पर पसर गयी और अपनी साँसें काबू करने लगी।

 

 

 

मेरी चूत और गाँड में से बहुत सारा रस मुझे फर्श पर बहते हुए महसूस हुआ। मैंने अपना एक हाथ अपनी टाँगों के बीच में नीचे ले जाकर अपनी चूत और गाँड पर फिराया तो मैं हैरान रह गयी। मेरे दोनों छेद, खासकर के, मेरी गाँड अभी भी चौड़ी होकर फैली हुई थी।

 

 

 

“मैन! ऑय कैंट बिलीव दिस! शी इज़ अ डायनामाइट! शी कुड टेक अ होर्स इन दैट वंडरफुल ऐस! नेक्स्ट ऑय विल फक हर ऐस...!”

 

 

 

“वी हिट द जैकपॉट मैन!”

 

 

 

उनकी बातें सुनकर मुझे अजीब सी खुशी हुई। मुझे अपने ऊपर फख़्र होने लगा।

 

 

 

“डिड यू लाइक इट... बेबी?” ओरिजी ने मेरे चेहरे के पास खड़े होते हुए पूछा। मैंने बोझल आँखों से देखा तो उसका काला लौड़ा अभी भी सख्त था और वीर्य से लथपथ था। इस कहानी की लेखिका शह नाज़-खान है।

 

 

 

“उम्म्म्म! यू गाइज़ वर ग्रेट! इट वाज़ बेस्ट फकिंग एवर! थैंक यू!” मैं मुस्कुराते हुए फुसफुसयी।

 

 

 

“श्योर हनी! यू वर ग्रेट ठू!” ओरिजी बोला।

 

 

 

“व्हाय डोंट यू लिक आर डिक्स क्लीन.... योर ऐस एंड कंट मेड क्वाइट अ मेस!” माइक भी मेरे चेहरे के ऊपर अपना मूसल लौड़ा झुलाते हुए बोला।

 

 

 

“ऑय वुड लव टू टेक यौर कॉक्स इन मॉय माउथ!” कहते हुए मैं उनकी टाँगों के बीच में ज़मीन पर चूतड़ टिकाये बैठ गयी। लेकिन उनके ऊँचे कद की वजह से मेरा चेहरा उनके लौड़ों तक नहीं पहुँच रहा था। पहले की तरह मुझे अपने घुटने मोड़ कर अपने ऊँची ऐड़ी के सैंडलों पर उकड़ूँ बैठना पड़ा। इस तरह बैठने से मेरी चूत और गाँड में से और ज्यादा वीर्य बाहर बहने लगा। जैसे ही मैंने अपना चेहरा माइक के लौड़े के करीब लाया तो उसे अपने मुँह में लेते-लेते रुक गयी और मेरी चींख सी निकल गयी, “ईईईऽऽश यक... सो डर्टी!” वो काला लौड़ा सिर्फ उसके वीर्य से ही लथपथ नहीं था बल्कि मेरी गाँड की गंदगी भी उस पर मौजूद थी। मैंने नाक भौं सिकोड़ कर थोड़ी ना-नुकर तो की लेकिन वासना और शराब के नशे में इतनी गिर गयी थी कि उनके ज़रा सा जोर और बढ़ावा देने पर मैं ये गंदी हरकत करने के लिये भी तैयार हो गयी। इससे ज्यादा गिरी हुई हरकत क्या हो सकती थी लेकिन उस वक्त मेरी चूत मेरे दिमाग पर हावी थी और ये बेहुदा और नफ़रत-अंगेज़ हरकत भी मुझे इक्साइटिंग लगने लगी।

 

 

 

थोड़ा हिचकिचाते बहुत ही एहतियात से मैंने माइक के सुपाड़े पर धीरे से अपने थरथराते होंठ रखे तो मुझे उबकायी सी आ गयी लेकिन मैं अब पीछे हटने वाली नहीं थी। मेरा जिस्म गंदी ज़लील वसना से दहक रहा था। मैंने सुपाड़ा अपने मुँह में ले ही लिया। बदबू के साथ-साथ बहुत ही कड़वा और नमकीन सा तीखा स्वाद आया लेकिन मैं खुद को रोक नहीं सकी और अपनी जीभ घुमा-घुमा कर उसे चूसने लगी। हैरत की बात ये है कि ऐसे गंदे स्वाद और बदबू से मेरे जिस्म में सनसनी सी दौड़ने लगी। मेरी वासना और जोर से भड़क उठी। मैंने बहुत ही मस्त होकर उसके लौड़े को चाट-चाट कर और चूस-चूस कर साफ किया।

 

 

 

“यू सीम टू लाइक द टेस्ट ऑफ योर शिट ऑन मॉय कॉक!”  माइक ने मुझे ताना मारते हुए पूछा!इस कहानी की लेखिका शह नाज़-खान है।

 

 

 

मैं भी बेशर्मी से अपने होंथों पर जीभ फिराते हुए  शरारत से बोली, “इट वाज़ नॉट बैड! ऑय कैन गैट यूज़्ड टू इट!” और फिर जोर से खिलखिला कर हंस पड़ी।

 

 

 

“यू आर सच ए नैस्टी स्लट! नॉव क्लीन मॉय कॉक ठू!” ओरिजी मेरे गालों पर अपना लौड़ा चाबुक की तरह मारते हुए बोला।

 

 

 

मैंने लपक कर ओरिजी का लौड़ा अपने हाथों में पकड़ लिया और अपनी जीभ से चाट कर और उसे मुँह में चूस कर साफ करने लगी। उसके लौड़े से वीर्य के साथ मिलाजुला अपनी चूत के रस चाटने में मुझे बहुत मज़ा आ रहा था। मैं अपने मुँह में उसका सुपाड़ा ले कर चूस रही थी कि अचानक उसने मेरे सिर को कस कर अपने हाथों में पकड़ा और अगले ही पल उसके लंड में से पेशाब की गरम बूँदें मेरे मुँह में छलकने लगीं। चौंक कर कराहते हुए मैं अपना मुँह उसके लौड़े से पीछे हटाने की कोशिश करने लगी लेकिन ओरिजी ने मेरा सिर कस कर थाम रखा था। मेरा मुँह उसके मोटे लौड़े पर पहले ही बुरी तरह फैला हुआ था लेकिन मैंने फिर भी जितना हो सका अपने होंठ ढीले कर दिये। मेरे मुँह में पेशाब भरने लगा तो मेरे होठों के किनारों से बाहर बहने लगा। फिर भी उसके पेशाब का नमकीन तल्ख स्वाद लेने से मैं बच नहीं सकी क्योंकि ओरिजी के लौड़े का सुपाड़ा मेरे मुँह में काफी अंदर था और उसने मेरा सिर कसकर पकड़ रखा था। मुँह में पेशाब भरने से मेरी साँसें चोक होने लगीं तो मैंने खुद ही उसका तल्ख पेशाब पीना शुरू कर दिया और पल भर में ही मेरी हिचक भी ख़त्म हो गयी। फिर तो मैं पूरे जोश में खुशी से गटागट उसका पेशाब पीने लगी। मुझे एहसास ही नहीं हुआ कि कब मैं खुद-ब-खुद अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अपनी क्लिट रगड़ने लगी थी। जब तक मेरे मुँह में उसके लंड ने पेशाब करना बंद किया तब तक मैं एक बार फिर झड़ने की कगार पर थी। जैसे ही उसने अपना लौड़ा मेरे मुँह से बाहर खींचा तो मैं भी कस कर आँखें मींचे जोर से चींख पड़ी। मैं अब तक अपनी ऊँची हील की सैंडिलों पर उकड़ूँ बैठी थी पर मेरा जिस्म अकड़ कर इस कदर थरथर काँपने लगा कि मैं बैठी ना रह सकी और धड़ाम से फर्श पर गिर पड़ी।

 

 

 कुछ देर लेटे रहने के बाद जब मैंने आँखें खोलीं तो दोनों पास ही कुर्सियों पर बैठे मेरी तरफ देख कर बेहुदगी से मुस्कुराते हुए कुछ तबसरे कर रहे थे जो मैं ठीक से सुन नहीं सकी। मैं भी पास ही दीवार के सहारे टिक कर टाँगें फैलाये बैठ गयी। मैंने पीने के लिये कुछ माँगा तो माइक ने उठ कर मिनी-बार में से ऑरेंज जूस की बोतल और वोदका की एक छोटी सी शीशी निकाली। ग्लास में जूस के साथ-साथ वो शीशी भी खाली करके मुझे ग्लास पकड़ा दिया। इतने में ओरिजी ने तीन सिगरेट जलायीं और एक सिगरेट मेरी तरफ बढ़ा दी।

 

 

 

“सॉरी! ऑय डोंट स्मोक!” मैंने एक हाथ लहराते हुए मना किया।

 

 

 

“कम ऑन बेबी! देयर इज़ आलवेज़ अ फर्स्ट टाइम!” ओरिजी बोला।

 

 

 

“ऑय डोंट थिंक यू हैड एवर ड्रैंक पिस्स बिफोर बट यू जस्ट इंजॉयड ड्रिंकिंग हिज़ पिस्स!” माइक मुस्कुराते हुए बोला। मैं नशे में मदमस्त थी और उसकी बात सुनकर बिना वजह ही हंसी छूट गयी। मैंने और आनाकानी नहीं की और वो सिगरेट ले कर अपने होंठों से लगा कर कश लगाने लगी। सिगरेट पीना तो वैसे मामुली सी बात थी क्योंकि शाम से पिछले डेढ़-दो घंटों में मैं हवस-परसती की सारी हदें पार कर के इस कदर गिर गयी थी कि अपनी गाँड की टट्टी से लथपठ लौड़ा चूसने और एक अजनबी का पेशाब पीने जैसी ज़लील हरकतों में मैं निहायत बेशर्मी से शरीक हुई थी।

 

 

 

खैर, अभी तो पुरी रात बाकी थी और उस दिन खुदा भी शायद मुझ पर खास मेहरबान था, हमारी चोदन-चुदाई पूरी रात ज़ारी रही। सारी रात उन दोनों हब्शियों ने मुझे शराब और पता नहीं कौन-कौन सी नशीली ड्रग के नशे में मुझे मदमस्त रखा और दोनों ने मिलकर मेरे जिस्म को हर तरह से बार-बार जम कर चोदा। मैंने भी बढ़चढ़ कर उनका साथ दिया और चुदाई के मज़े लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसी दौरान एक और काला हब्शी भी इस चुदाई में शरीक हो गया। मुझे इतना भी होश नहीं था कि वो इत्तेफाक से वहाँ पहुँचा या इन दोनों में से किसी ने उसे फोन करके न्यौता दिया। खैर मुझे क्या एतराज़ हो सकता था - दो से भले तीन लौड़े! खुदा के फज़ल से मुझे तो जैसे जन्नत ही मिल गयी थी। पूरी रात वो तीनों ने मेरी चूत और गाँड अपने भुजंग काले लौड़ों से चोद-चोद कर मुझे जन्नत की सैर करवायी। कईं बार तो तीनों ने एक साथ मेरी चूत, गाँड और मुँह में अपने लौड़े ठोक-ठोक कर मुझे चोदा। पता नहीं कितनी ही बार मैंने उनका पेशाब मज़े ले -लेकर पिया और उनके उकसाने पर मैंने बे-गैरती से अपना खुद का पेशाब भी ग्लास में भर-भर कर पिया।

 

 

 

इसी तरह की वाहियात हरकतों और चुदाई के दौरान कब मैं या तो बेहोश हो गयी या नींद के आगोश में चली गयी, मुझे पता ही नहीं चला। जब होश आया तो कुछ पलों के लिये तो समझ ही नहीं आया कि मैं हूँ कहाँ। मैं फर्श पर ही पसरी हुई थी और ज़ाहिर है कि मैं सिर्फ सैंडल पहने हुए बिल्कुल नंगी थी। आसपास कोई नज़र नहीं आया। पूरे जिस्म में अकड़ाहट और मीठे से दर्द का एहसास था। नशा अभी भी पूरी तरह उतरा नहीं था। मैंने ज़ोरदार अंगड़ाइयाँ लीं और खड़े होते हुए उन्हें पुकारा। लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। कमरे में मैं अकेली ही मौजूद थी। घड़ी में समय देखा तो मैं चौंक गयी क्योंकि सुबह के पौने ग्यारह बज रहे थे। सुबह का सेमिनार सेशन कब से शुरू हो चुका होगा। मैंने अंदाज़ा लगाया कि ओरिजी और माइक भी वहीं गये होंगे। तभी मुझे ससुर जी का ख्याल आया । सुबह मुझे अपने कमरे से नदारद पा कर पता नहीं उन्होंने क्या सोचा होगा।

 

 

 

अपने कमरे में जाने से पहले मैंने वहीं फ्रेश होने का इरादा बनाया क्योंकि मेरा जिस्म वीर्य, पेशाब और थूक से सना हुआ था और सिर भी नशे में घूम रहा था। अगले आधे-घंटे तक मैं खूब अच्छे से शॉवर के नीचे नहायी। नहाने के बाद मैं तौलिया लेपेटे हुए हेयर-ड्रायर से अपने बाल सुखा रही थी कि तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और ओरिजी अंदर आ गया। उसने कले रंग का सूट पहना हुआ था जिससे साफ ज़ाहिर था कि वो सेमिनार अटेंड करने गया था। उसने आते ही पीछे से मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और मेरी गर्दन चूमने लगा।

 

 

 

“ऊँऊँहह लीव मी प्लीज़.... मॉय हेड इज़ पेनिंग सो मच! ऑय वाँट टू गो टू मॉय रूम!” उसके आगोश में कसमसाते हुए मैं बोली लेकिन मैंने उससे दूर हटने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। उसने मेरा तौलिया हटा कर एक तरफ उछाल दिया।

 

 

 

“कम ऑन बेबी! इट मस्ट बी जस्ट द हैंग-ओवर! ऑल यू नीड इज़ अ स्ट्राँग ड्रिंक एंड सम मोर फकिंग!” मुझे ले जा कर उसने सोफे पर बिठाया और मिनि-बार में से जिन की दो छोटी-छोटी बोतलें निकाल कर एक ग्लास में डालीं और बाकी का ग्लास रेड-बुल एनर्जी ड्रिंक की कैन खोलकर भर दिया। “हैव दिस बेबी! यू विल फील बेटर!”

 

 

 

उससे वो ग्लास ले कर मैं पीने लगी। उसने एक सिगरेट खुद के लिये जलायी और दूसरी मुझे ऑफर करी तो मैंने ज़रा हिचकते हुए अपने होंठों से लगा ली और उसने लाइटर जला कर मेरे सामने कर दिया। मैं वो ड्रिंक सिप करने लगी और वो मेरी तारीफ किये जा रह थ। “यू वर वंदरफुल लास्ट नाइट! ऑय हैव नेवर मेट सच अ सैक्सी वोमैन! यू आर अ टाइगरैस! योर हसबैंड इज़ सो लक्की!” वगैरह वगैरह। उसकी बातें सुनकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मेरा ड्रिंक खत्म होने को आया तो इतने में उसने भी अपने कपड़े उतार दिये और खड़े -खड़े अपना वो काले अजगर जैसा लौड़ा सहलाने लगा। मैं भी बेशर्मी से उसके लौड़े को निहारने लगी। मुझ से रहा नहीं गया तो मैंने अपना ग्लास ख़त्म किया और खुद ही उठकर उसके आगोश में पहुँच गयी और उसके लौड़े को सहलाने लगी। उसने झुक कर अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिये और हम खड़े-खड़े ही एक दूसरे को चूमने लगे। कभी मैं उसकी जीभ अपने मुँह में लेती तो कभी वो मेरी जीभ अपने मुँह में लेकर चूसता। चूमते-चूमते ही अचानक उसने मेरी कमर पकड़ कर मुझे उठाया और पलट कर इस तरह उल्टा कर दिया कि मेरी टाँगें ऊपर और मेरा सिर नीचे। अब हम ‘69’ की पोज़िशन में थे। उसका लौड़ा अब बिल्कुल मेरे चेहरे के सामने था और मेरी चूत उसके चेहरे के सामने। मैंने अपनी टाँगें उसकी गर्दन में डाल दीं और उलटी लटके-लटके ही मैं उसका लौड़ा अपने हाथों से मुठियाते हुए अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। वो भी मेरी चूत और गाँड चाटने लगा। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि एक ही दिन में मैं चुदाई कितने सारे नये-नये तजुर्बे कर रही थी। उसका लौड़ा तो इतना लंब चौड़ा था ही बल्की वो खुद भी कितना मजबूत और ताकतवर था। इस तरह उलटी लटके हुए उसका लौड़ा चूसते हुए और उससे अपनी चूत और गाँड चटवाते हुए मैं उत्तेजना से पागल हो गयी। उसका लौड़ा भी बिजली के खंबे की तरह एक दम सख्त होकर सीधा खड़ा था। उसने फिर से मुझे घुमा कर सीधा कर दिया।  “ओहह! कम एंड फक मी विद दैट बिग एंग्री कॉक!” मैं बहुत ही शरारत भरे अंदाज़ में बोली।

 

 

 

उसने भी देर नहीं की और आगे बढ़ कर खड़े-खड़े ही अपना अज़ीम लौड़ा मेरी चूत में ठाँस दिया और दनादन पागलों की तरह चोदने लगा। मेरी सिसकियाँ और चींखें फिर से उस कमरे में गूँजने लगीं। चोदते-चोदते उसने मेरे घुटने के नीचे अपनी बाँह डाल कर मेरी बाँयी टाँग ऊपर उठा ली थी। वो जानवरों की तरह इतनी जोर-जोर से शॉट मारते हुए मेरी चूत में लौड़ा चोद रहा था कि दीवार के सहारे भी मैं ठीक से खड़ी नहीं रह पा रही थी। उसके जोरदार झटके संभालती हुई मैं अपने दांये पैर की सैंडल की पाँच इंच ऊँची हील कार्पेट में गड़ाये बड़ी मुश्किल से खड़े रहने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मेरी सैंडल फिर भी बेकबू होकर दाँये-बांये हिल रही थी। उसके झटकों से मेरे मम्मे भी बुरी तरह उछल रहे थे। करीब दस-बारह मिनट तक वो जानवर की तरह मेरी चूत में लौड़ा पेलता रहा। मेरी चूत ने तो इस दौरान दो-तीन बार पानी भी छोड़ दिया था। एक वक्त तो ऐसा आया जब उसके धक्के इस कदर वहशियाना हो गये कि मुझे अपना पैर मोड़ कर पिछे से सैंडल की हील भी फर्श से ऊपर ऊठनी पड़ी। अब मैं अपने हाई हील सैंडल के आगे की नोक पर खड़ी थी। क्योंकि उसका लौड़ा मेरी चूत की नयी-नयी गहराइयों में चोट कर रहा था और मैं मस्ती में फड़फड़ाती हुई चींखे जा रही थी।

 

 

 

ओरिजी का स्टैमिना कमाल का था। काफी देर चोदने के बाद जब उसके लंड ने मेरी cÉÔiÉ में वीर्य छोड़ा तो वो भी इतनी प्रेशर से मेरे अंदर छूटा जैसे कि चूत में पानी क कोई पाइप फट पड़ा हो। मैं हाँफते हुए सोफे पर बैठ गयी और टाँगें उठा कर सामने की मेज पर फैला दीं। हम दोनों ने एक-एक सिगरेट पी और जब ओरिजी कपड़े पहनने लगा तो मुझे पहली बार ख्याल आया कि मेरे पास तो कपड़े ही नहीं थे। पिछली शाम मैं नशे में बिल्कुल नंगी ही उनके साथ इस कमरे में आयी थी। मैंने ओरिजी को अपनी मुश्किल बतायी तो वो बेपरवाही से हंसते हुए बोला, “बोल्ड एंड ब्यूटीफुल वुमन लाइक यू शुड नॉट वरी अबाऊट क्लोद्स! यू शुड फ्लॉन्ट योर सैक्सी बॉडी!”

 

 

 

अपनी तारीफ सुनकर मेरे चेहरे पर लाली आ गयी। वैसे तो कल शाम को मैं नंगी ही उन दोनों के साथ यहाँ आयी थी लेकिन अब दिन के समय नंगी अपने कमरे तक जाना और वो भी अकेले - मुझे झिझक महसूस हो रही थी। क्या इस वक्त होटल में इस तरह खुलेआम नंगे घूमना जायज़ होगा। मैंने ओरिजी से कहा तो वो फिर से मुझे उकसाते हुए बोला, “डोन्ट बी शॉय! यू आर नॉट गोइंग टू द कॉन्फ्रेंस हॉल... जस्ट गोइंग टू योर रूम! नो वन विल से एनिथिंग!”

 

 

 

उसकी बातों से मुझे थोड़ा हौंसला तो हुआ। हालांकि ग्यारहवीं मंज़िल से लिफ्ट पकड़ कर चौबीसवीं मंज़िल तक इस तरह नंगे जाने के ख्याल से मेरे अंदर मस्ती भरी गुदगुदाहट सी हो रही थी लेकिन थोड़ी शरम और डर सा भी था। फिर मैंने हिम्मत जुटा कर इस तजुर्बे का मज़ा लेने का फैसला किया। सिर्फ हाई हील वाले सैंडल पहने बिल्कुल नंगी मैं कॉरीडर में चलते हुए और फिर लिफ्ट पकड़ कर अपने कमरे तक आयी जो चौबिस्वीं मंज़िल पर था। नशे में मेरे कदम लड़खड़ा रहे थे। तीन हब्शियों के लौड़ों से पूरी चुदने की वजह से मेरी गाँड और चूत अभी भी फैली हुई थीं और मेरी घमासान चुदाई की पूरी कहानी बयान कर रही थी। पहले कॉरीडोर में एक कपल था जो धीरे से हॉय कहते हुए गुज़र गया। जब मैं लिफ्ट में चढ़ी तो तो दो औरतें पहले से मौजूद थीं जो फॉर्मल ड्रेस में थीं। मुझे देख कर उनके चेहरे पर शरारती मुस्कुराहट फैल गयी। मैं भी हैलो बोलते हुए वैसे ही मुस्कुरा दी। “यू हैव वेरी सैक्सी बॉडी!” एक ने तारीफ की और दूसरी ने पूछा, “लुक्स लाइक यू हैड लॉट ऑफ फन लास्ट नाइट!” पब्लिक में इस तरह नंगे होने की उत्तेजना में मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। मेरे गाल सुर्ख लाल हो रहे थे और वहीं मेरी चूत में खुजली होने लगी थी। लिफ्ट से उतर कर जब मैं अपने कमरे की तरफ जा रही थी तो हॉटल का एक वेटर मिला जो खाने की ट्रॉली ले कर जा रहा था। वो भी मुझे देख कर बेशर्मी से मुस्कुराया और एक जोरदार सीटी बजा दी। वैसे अगर वो मेरे साथ कुछ करना चाहता तो उस वक्त मैं मना नहीं कर पाती।

 

 

 

मेरे पास तो अपने कमरे को खोलने के लिये इलेकट्रॉनिक की-कार्ड था नहीं तो मैंने ससुर जी के कमरे को नॉक किया। नॉक करते हुए मैं सोच ही रही थी कि मुझे इस हालत में देख कर ससुर जी का क्या रियेक्शन होगा... मैं उनसे क्या कहुँगी? मैंने सोचा कि जरूरत पड़ी तो कह दूँगी कि दो अंजान आदमियों ने ज़बरदस्ती मेरे साथ रात भर रेप किया। लेकिन इसकी नौबत ही नहीं आयी क्योंकि ससुर जी तो कमरे में मौजूद ही नहीं थे। जब दो-तीन मिनट बाद भी दरवाज़ा नहीं खुला तो मेरे होश उड़ गये कि अब मैं कहाँ जाऊँ। ससुर जी तो नीचे कॉन्फ्रेंस में बिज़ी होंगे और मैं वहाँ तो नंगी नहीं जा सकती थी। तभी मुझे उस वेटर का ख्याल आया। मुझे अपने ही फ्लोर पर दूसरे कॉरीडोर के आखिर में एक कमरे के बाहर उसकी ट्रॉली दिख गयी। मैंने उससे कहा तो उसने अपने इलेकट्रॉनिक की-कार्ड से मेरा कमरा खोल कर दिया। मैं अंदर घुसी तो वो भी मेरे पीछे-पीछे अंदर आ गया।

 

 

 

“व्हॉट...व्हॉट डू यू वान्ट?” मैंने धड़कते दिल से पूछा। मेरी चूत में मस्ती की लहरें उठने लगीं। पता नहीं मेरे अंदर ये कैसी आग थी जो बुझ ही नहीं रही थी। रात भर तीन-तीन लौड़ों से घंटों चुदने के बाद भी मेरा मन नहीं भरा था। मैं फिर चुदने के लिये बेचैन हो रही थी।

 

 

 

“मैडमोज़ेल... ऑय-ऑय वाज़ चेकिंग... इफ़..इफ़ यू नीड एनीथिंग!” वो बेशर्मी से मेरे नंगे जिस्म को घूरते हुए मुस्कुरा रहा था। उसकी उम्र मुश्किल से अठारह-उन्नीस साल रही होगी।

 

 

 

“नो... नो... थै-थैंक यू!” मैं हकलाते हुए बोली। लेकिन वो हिला नहीं और इतने में अपनी पैंट की ज़िप खोलकर अपना लौड़ा बाहर निकाल लिया। “आर यू श्योर यू डोंट नीड एनीथिंग!” वो मुस्कुराते हुए बोला। उसका लंड हैमिल्टन्के लंड की तरह बिल्कुल गोरा चिट्टा था और उसका सुपाड़ा फूलने से लाल हो गया था।

 

 

 

“ऑय.... उह... ऑय डोंट नो...” मैं हकलाने लगी, “मे बी... ऑय...  योर डिक इज़ सो..सो.. !”  मेरी नज़रें उसके लंड पर ही अटकी थीं। हालांकि साइज़ में ये लौड़ा उन हब्शियों के लौड़े के मुकाबले का तो नहीं था लेकिन फिर भी काफी तगड़ा था। मेरे मुँह में पानी भर आया।  उसने अपनी बेल्ट खोलकर अपनी पैंट और नीचे खिसका दी। वासना भरी आँखों से उसके लौड़े को घूरते हुए मैंने अपने होंठों पर जीभ फिरायी और  घुटने मोड़ कर उसकी टाँगों के बीच में बैठ गयी।

 

 

 

फिर तो अगले आधे घंटे में मैंने पहले तो उसका फिरंगी लौड़ा चूस- चूस कर उसका वीर्य पिया और उसके बाद जमकर उसके जवान लौड़े से अपनी चूत चुदवायी।

 

 

 उसके जाने के बाद मैं दरवाज़ा बंद करने लगी तो वहीं मुझे एक एन्वलोप मिला। उसमें ससुरजी का पैगाम था कि अचानक उन्हें हैमिलटन के साथ एक दिन के लिये फ्रेंकफर्ट जाना पड़ रहा है और वो अगले दिन दोपहर तक लौट आयेंगे। मुझे कॉन्फ्रेंस में कुछ जरूरी सेमीनार अटेंड करने के लिये भी हिदायत दी थी और साथ ही लिखा था कि मैं सशा के साथ इंजॉय करूँ।

 

 

 

घंटे भर बाद ही एक सेमीनार था जो ससुर जी ने मुझे अटेंड करने को कहा था। मेरा मूड तो नहीं था पर सेमीनार में जाना भी जरूरी था। मैं एक बार फिर से नहायी और ट्राऊज़र और शर्ट और हाई हील के सैंडल की दूसरी जोड़ी पहन कर सेमिनार में पहुँच गयी। मेरे कदमों में अभी भी लड़खड़ाहट सी थी क्योंकि मेरा नशा उतरा नहीं था। सेमिनार करीब दो घंटे चला। मेरा ध्यान सेमिनार में ज्यादा था नहीं। खुशकिस्मती से वहाँ स्नैक्स का इंतज़ाम था। पहले तो मैंने पेट भर कर स्नैक्स खाये क्योंकि रात से तो सिर्फ शराब और उन हब्शियों का वीर्य और पेशाब के अलवा कुछ भी पेट में गया नहीं था। ड्रिंक्स का भी इंतज़ाम था पर मैं अपने ऊपर काबू रखा और सिर्फ मिनरल वाटर ही पीया। सेमिनार के दौरान ससुर जी के लिये थोड़े बहुत नोट्स लिये। ज्यादा वक्त तो मैं ऊँघ ही रही थी और पिछली रात की चुदाई बारे में ही सोच रही थी।

 

 

 

सेमिनार के दौरान मुझे सशा कहीं नहीं दिखी तो मैंने अपने कमरे में जाकर आराम करने का फैसला किया। लेकिन लौटते हुए सेमिनार हॉल के बाहर ही मुझे सशा मिल गयी। वो ज़ोर देकर मुझे अपने कमरे में ले गयी। शेंपेन की चुस्कियाँ लेते हुए और सिगरेट स्मोक करते हुए हम गपशप करने लगे। सशा तो चेन स्मोकर थी और जब उसने मुझे सिगरेट पेश की तो मैंने भी मना नहीं किया। मैंने उसे पिछली रात की ऐयाशियों के बारे में तफसील से बताया। “यू आर अ लक्की बिच!” वो मेरी चुदाई की दास्तान सुन कर बोली। मेरी दास्तान सुनते-सुनाते पता ही नहीं चला कि कब हम दोनों बहक कर एक दूसरे को चूमने सहलाने लगीं और फिर करीब एक घंटे तक हम दोनों लेस्बियन चुदाई का मज़ा उठाया। पूरी रात बेरहमी से चुदने के बाद सशा के साथ नज़ाकत भरी लेस्बियन चुदाई में मज़ा आ गया। नरम मुलायम जिस्मों का आपस में रगड़ना और बहुत ही प्यार भरे और जोशीले चुम्मों की मस्ती तो सिर्फ दूसरी औरत के साथ लेस्बियन चुदाई में ही मुमकीन है। हम दोनों ने कईं बार एक दूसरी की चूत का पानी छुड़ाया। काफी देर तक हम दोनों एक दूसरे से लिपट कर लेटी रहीं।

 

 

 

शाम को सात बजे के आसपास हम दोनों ने उसी होटल में नीचे रेस्टोरेंट में डिनर किया। उसके बाद सशा ने पैरिस घूमने की पेशकश की। मैंने उसे बताया कि मैं पैरिस का टूर कर चुकी हूँ तो वो हंसने लगी। “ओह नो डर्लिंग! ऑय डिड नॉट मीन साइट-सींग! लेट अस गो एंड सी नाइट-लाइफ ऑफ पैरिस! सैक्स डिस्ट्रिक्ट... हैव सम अडल्ट फन!”

 

 

 

हम दोनों अपने-अपने कमरे में जा कर सैक्सी कपड़े और सैंडल पहन कर तैयार हुईं और अय्याशी करने निकल पड़ीं। हम मेट्रो में बैठ कर पिगाल डिस्ट्रिक्ट पहुँचे जहाँ हर तरफ बस सैक्स बूटीक और स्ट्रिप क्लब वगैरह थे। सबसे पहले हमने वहाँ का इरोटिक म्यूज़ीयम देखा। इस सात मंज़िला इमारत की हर मंज़िल पर चुदाई से ताल्लुक तरह-तरह के स्कल्प्चर, तसवीरें वगैरह थीं। पहली दो मंज़िलों पर तो बड़े-बड़े लौड़ों के बुत्त देख कर मेरा मन मचल उठा। सशा अपने डिजिटल कैमरा साथ लायी थी। हमने लौड़ों के बड़े-बड़े स्कल्प्चरों से चिपक-चिपक कर कईं फोटो खींची। उसके बाद हम एक बहुत ही बड़े सैक्स बूटिक में गये जहाँ हर तरह की अश्लील किताबें, हर किस्म की ब्लू-फिल्मों की डी-वी-डी और तरह-तरह के सैक्स टॉयज़ बिक्री के लिये सजे हुए थे। जावेद और मैं अक्सर ब्लू-फिल्मों का मज़ा लिया करते थे। इसलिये मैंने अलग-अलग कैटगोरी की ब्लू-फिल्मों कुछ डी-वी-डी खरीद लीं। सशा के जोर देने पर मैंने एक डिल्डो भी खरीद लिया। रबड़ का नौ इंच लंबा काला डिल्डो बिल्कुल असली लंड की तरह हकीकी लग रहा था। उसका हर हिस्सा जैसे कि नसें, मोटा फुला हुआ सुपाड़ा, गोटियों की झुर्रिदार थैली, सब बहुत ही तफसील से तराशा हुआ था। वो काला डिल्डो मुझे ओरिजी और माइक के लौड़ों की याद दिला रहा था, इसलिये उनके साथ बितायी मस्ती भरी रात की यादगार समझ कर मैंने वो खरीद लिया।

 

 

 

उसके बाद हम एक स्ट्रिप क्लब में गये जो खासतौर पर लेडीज़ के लिये था। हमने अपने लिये ड्रिंक ऑर्डर किया। स्टेज के अलावा पूरे हॉल में बहुत ही हल्की रोशनी थी। स्टेज पर कईं आदमी सैक्सी धुन पर नाचते हुए धीरे-धीरे अपने कपड़े उतार रहे थे। नशे और मस्ती में चूर औरतें हूटिंग कर रही थीं। ड्रिंक सर्व करने वाले वेटर भी करीब-करीब नंगे ही थे। जब एक वेटर हमारे ड्रिंक्स लेकर आया तो उसने बहुत ही छोटी सी फ्रेंच कट अंडरवीयर पहन रखी थी जिसमें उसका मोटा लौड़ा बहुत ही मुश्किल से कैद था। उसने हमारी टेबल पर ड्रिंक रखे तो सशा ने वेटर का अंडरवीयर नीचे खिसका कर उसका लौड़ा अपने हाथों में भर लिया और झुक कर उसके सुपाड़े पर अपने लाल-लाल होंठ रख दिये। कुछ सेकेन्ड उसका सुपाड़ा चूसने के बाद उसने मुझे भी वैसा ही करने का इशारा किया। मैं भी आगे झुक कर उसके लौड़े का सुपाड़ा अपने मुँह में ले कर चूसने लगी। अचानक उसने अपना लौड़ा बाहर खींच लिया तो मुझे बहुत गुस्सा आया। सशा ने इतने में एक-एक यूरो के दो नोट उसके अंडरवीयर में खिसका दिये। स्टेज पर नंगे हट्टे-कट्टे आदमियों को थिरकते हुए अश्लील हरकतें करते देख मेरी चूत गीली हो चुकी थी। पूरे हॉल में औरतों की आँहें, हुल्लड़ और अश्लील फिकरे गूँज रही थे। माहौल इतना सैक्सी था कि मेरा मन भी करने लगा कि अभी स्टेज पर चढ़ कर चुदवाने लगूँ। मैंने सशा से अपनी हालत बयान की तो उसकी हालत भी मेरे जैसी ही थी। हम दोनों तीन-तीन पैग पी चुकी थीं। वो बोली कि ड्रिंक खत्म करके थोड़ी देर में वहाँ से निकलते हैं। फिर वो मुझे ऐसी जगह ले जायेगी जहाँ हम दोनों जी भर कर लौड़े चूसने के साथ-साथ अपनी चूत की प्यास बुझा सकेंगी। मैंने देखा कि वो आँहें भरते हुए अपनी पैंटी नीचे खिसका कर अपने हाथों से अपनी चूत रगड़ रही है तो मुझसे भी रहा नहीं गया और मैं भी अपनी चूत रगड़ने लगी। इस तरह बस कुछ देर के लिये ही थोड़ी सी टेम्परेरी राहत मिली।

 

 

 

एक दूसरे की कमर में हाथ डाले ऊँची हील के सेंडलों में लड़खड़ाती हुई रात के करीब ग्यारह बजे जब हम दोनों उस स्ट्रिप क्लब से निकलीं तो काफी नशे में थीं और हमारी पैंटियाँ नदारद थीं। मैंने उसकी गर्दन चूमते हुए पूछा कि अब वो मुझे कहाँ ले जायेगी तो बोली, “हैव यू एवर हर्ड ऑफ ग्लोरी होल?”

 

 

 

“नो! बट ऑय एम नॉट इंट्रस्टिड इफ इट इज़ द नेम ऑफ सम बार ओर क्लब? ऑय ओनली वांट सम बिग कॉक टू फक मी!” लड़खड़ाती आवाज़ में मैं अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए बोली तो वो जोर-जोर से हंसने लगी। “कम विद मी! यू कैन हैव मोर दैन वन कॉक इफ यू वांट!”

 

 

 

चलते-चलते उसने मुझे बताया कि ‘ग्लोरी-होल’ आमतौर पर पब्लिक टॉयलेट के स्टालों के बीच की दीवारों में पाये जाने वाले छेद होते हैं। अगर बगल-बगल के दो स्टालों में मौजूद शख्स आपसी रज़ामंदी से इन छेदों के ज़रिये एक दूसरे  का चेहरा देखे बगैर चुदाई-हरकतों में शरीक हो सकते हैं। पब्लिक टॉयलेट के अलावा ग्लोरी-होल अक्सर एडल्ट वीडियो देखने के प्राइवेट बूथों की दिवारों में भी पाये जाते हैं। वैसे तो ग्लोरी-होल्स का इस्तेमाल ज्यादातर गे-मर्द अपनी पहचान गुप्त रखते हुए एक दूसरे का लौड़ा चूसने या एक दूसरे की मुठ मारने के लिये करते हैं लेकिन औरतें भी अक्सर इन ग्लोरी छेदों के ज़रिये अपनी पहचान छिपा कर किसी अंजान शख्स का लौड़ा चूसने-सहलाने के लिये करती हैं। अगर लौड़े का साइज़ बड़ा हो तो इन छेदों के ज़रिये चुदाई भी हो सकती है।

 

 

 

सशा ने बताया कि इस तरह के ग्लोरी-होल अक्सर गंदे होते हैं और जरूरी नहीं कि ग्लोरी-होल के दूसरी तरफ कोई मर्द हर वक्त मौजूद ही हो या फिर उस मर्द की काबिलियत की भी कोई गारंटी नहीं होती। इसलिये वो मुझे एक महंगे ‘अप-स्केल’ जगह पर ले जा रही थी जहाँ हम एक शानदार केबिन किराये पर ले सकेंगी और दीवार के दूसरी तरफ कोई ऐरा गैरा नहीं होगा बल्कि हमारी पसंद का कोई प्रोफेशनल जिगोलो होगा।

 

 

 

थोड़ा दूर चलने के बाद हम एक सैक्स शॉप के बाहर रुकीं। खिड़की में कईं तरह के अश्लील पोस्टर लगे थे और “बेस्ट ग्लोरी होल प्राइवेट केबिन!” “सैटिसफैक्शन गारेंटिड” जैसे कईं निआन साइन लग थे। हम अंदर गये तो रिसेप्शन पर एक औरत मौजूद थी जिसने जरूरत से ज्यादा मेक-अप कर रखा था। सशा ने उससे “प्राइवेट डिलक्स केबिन विद टू होल्स” का रेट पूछा तो उस औरत ने टूटी-फूटी इंगलिश में कहा कि “मनी डिपेंड ऑन व्हॉट टाइप सर्विस यू वाँट!”

 

 

 

“वी वांट टू हायर अनलिमिटेड फोर वन आ‍उर विद द बिगेस्ट एंड थिकेस्ट यू हैव!

 

 

 

“दैट विल बी एइट हंड्रड यूरो फोर डिलक्स केबिन फोर वन आ‍उर एंड थ्री हंड्रड फोर एवरी एडिशनल थरटी मिनट्स!” वो औरत मुस्कुराते हुए बोली, “ड्रिंक्स एंड वीडियो ऑफ योर चॉइस इज़ फ्री विद दिस पैकेज!” फिर फोटो एल्बम खोल कर हमें दिखाते हुए बोली, “दीज़ एइट स्टड्स आर द बेस्ट वी हैव!” एलबम के उस पेज पर आठ आदमियों के छाती से घुटनों तक की नंगी तसवीरें थीं। हर तसवीर के नीचे लौड़े के साइज़, रंग, उम्र वगैरह की डीटेल थी। मैंने देखा कि वो आठों लौड़े नौ से बारह इंच लंबे और अच्छे खासे मोटे थे। हमने जो पैकेज चुना था उसके मुताबिक वो आठ लौड़े बदल-बदल कर हमारे लिये हाज़िर रहेंगे ताकि एक घंटे तक एक वक्त में बिना रुकावट उनमें से कोई भी दो लौड़े हमारी खिदमत में मौजूद हों।

 

 

 

हम दोनों ने खुशी-खुशी चार सौ - चार सौ यूरो निकाल कर उसे दे दिये। मेरी हालत ऐसी थी कि इस वक्त चार सौ की जगह हज़ार यूरो भी देने पड़ते तो भी मैं सोचती नहीं। वैसे भी ससुर जी ने पैरिस आते ही मुझे शॉपिंग वगैरह के लिये चार हज़ार यूरो दे दिये थे और अब तक मैंने सिर्फ बारह सौ यूरो ही खर्च किये थे।

 

 

 

“योर केबिन इज़ ऑन सेकेंड फ्लोर! योर चॉइस ऑफ ड्रिंक्स विल बी इन द केबिन एंड इफ यू हैव एनी प्रॉब्लम... यू कैन कॉल मी फ्रॉम द फोन इन द केबिन! इंजॉय!” कहते हुए उस औरत ने हमें चाबी पकड़ा दी।

 

 

 

इंडियन रेलवे के फर्स्ट-क्लास कूपे जितना केबिन था। अंदर दो कुर्सियाँ और एक टेबल थी और दीवार पर बड़ा सा टीवी भी लगा था। नीचे रिसेप्शन पर सशा ने जो पसंद की थी वो स्कॉच की बोतल और चार ग्लास भी टेबल पर पहले से मौजूद थे। टेबल पर ही एक डब्बे में कंडोम के पैकेट भी रखे थे। सशा ने उन कंडोम के पैकेटों की तरफ इशारा करेते हुए कहा कि ग्लोरी-होल में से पेशेवर ज़िगोलो-मर्दों के लौड़ों को चूसते वक्त चाहे ना सही पर उनसे चुदवाते वक्त मैं कंडोम इस्तेमाल करना ना भूलूँ। साइड की दोनों दीवारों में अलग-अलग ऊँचाई पर कईं छेद थे। सभी छेद अभी बंद थे और हर छेद के पास एक बटन था। अपनी पसंद और जरूरत के हिसाब से हम जिस छेद का बटन दबायें, उसी छेद में से लौड़ा निकल कर हमारी खिदमद में हाज़िर हो जायेगा। पहला बटन दबाने के बाद  ही हमारा एक घंटे का वक्त शुरू होना था इसलिये केबिन का दरवाज़ा लॉक करने के बाद सशा ने दो पैग बनाये और दो सिगरेट सुलगा कर केबिन की रोश्‍नी थोड़ी मद्दिम करके ब्लू-फिल्म ऑन कर दी।

 

 

 

हम दोनों स्मोक करते हुए अगल-बगल बैठ कर स्कॉच के पैग पीते हुए सामने स्क्रीन पर ब्लू-फिल्म देखने लगीं। मैं नहीं जानती कि ये इत्तेफक था या फिर सशा ने जानबूझ कर ये फिल्म चुनी थी क्योंकि इस ब्लू फिल्म में दो गोरी औरतों का दस-बारह काले हब्शियों से गैंग-बैंग दिखाया गया था। उन गोरी औरतों को मोटे-मोटे काले लौड़े चूसते देख कर मुझे ओरिजी और उसके दोस्तों की याद आ गयी। मेरे मुँह और चूत दोनों से लार टपकने लगी। तभी सशा मेरी गोद में आ कर बैठ गयी और मेरे होंठ चूमते हुए फुसफुसायी, “फिनिश अप योर ड्रिंक फास्ट!” जैसे ही मैंने अपना पैग दो घूँट में खत्म किया तो उसने हाथ से ग्लास लेकर सामने टेबल पर रख दिया। फिर से मेरे होंठों पर अपने होंठ रख कर उसने अपनी जीभ मेरे मुँह में घुसेड़ दी। हम दोनों ने ऐसे ही एक दूसरे के जिस्म सहलाए और होंठ चूमते हुए एक दूसरे के कपड़े उतार दिये। हाई हील सेंडलों को छोड़कर हम दोनों ही अब बिल्कुल नंगी थीं। वो मेरी तरफ मुँह करके मेरी गोद में बैठी थी और हम दोनों चिपक कर चूमते हुए एक दूसरे के मम्मों से मम्मे रगड़ते हुए आँहें भरने लगीं। केबिन में गूँज रही ब्लू-फिल्म की चुदाई की मस्ती भरी आवाज़ें हमें और ज्यादा भड़का रही थीं।

 

 

 

करीब दस मिनट बाद जब वो मेरी गोद में से उठ कर खड़ी हुई तो हम दोनों बेहद गरम हो चुकी थीं। मेरा हाथ पकड़ कर सशा मुझे अपने साथ खींचते हुए ज़मीन पर अपने घुटने मोड़ कर बैठ गयी और हम दोनों ने एक ही दीवार में अगल-बगल के ग्लोरी-होल के बटन दबा दिये। बटन दबाते ही उन छेदों के पीछे के शटर खुल गये और कुछ ही पलों बाद दोनों छेदों में से दो मोटे-मोटे लौड़े निकल कर लहराने लगे। बस फिर क्या था, हम दोनों एक-एक लौड़े पर भूखी शेरनियों की तरह टूट पड़ीं और उन्हें मुठिया-मुठिया कर चूसने लगीं। स्कॉच की बोतल हम दोनों ने अपने बीच में रख ली ताकि लौड़े चूसते हुए बीच-बीच में एक-दो घूँट पी सकें। जब पहला लौड़ा झड़ा तो मैं भौंचक्की रह गयी। झड़ते हुए लौड़ों में से सैलाब की तरह इस कदर वीर्य उमड़ा कर मेरे मुँह में भरने लगा कि उतनी तेज़ी से उसे निगलते हुए लौड़ा मुँह में रख पाना मेरे बस में नहीं था। हार कर मैंने लौड़ा अपने मुँह से बाहर निकाला तो भी वो लगातार वीर्य की पिचकरियाँ मेरे चेहरे, गले और चूचियों पर दागता रहा। जब उसका झड़ना बंद हुआ तो वो लौड़ा पीछे खींच लिया गया और कुछ ही पलों में एक नया लौड़ा उस ग्लोरी-होल में से निकल कर हाज़िर हो गया। इसी बीच में सशा अपना वाला लौड़ा मुठियाते हुए मेरे पास खिसक कर वीर्य से सना हुआ मेरा चेहरे चाट कर साफ करने लगी।

 

 

 

ब्लू-फिल्म अभी भी चल रही थी लेकिन हमारा ध्यान उसमें बिल्कुल भी नहीं था। हब्शियों से चुद रही औरतों की आँहें और चींखें जरूर हमारी मस्ती में इज़ाफा कर रही थीं। जब सशा वाला लौड़ा झड़ा तो उसकी हालत भी मेरे जैसी ही थी। उसका चेहरा, बाल, मम्मे वगैरह सभी वीर्य से बुरी तरह सन गये थे। मैं भी पीछे नहीं रही और उसके पास खिसक कर उसके चेहरे से वीर्य चाटने लगी। तभी मैंने महसूस किया कि सशा अपने मुँह में भरे वीर्य का जैसे कुल्ला सा कर रही है और अगले ही पल उसने अपने होंठ मेरे होठों से चिपकते हुए अपने मुँह का वीर्य मेरे मुँह में ट्रांसफर कर दिया।

 

 

 

अगले करीब आधे घंटे में इसी तरह तीन-तीन लौड़ों से वीर्य छुड़ा कर हम दोनों चुदैल औरतों ने जी भर कर वीर्य पीने के साथ-साथ वीर्य की गंदी होली खेली। जैसे ही एक लौड़े का झड़ना पूरा होता तो वो छेद में पीछे खींच लिया जाता और उसकी जगह नया लौड़ा हाज़िर हो जाता।

 

 

 

उसके बाद मैंने देखा कि सशा ने बटन दबा कर वो छेद बंद कर दिया और खड़ी होकर पीछे वाली दीवार में थोड़ा ऊँचे वाले ग्लोरी-होल का बटन दबा दिया। कुछ ही पलों में उस ग्लोरी-होल में से नया एक फुट लंबा और काला लौड़ा निकल आया। मैं समझ गयी कि सशा का इरादा उसे अपनी चूत में लेकर चोदने का था। सशा उस लौड़े पर थूक-थूक कर उसे मुठियाने लगी। मैं भी अब चुदने के लिये बेकरार थी। मैंने भी अपनी दीवार में उँचे वाले ग्लोरी-होल का शटर खोल दिया और मेरे लिये भी करीब एक फुट लंबा लौड़ा हाज़िर हो गया लेकिन ये बिल्कुल गोरा-चिट्टा लौड़ा था। सशा की तरह मैं भी उसे मुठियाने लगी।

 

 

 

इस दौरान सशा घूम कर दीवार से अपनी पिठ सटा कर खड़ी हो चुकी थी। उसने अपने आगे एक कुर्सी खींच ली थी और एक टाँग उठा कर अपना पैर उस पर रख कर अपने सेंडल की पेंसिल हील कुर्सी की गद्दी में गड़ा रखी थी। अपना वाला लौड़ा मुठियाते हुए मैं पीछे गर्दन घुमा कर देख रही थी कि सशा किस तरह लौड़ा अपनी चूत में ले रही है। दीवार से अपनी कमर और कुल्हे सटाते हुए वो थोड़ी आगे झुकी और अपनी टाँगों के बीच में हाथ डाल कर उस लौड़े को पकड़ कर उसका सुपाडा अपनी चूत पर टिकाते हुए अंदर घुसेड़ लिया। अपने सामने कुर्सी की बैक पर अपने दोनों हाथ टिका कर वो अपने चूतड़ दीवार पर पीछे ठोंकने लगी और वो लौड़ा उसकी चूत में अंदर बाहर खिसकने लगा। दीवार के पीछे मौजूद अन्जान आदमी भी धक्के मारते हुए सशा की मदद कर रह था। सशा सिसकते हुए मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगी।

 

 

 

मेरे ग्लोरी-होल वाला लौड़ा भी मेरे थूक से बुरी तरह भीग कर चीकना और मुठियाने से बेहद कड़क हो चुका था। मैंने भी दीवार से अपनी कमर टिका कर वो लौड़ा अपनी चूत में ले लिया। इतना बड़ा लौड़ा अपनी चूत में लेने में मुझे कुछ खास दिक्कत नहीं हुई। मेरी दीवार के पीछे वाला अंजान आदमी भी दनादन मेरी चूत में लौड़ा पेलने लगा।  अब सशा और मैं बिल्कुल आमने-सामने खड़ी अपने चूतड़ पीछे दीवारों पर ठोंक-ठोंक कर ग्लोरी-होल में निकले हुए लौड़ों से चुदवा रही थीं। इसलिये सहारे के लिये मैंने भी आगे झुक कर सशा वाली कुर्सी की बैक पर ही उसके हाथों के पास अपने दोनों हाथ टिका दिये। केबिन इतना संकरा था कि सशा ने बड़े आराम से अपनी एक बाँह मेरी गर्दन में डाल दी और हम दोनों चुदते हुए एक-दूसरे को चूमने लगीं। मेरी सहुलियत के लिये सशा ने कुर्सी थोड़ी घुमा ली जिससे कि मैं भी एक टाँग उठ कर अपना पैर उस पर रख सकूँ।

 

 

 

जब हमारा एक घंटे का वक्त पूरा हुआ तो हम दोनों की चूतों में दो-दो लौड़े अपना वीर्य भर चूके थे। इस दौरान मैं कईं मर्तबा झड़ी और मेरी चूत ने हर बार इस कदर पानी छोड़ा कि मेरी दोनों टाँगें बुरी तरह भीग गयी थीं। सशा की भी करीब-करीब यही हालत थी। हम दोनों ही हाँफती हुई ज़मीन पर टाँगें पसारे दिवारों से पीठ टिका कर बैठ गयी। ब्लू-फिल्म कब पूरी होकर रुक गयी थी पता ही नहीं चला।

 

 

 

“वॉव! दैट वाज़ सो गुड!” कहते हुए सशा स्कॉच की बोतल मुँह से लगाकर सिप लेने लगी। उसमें अभी भी आधे से थोड़ी ज्यादा स्कॉच बाकी थी। दो-तीन सिप लेकर उसने बोतल मेरी तरफ बढ़ा दी और हम दोनों के लिये सिगरेट जलाने लगी। “येस... रियली ग्रेट! थैंक यू सशा फोर ब्रिंगिंग मी हेयर!” मैं बोतल में से सिप लेते हुए बोली। हम दोनों इसी तरह ज़मीन पर बैठे-बैठे बातें करती हुई सिगरेट और स्कॉच पीने लगीं। ज़िंदगी में कभी मैंने एक सिगरेट भी स्मोक नहीं की थी लेकिन पिछले चौबीस घंटों में ही मैं करीब दो दर्जन सिगरेट स्मोक कर चुकी थी। चेन स्मोकर सशा की सोहबत में मैं भी शाम से उसके साथ-साथ लगातार सिगरेट स्मोक कर रही थी। “ओह शिट! वी डिड नॉट यूज़ कंडोंस व्हाइल फकिंग दोज़ ज्यूसी कॉक्स!” टेबल पर रखे कंडोम के पैकेट देखकर सशा को ख्याल आया। “ओह कम ऑन सशा...  वी वर हैविंग सो मच फन सकिंग एंड फकिंग दोज़ कॉक्स.... हॉव कुड वी केयर अबॉउट यूज़िंग कंडोम्स ओर एनिथिंग एल्स!” मैं सिगरेट का धुँआ छोड़ते हुए बे-परवाही से बोली।

 

 

 

पंद्रह मिनट बाद उठ कर बड़ी-मुश्किल से जैसे-तैसे हमने अपने कपड़े पहने क्योंकि नशे में कुछ सूझ नहीं रहा था। पहले से ही हम नशे में लड़खड़ाती यहाँ आयी थीं और अब तो हम दोनों मिलकर स्कॉच की आधी बोतल गटक चुकी थीं। कंधों पर अपने पर्स लटकाये और बाँहों में बाँहें डाले हम दोनों झूमती हुई नीचे आयीं। सशा के हाथ में करीब आधी भरी स्कॉच की बोतल भी थी। रिसेफ्शन पर वही औरत मौजूद थी। “डिड यू हैव अ गुड टाइम?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा।

 

 

 

“येस द बेस्ट टाइम!” हम दोनों नशे में खिलखिलाती हुई बुलंद आवाज़ में बोलीं और बाहर सड़क पर आ गयीं। रात के करीब एक बज रहे थे लेकिन पिगाल डिस्ट्रिक्ट इलाके में इस वक्त भी पुरी रौनक थी। जगह-जगह नशे में झूमते आधे नंगे लोगों के झुँड या खुले आम चुमाचाटी करते लोग दिख जाते। ग्राहकों को उकसाती रंडियाँ और ज़िगोलो भी हर जगह मौजूद थे।

 

 

 

हमें मेट्रो स्टेशन जाना था लेकिन नशे में कुछ होश नहीं था कि हम जा कहाँ रही हैं। सिगरेट स्मोक करती हुई और बोतल से स्कॉच के सिप लेती हुई हम दोनों नशे में चूर और मस्ती में झूमती लड़खड़ाती और एक दूसरे को सहारा देती हुई पिगाल डिस्ट्रिक्ट की मेन रोड पर चली जा रही थीं। नशे में चूर हम दोनों बहकी- बहकी बातें करती हुई जोर-जोर से बे-वजह ही हंस रही थीं। ऐसे ही बीच-बीच में रुक कर एक दूसरे के होंठ चूम लेतीं या फिर खुलेआम दूसरे टॉप में हाथ डाल कर मम्मे भींच देती। इसी बीच में अचानक मुझे ज़ोर से पेशाब लगी तो सशा खिलखिला कर हंसते हुए बोली की पेशाब करना है तो वहीं खड़े-खड़े पेशाब कर लूँ। मुझसे भी रहा नहीं गया। पैंटी तो वैसे ही स्ट्रिप क्लब से ही नदारद थी। बेशर्मी से हंसते हुए एक दुकान के सामने ही खड़े-खड़े ही मैंने अपनी स्कर्ट उठा कर पेशाब की धार छोड़ दी। मेरी दोनों टाँगें, पैर और सैंडल बुरी तरह पेशाब में भीग गये और पेवमेंट पर नीचे मेरे पैरों के पास पेशाब फैल गया। सच कहूँ तो इस टुच्ची हरकत में भी मुझे बहद रोमाँच आया। मेरे बाद सशा ने भी अपनी स्कर्ट उठा कर पेशाब करना शुरू कर दिया। वो बिल्कुल मेरे समने खड़ी थी और जानबूझ कर उसने पेशाब की धार मेरी टाँगों और मेरे पैरों पर भी छोड़ी।

 

 

 

धीरे-धीरे हम दोनों ने मिलकर वो स्कॉच की वो पूरी बोतल गटक डाली और हम इस कदर नशे में चूर हो गयीं कि चार-पाँच कदम भी चल पाना मुश्किल हो गया। कभी सशा लुढ़क जाती तो मैं उसे किसी तरह उठाती और तो कभी मैं लुढ़क जाती और वो मुझे सहारे देकर उठने की कोशिश करती। सशा ने तो उल्टी करनी शुरू कर दी और नशे में धुत्त होकर पेवमेंट पर ही आँखें बंद करके पसर गयी। मेरी खुद की हालत उससे ज्यादा बेहतर नहीं थी। मैं भी लुढ़कते हुए उसके पास बैठ गयी। नसीब से एक टैक्सी हमारे पास आकर रुकी। टैक्सी वाले ने फ्रेंच में और टूटी फूटी सी इंगलिश में कुछ कहा लेकिन मैं तो नशे में बुरी तरह धुत्त थी और उसकी कोई बात मेरे पल्ले नहीं पड़ी। वो उतर कर मेरे पास आया तो मैंने बड़बड़ाते हुए अपने होटल का नाम दो तीन बार बताया। उसने ही सशा को और मुझे सहारा दे कर टैक्सी में बिठाया और फिर हमें होटल पहुँचाया।

 

 

 

होटल पहुँच कर होटल स्टॉफ किसी बंदे ने सहारा दे कर हम दोनों को मेरे रूम में पहूँचाया। सुबह दस बजे मेरी आँख खुली तो सशा को भी अपने ही बिस्तर में पाया। वो भी मेरी तरह सिर्फ सैंडिल पहने बिल्कुल नंगी बेखबर होकर सो रही थी। मुझे बिल्कुल होश नहीं कि हम कब, कहाँ और कैसी नंगी हुईं। मुमकिन है कि टैक्सी वाले ने या फिर हमें कमरे तक पहुँचाने वाले बेल-बॉय्ज़ ने हमारी बेहोशी का फायदा उठाया हो।

 

 

 

शाम तक ससुर जी और हैमिल्टन भी टूर से लौट आये। कॉन्फ्रेंस दो दिन और चली। ज़हिर सी बात है कि इन दो दिनों में भी मैं ससुर जी और हैमिल्टन से चुदी और सशा के साथ लेस्बियन चुदाइ का लुत्फ भी उठाया। इनके अलावा ससुरजी से छिपा कर मैंने होटल में और भी कईं लोगों के साथ जम कर अय्याशी की।

 

 

 

कॉन्फ्रेंस से वापस लौटते हुए मुझे बहुत दुख हुआ।

 

 

 

वापस आने के बाद मेरा तो काया पलट ही चुका था। हर वक्त दिमाग में बस चुदाई का ख्याल रहता। हर जगह हर मर्द को मैं बूरी नज़र से ही देखने लगी। ससुर जी तो मेरे दिवाने हो ही चुके थे और हमारे बीच अब कोई शरम या रिश्ते का लिहाज बाकी नहीं रह गया था। इसलिये सासू जी की नजरें बचा कर कभी रात को तो कभी घर से बाहर, किसी होटल में तो कभी उनके केबिन में मिलते थे। सासूजी को हमारे जिस्मानी ताल्लुकात की भनक नहीं लगी। चुदाई के अलावा मुझे दूसरी बुरी आदतें भी लग गयी थीं। शराब पीने की तो मैं पहले से ही शौकीन थी लेकिन रोज़ाना पीने की आदत नहीं थी। अब तो हर रोज़ सिगरेट-शराब की तलब होने लगी। ससुरजी को फुसला बहका कर शराब का इंतज़ाम तो हो जाता लेकिन सिगरेट तो मुझे बहुत छुपछुपा कर कभी-कभी ही स्मोक करने को मिलती। ससुर जी के साथ चुदाई में मज़ा तो बहुत आता था पर वो हर वक्त तो मेरे साथ हो नहीं सकते थे। वैसे भी मैं तो इतनी बिगड़ गयी थी कि अक्सर मेरा मन करता कि दो या तीन मर्दों से एक साथ चुदवा‍ऊँ। लेकिन ये मुमकीन नहीं था। जब ससुर जी के साथ मौका नहीं मिलता तो अपने कमरे में ब्लू-फिल्मों की डी-वी-डी चला कर या फिर पैरिस की अय्याशियाँ याद करते-करते अपने नये डिल्डो से अपनी प्यास बुझाती। हालत ये थी कि घर के नौकरों तक को मैं गंदी निगाह से देखती लेकिन सास-ससुर की वजह से कुछ भी करने की हिम्मत नहीं होती थी।

 

 

 

अभी जावेद की वापसी में काफी वक्त बाकी था। इसी बीच में जेठ जी भी मुझे लेने आ गये। काफी दिनों से उनके पास आकर ठहरने के लिये ज़िद कर रहे थे, लेकिन मैं ही टालती रही। मगर इस बार ना कहा नहीं गया। मैं उनके साथ उनके घर हफ़्ते भर रही। हम दोनों औरतें उनकी दो बीवियों की तरह उनके अगल-बगल सोती थीं। रात को फिरोज़ भाई जान हम दोनों को ही खुश कर देते। उनमें अच्छा स्टैमिना था। नसरीन भाभी जान तो मुझ पर जान छिड़कने लगी थी। हमारे बीच अब कुछ भी राज़ नहीं रहा। मेरा डिल्डो देख कर तो वो बहुत उत्तेजित हुईं। फिरोज़ जब ऑफिस में होते तो हम दोनों शराब पी कर दिन भर लेस्बियन सैक्स इंजॉय करतीं। नसरीन भाभी जान को भी मैंने सिगरेट शुरू करवा दी। फिरोज़ जब ऑफिस से लौटते तो उसके पहले वो खुद बन संवर कर तैयार होती और फिर मुझे भी सजाती संवारती। हम दोनों उनके आने के बाद छोटे-छोटे सैक्सी कपड़ों में उनसे लिपट जातीं और उनके साथ चुदाई का खेल शुरू हो जाता।

 

 

 

जावेद के लौट आने के बाद हम वापस मथुरा शिफ़्ट हो गये। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने मुझे चोदने का एक रास्ता खुला रखा। उन्होंने जावेद को कह दिया, “शहनाज़ एक बहुत अच्छी सेक्रेटरी है। अभी जो सेक्रेटरी है वो इतनी एफ़िश्येंट नहीं है। इसलिये कम से कम हफ़्ते-दो-हफ़्ते में इसे भेज देना दिल्ली। मेरे जरूरी काम निबटा कर चली जायेगी।“

 

 

 

जावेद राज़ी हो गया कि मैं हर दूसरे हफ़्ते में एक दो दिन के लिये ससुर जी के ऑफिस चली जाया करुँगी और सारे पेंडिंग काम निबटा कर आ जाया करुँगी। लेकिन असल में मैंने कभी भी ऑफिस में कदम नहीं रखा। ताहिर अज़ीज़ खान जी ने एक फ़ाईव स्टार होटल में सुईट ले रखा था जहाँ मैं सीधी चली जाती और हम दोनों एक दूसरे के जिस्म से अपनी प्यास बुझाते।

 

 

 

मथुरा में तो मेरी अय्याशियों पर कोई रोक-टोक नहीं थी। शुरू-शुरू में जावेद थोड़ा हैरान हुए और उन्होंने थोड़ा एतराज़ भी जताया पर धीरे-धीरे मेरी स्मोकिंग और रोज़-रोज़ शराब पीने की आदत को उन्होंने चुपचाप कुबूल कर लिया। चुदाई के लिये मेरे नये जोश और खुल्लेपन से तो उन्हें बेहद खुशी हुई। सैक्स के मामले में तो जावेद भी काफी ओपन नज़रिये वाले हैं। अब तो सोसायटी पार्टियों में मैं पहले से भी ज्यादा बढ़चढ़ कर इंजॉय करती और हम लोग अब वाइफ स्वैपिंग में भी शरीक होने लगे। जावेद कईं बार बिज़नेस टूर या और मसरूफियत की वजह से इन पर्टियों में नहीं जा पाते तो भी मैं इन पार्टियों में जाने का मौका नहीं छोड़ती। जब भी मौका मिलता मैं उनकी गैरहाज़री में भी अकेली ही क्लबों में और दूसरी पर्टियों में शरीक होती। इस तरह मुझे कईं बार ग्रूप सैक्स का भी मौका मिल जाता। जावेद को दूसरे मर्दों से मेरे तल्लुकातों से बिल्कुल एतराज़ नहीं था। उनके बिज़नेस रिलेशन्स के लिये भी अच्छा था क्योंकि शायद ही उनका कोई क्लायंट या कॉन्ट्रक्टर होगा जिसके साथ मैंने अय्याशी ना की हो।

 

 

 

दो तीन महीने में हालत ये हो गयी कि मैं अक्सर दिन में भी माली, दूधवाले, सब्ज़ीवाले से भी चुदवाने लगी। यहाँ तक कि कोरियर वाले या किसी सेल्समैन से चुदवाने से भी बाज़ नहीं आती। मेरे इन ताल्लुकातों के बारे में जावेद अंजान नहीं थे लेकिन हमने कभी इस बारे में बात नहीं की। इस दौरान हम लोग कईं बार फिरोज़ भाई जान और नसरीन भाभी जान के यहाँ भी गये या वो दोनों भी अक्सर हमारे यहाँ आ जाते और हम चारों खूब ऐश करते।

 

 

 

साल भर बाद की बात है कि एक दिन मुझे जोर की उबकायी आयी। मैंने डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने प्रेगनेंसी कनफर्म कर दी। मैं खुशी से उछल पड़ी। लेकिन इसका असली बाप कौन? ये क्याल दिमाग में घूमता रहा। मैंने फैमिली में अपने तीनों सैक्स पार्टनर्स जिनसे मैं चुदती थी, ये न्यूज़ दी। तीनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। तीनों को मैंने कहा कि वो बाप बनने वाला है।

 

पहले के लिये: इस उम्र में बाप बनने की खुशी। दूसरे के लिये: उसकी मर्दानगी का सबूत और तीसरे के लिये: उसके घर की पहली खुशी थी।

 

तीनों ने मुझे प्यार से भर दिया। पूरे घर में हर शख्स खुशी में झूम रहा था। सास, नसरीन भाभी, सभी बिज़ी थे घर के नये मेम्बर के आने की खुशी में। हमारा पूरा खानदान दिल्ली में ताहिर अज़ीज़ खान जी के बंगले पर सिमट आया था। बस मुझे एक अजीब सी उलझन कचोट रही थी कि मेरे होने वाले बच्‍चे का अब्बा कौन है। मैं तो बस यही दुआ कर रही थी कि चाहे वो जिसका भी हो, अल्लाह करे हो वो इसी घर का खून। देखने बोलने में इसी परिवार का ही नज़र आये। वरना मैंने जितने लोगों के साथ सैक्स किया था, उनमें से किसी और का हुआ तो लोगों को समझा पाना मुश्किल होगा। 

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    1 महीने पहले

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